शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

एक व्यंग्य :---अन्तरात्मा की आवाज़

एक व्यंग्य = -----अन्तरात्मा की आवाज़

---आत्मा----जीवात्मा----परमात्मा-----अन्तरात्मा------खात्मा
इन सबमें क्या ’कामन’ है।---तमा--
--तम्मा...तमा..लोगे---तमा
---तमा ...तमा --लोगे----सारा जहाँ है निकम्मा---
अरे! यह तो फ़िल्मी गाना है--।
हाँ तो क्या हुआ ?
’इसी अन्तरात्मा की --तमा --तमा---  की आवाज़ पर तो सारा राजनीतिक फ़िल्मी  ड्रामा होता है } और फिर -"सारा जहाँ है  निकम्मा’ बताया जाता है।
इस ’अन्तरात्मा की आवाज़" का  प्रथम प्रयोग और उपयोग सबसे पहले मैनें किया था जब मैं इन्टरमीडियेट क्लास में था।अगर मेरे इस कथन पे किसी को सन्देह हो तो शोध कर सकता है और हिन्दी में ’डाक्ट्रेट’ की उपाधि ले सकता है ।यूँ भी हिन्दी में पी0एच0डी0  करने के लिए कम ही विषय क्षेत्र रह गये हैं ।

बात उन दिनों की है जब मैं इन्टेर्मीडियेट में हिन्दी विषय की परीक्षा दे रहा था । उसमें एक प्रश्न रहस्यवाद या छायावाद से संबन्धित था। साधारणतया मैं हिन्दी में ’वाद’ विवाद; से दूर ही रहता हूँ ,न जाने किधर कोई ’निषाद’  बैठा हो और एक तीर मार कर चल दे ।अत: ये दोनो ’वाद’  मुझे न  उस समय  समझ में आया न अब।। उत्तर में क्या लिखता? राजनीति में  नेता जी को जब जनता के किसी प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता तो ’अन्तरात्मा की आवाज़’ निकलती है। परीक्षा कक्ष में मेरी भी निकली और लिख दिया---" हे परीक्षक महोदय ! आप मुझे अपनी ’अन्तरात्मा की आवाज़ ’ पर  कुछ ’अंक’ प्रदान कर देना।अस्तु
लगता है उस परीक्षक की ’अन्तरात्मा’ कहीं ’शून्य" में अटक गई थी-अत: "0" अंक प्रदान कर दिया। वो तो भला हुआ कि दूसरे पेपर ने नैया पार लगा दी कि फ़ेल होते होते बचा। दूसरे पेपर में ’अन्तरात्मा की आवाज़ "नहीं लिखा अपितु 5-5- के हरे हरे कड़्कड़ी नोट लगाए थे और लिखा था "--हे परीक्षक महोदय ! ---मेरी शादी रुकी हुई है कॄपया पास कर दीजियेगा ---’दक्षिणा’ साथ में संलग्न है।
परीक्षक महोदय कॄपालु महाराज थे । अत: दूसरे पेपर में पास हो गया । बाद में यह ’रहस्यवाद’ भी खुला कि---5-5- के हरे हरे कड़्कड़ी नोट --अन्तरात्मा की आवाज़ पर भारी पड़ गया। तब सस्ती का ज़माना था।नई पीढ़ी ने तो 5-रूपये की कड़कड़ी  नोट भी नही देखा होगा
आज अफ़सोस  होता है कि उस समय थोड़ा सा भी ’हिन्दी कविता में ’रहस्यवाद’ और छायावाद’ समझ लिया होता तो आज यह ’कलम-घिसाई ’ न करता  अपितु  विदेश के विश्व विद्यालयों में लेक्चर देते फिरता और ’यात्रा-भत्ता’ का बिल बनाते रहता
हाँ ,तो बात अन्तरात्मा की आवाज़ पर चल रही थी ।
इस जुमले का  दूसरी बार और भारतीय राजनीति में संभवत: पहली बार बाबू जगजीवन राम जी ने किया था जब उन्होने  अन्तरात्मा की आवाज़ पर कांग्रेस छोड़ी थी फिर इस आवाज़  ने  उनको कहां का छोड़ा ,मैं तो नही जानता ।
उसके बाद तो राजनीति में "अन्तरात्मा की आवाज़’ का जुमला ऐसा चला कि जैसे ’ग़रीबी हटाओ’ का जुमला चला । यह ’जुमला’ शब्द भी खुद राजनीति में ऐसा चला कि कुछ लोगो ने तो एक पार्टी का नाम ही ’भारतीय जुमला पार्टी ’ रख दिया।
अब जिसे देखो राजनीति में ’अन्तरात्मा ’ की  टोकरी उठाए गली गली आवाज़ लगाए फिर रहा है।जगा लो ’अन्तरात्मा की आवाज़---यह बात अन्य है कि किसी की भी ’अन्तरात्मा’ नहीं जगती, ।सोती रहती है।
जब किसी नेता को यह लगने लगता है कि रेत उसकी मुठ्ठी फिसल रही है ,ज़मीन खिसक रही तो उसे ’अन्तरात्मा’ याद आती है --अन्तरात्मा की आवाज़ की दुहाई देता है।
जब तक उनके पास बहुमत है तब तक ’आत्मा’ सोती रहती है और ’कुर्सी’ जगी रहती है । जब हार की संभावना सामने नज़र आती है तो ’आत्मा’ याद आती है। विश्वासमत में हार की संभावना प्रबल है--एम0एल0ए0--एम0पी0 को पकड़ कर पंच तारा होटलो में ठहरा दिया जाता है --मुर्गा मछली का इन्तज़ाम कर दिया जाता है ---दवा द्वारू की व्यवस्था कर दी जाती है ---तितलियों की भी ---ऐश करो --2-4-10 दिन आराम करो अन्तरात्मा की आवाज सुनो--अन्तरात्मा को जगाओ आराम से यहां पर--कुर्सी जाने न पाये ..विश्वास मत गिरने न पाये । जो होटल के बाहर हैं ...लार टपकाए बैठें है---कब छींका टूटे कि बिल्ली का भाग जगे ।आत्मा सर्व व्यापी है ..क्या तमिलनाडु--क्या कर्नाटका..क्या पंजाब,,..क्या बिहार---क्या उत्तरप्रदेश---क्या उत्तर--क्या दक्षिण- क्या पूरब ..क्या पश्चिम---यत्र तत्र सर्वत्र--।
’अन्तरात्मा’  रही कहाँ? पार्टी के ’ह्विप’ खा खा कर कब की मर चुकी है।अगर आत्मा रहती तो किसी मन्दिर आश्रम मठ में बैठ कर ’परमात्मा’ को न जगाते । कहते हैं इस मुद्दे पर राजनीति न करें। क्यों भईया? हम क्या घंट घड़ी घड़ियाल बजाने के लिए राजनीति में आए हैं? और आप मलाई चापें?
पिछले राष्ट्रपति के चुनाव में एक पक्ष आश्वस्त था --उसे अन्तरात्मा जगाने की ज़रूरत नहीं थी---दूसरा पक्ष आश्वस्त नही था--सो उसने ’अन्तरात्मा की आवाज़’  लगाई ---लेकिन इस रंग बदलती दुनिया में --कौन अन्त: की आवाज़ सुनता है---यही सुनना होता तो राजनीति में क्यों आता--किसी मन्दिर में आरती-भजन न करता।अत:  न लोगो की अन्तरात्मा जगने को थी ..न जगी
बिहार मे---यही आवाज़ लगाई गई---भाईयो ! ’साम्प्र्दायिक शक्तियों से लड़ना है --’अन्तरात्मा की आवाज़ पर ..आप सब लोग इधर आ जाइए।कुछ लोग आ गए।
दूसरों ने आवाज़ लगाई ---भाईयो ! बिहार में भ्रष्टाचार से लड़ना है--अन्तरात्मा की आवाज़ पर -आप सब लोग इधर आ जाइए। कुछ लोग आ गए।
फिर पहले ने आवाज लगाई--भाईयो ! बिहार के विकास को गति देना है। परिवार के विकास की गति रुक गई है । अन्तरात्मा की आवाज़ पर आप सब लोग इधर आ जाइए } कुछ लोग आ गए
दूसरे ने आवाज़ लगाई--- समाजवादी भाईयो ! सामन्तवादी शक्तियों का नाश करना है }अन्तरात्मा की आवाज़ पर आप सब लोग इधर आ जाइए। कुछ लोग आ गये
जनता ने पूछा--क्या हुआ? साम्प्र्दायिक शक्तियों से लड़ाई हो चुकी?
एक ने जवाब दिया--’ हट ! फुट !! बुड़बक कहीं का !! अरे लड़ेंगे न । अभी हम आपस में लड़ रहे हैं।एक सहयोगी गया है उधर उनके ’खेमे’ में  । जैसे वह इधर लड़ा  वैसे ही वो उधर लड़ेगा
जनता -काहें उधर गया ऊ?
पहले ने जवाब दिया---एक दम घोचूँए हो का ? अरे! ऊ गाना नहीं सुना है का?

उड़ि उड़ि बैठी ’बीजेपिया’ दुकनिया --उड़ि उड़ि बैठी --हो रामा--उड़ि उड़ि बैठी ’बीजेपिया’ दुकनिया
अरे ’गठ बन्धन’ का सब रस ले भागा------ई अन्हरा अभागा नहीं जागा

चल भाग अभी माथा खराब है----जनता दूर हो गई इस लड़ाई से।दूर से देख रही है तमाशा।

एक पार्टी ’ग़ालिब’ का शे’र सुना रही है----

नुक़्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने
क्या बने बात जहां  बात बनाए न बने ----

दूसरी पार्टी ’मोमिन’ का शेर सुना रही है--

वो जो हम में तुम में क़रार था,तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानी वादा निबाह का  ,तुम्हे याद  हो कि न याद  हो

आवाज लगाई जा रही है-राजनीति की  शे’र-ओ-शायरी चल रही है ----लोग इधर से उधर आ जा रहे है
..बुधना---’हरहुआ’ -घुरहुआ - सब देख रहा है---ई का हो रहा है भाई?---’कुर्सी ’  मन्द मन्द मुस्करा रही है।

सबही नचावत ’कुर्सी’ माई--जिधर कुर्सी--उधर ’आत्मा’
अस्तु

-आनन्द.पाठक-


गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

एक व्यंग्य : वैलेन्टाईन डे :उर्फ़ प्याज पकौड़ी चाय

                                                        वैलेन्टाईन डे :उर्फ़  प्याज-पकौड़ी चाय

जाड़े की गुनगुनी धूप। धूप सेंकता मै।।रेडियो पर बजता गाना .....

दो सितारों का ज़मीं पर है मिलन आज की रात 
मुस्कराता है उमीदो का चमन  आज की रात --

गाने के सुर में अपना सुर मिलाया ही था

रंग लाइ है मेरे दिल की लगन की आज की रात 
सारी दुनिया नज़र आती है दुलहन आज की रात

कि अचानक
"अच्छा ---बड़ी रिहर्सल चल रही है वैलेन्टाईन डे की। इतनी तैयारी पढ़ने में की होती तो आज ये कलम न घिसते ।शरम नहीं आती -उमर ढल गई रिटायर हो गए । गुलाटी मारना नहीं गया ।जब जब वैलेन्टाईन डे आता है मियाँ को गाने याद आते है ।रंगीन सपने आते हैं। सब समझती हूँ -संस्कारी लड़की हूँ। गाय बछिया नहीं हूँ""--मुड़ कर देखा तो श्रीमती जी हैं ।गनीमत थी कि  बेलन हाथ में नहीं था।
"बेगम ! तुम अब लड़की  नहीं -अम्मा बन गई हो अम्मा दो लड़की की अम्मा "
"हाँ हाँ मै तो अम्मा बन गई -और तुम कौन से छोकड़े रहे , बाल रंग -रंग के बछड़ा बन गए हो"
 सुधी पाठक गण अब  समझ गये होंगे कि रिटायर होने के बाद घर में मेरा गाना भी गुनाह और शक की नज़र से देखा जाने लगा  है ।
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जब जब वैलेन्टाईन डे आता है तो मैं श्रीमती जी के ’सर्विलिएन्स कैमरे ’ की जद में आ जाता हूँ वैसे ही जैसे जेटली साहब की जद में नोट बन्दी के दिनों में जनधन खाता आ जाता था। श्रीमती जी को लगता है कि वैलेन्टाइन डे पर मैं किसी डेड "जन धन  खाता" में पैसे डालने की तैयारी कर रहा हूँ -हफ़्ते भर से हर वक़्त कड़ी नज़र रखती हैं मुझ पर  किसी इनकम टैक्स वालों की तरह -क्या गा रहा  हूँ ....क्या शायरी कर रहा हूँ..... कैसा  गीत लिख रहा हूँ..... कितनी बार बाल सँवार रहा हूँ ....कितनी बार माँग निकाल रहा हूँ.... कितनी बार कपड़े पर परफ़्यूम छिड़क रहा हूँ....कितनी बार मूछें तराश रहा हूँ....वग़ैरह वग़ैरह।
कल ’अरूज [उर्दू ग़ज़ल का छन्द शास्त्र]” पर एक निबन्ध लिख रहा था  फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन --फ़ाइलुन-----
श्रीमती जी पीछे से उच्चारती है--अच्छा  ! ! ......... फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन ..फ़ाइलातुन करने से ’अफ़लातुन’ नहीं बन जाओगे वैलेन्टाइन डे के दिन । दो बच्चों के बाप हो गए हो ...घर में रहों --गीता पढ़ो ..रामायण पढ़ो ..माला फेरो..राम राम जपो ...सनी लिओनी ...सनी लियोनी     मत रटो ....  ..वैलेन्टाइन डे तुम्हारे लिए नहीं है ---तुम्हारे लिए शास्त्रों में ’एकादशी व्रत’ ,,,.... शिव-रात्रि  का प्रावधान है

मेरे एक कवि-मित्र है। हम उम्र है ।नाम बताना उचित नहीं ,क्योंकि भाभी जी से उनको सुरक्षित रखना मेरी जिम्मेदारी  है ।वैलेन्टाइन डे पर बड़ी प्रेमभरी कविता लिखते है उसे सुनाने के लिए । कई कवि लिखते है ,कुछ बताते हैं कुछ छुपाते हैं ।हम कवि गण ’अर्थहीन [कविता अर्थहीन  भले हो  जेब से ’अर्थहीन ही होते हैं }  होते हैं।  महँगे गिफ़्ट तो क्या दे पाते हैं  अपनी वैलेन्टाइन को ,  सो  कविता में  ही आसमां से तारा ला कर देते है ... सितारे ला कर देते है  जमीन देते हैं आसमान देते हैं  बहुत खुश हो गए तो आरा-बलिया-छ्परा -भी हिला हिला कर दे देते है ...कौन अपने बाप का जाता है ....उसी को दे देते हैं  और फिर दूसरे दिन गरीब  बन झोला लटकाए सड़क पर गाते फिरते रहते है अगले साल तक--हम ने ज़फ़ा न की थी --उस को  वफ़ा न आई---पत्थर से दिल लगाया और दिल पे चोट खाई -- -- । यही कारण है कि कवियों की.. शायरों की कोई परमानेन्ट वैलेन्टाइन नहीं होती ।मेरी भी नहीं है ।अगर किसी की होगी भी तो बतायेगा नहीं। तो भाई साहब ने बड़ा ही सुमधुर  गीत लिखा था .........  गा कर जाँचा -परखा .... एक एक शब्द को सजाया ... सँवारा .  ..आवाज़ में लोच पैदा कर  सुनाया  .....  कविता में जो जो मिर्च मसाला डालना था डाला  इस उमीद से कि उनकी वैलेन्टाइन  प्रभावित होगी ।
"भाई साहब ! बात हो गई उस से ?"
"किस से?"
"अरे उसी से जिसके लिए आप ने यह गीत लिखा है । वैलेन्टाइन डे  परसों है न !!
"ही ही ही’! ’-बत्तीसी निकलते निकलते रह गई }-हे हे हे  ! क्या पाठक जी-- अब कहाँ मैं ....कहाँ वैलेन्टाइन --- ये कविता तो बस वसन्त पर लिखी "वसन्ती" पर लिखी ...-प्रकॄति पर लिखी है प्रकॄति देवी पर लिखी है विराट  में सूक्ष्म देखता हूं निराकार में आकार देखता हूँ..जड़ में चेतन देखता हूँ .....
"और मैं चोर की दाढ़ी में तिनका देखता हूँ , कोई बात नही प्रभुवर ! मैं भी वैलेन्टाइन के दिनों में  ऐसी ही कविता  लिखता हूँ प्रकॄति पर लिखता हूँ । मगर श्रीमती जी मानती ही नही ।"
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पिछली बार भी ऐसी ही एक कविता सुनाई थी अपनी वैलेन्टाइन को ।

इक जनम भी सनम होगा काफ़ी नहीं 
इतनी बातें हैं कितनी सुनाऊँ  तुम्हें
यह मिलन की घड़ी उम्र बन जाए तो
एक दो गीत कहो तो सुना दूँ तुम्हें 
इतना सुन लिया  बहुत था  -बहादुर लड़की थी

 नतीज़ा यह हुआ कि कविता सुनने के बाद वो आज तक लौटी ही नहीं --न जाने किस हाल में होगी बेचारी ? वफ़ा-बेवफ़ा की तो बात छोड़िए।आज तक याद में दिवाना बने गाता फिरता हूँ

धीरे धीरे दूर हो गई ऐसी भी थी क्या मज़बूरी
पहले ऐसा कभी नहीं था हम दोनों में दिल की दूरी
काल चक्र पर किस का वश है अविरल गति से चलता रहता
अगर लिखा था नियति यही है प्रणय कथा कब होगी पूरी---जाने क्यूँ ऐसा लगता है
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पिछली बार भी वैलेन्टाइन डे मनाया था मगर ये शिव-सेना और  बजरंग दल वालों ने अपनी ’संस्कॄति लबादा ’ से ऐसी संस्कृति लागू किया मुझ पर कि बस शहीद होते होते बचा वरना ह खाकसार -वैलेन्टाइन संस्करण-2 हो जाता।  1-2 हड्डी सीधी बची भी तो बाद में पुलिसवालों ने सीधा कर दिया } सत्यानाश हो इन दुश्मनों का।
वैलेन्टाइन डे  हर साल आता है और मुआ  दिल हर बार हड्डियाँ तुड़वा कर सीधा खड़ा हो जाता है ।आखिर जवानी भी कोई चीज़ होती है } मैं नहीं तो क्या दिल तो जवान है } 2-4 डंडे 2-4 बेलन तो खा ही सकता है ।  तौबा कर के फिर रिन्द के रिन्द हो जाता है और वैलेन्टाइन डे आते आते  ख़ुमार बाराबंकी साहब का शे’र गुनगुनाने लगता है

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है  हवा चल रही है 

और जब पुरवा हवा चलती है तो हड्डियों का एक एक जोड़ .पिछली वेलेन्टाइन डे की गवाही देता है।
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रिहर्सल चल रहा है तैयारी चल रही है लड़के ग्रीटिंग कार्ड खरीद रहे हैं लड़किया ड्रेस बनवा रही है -नीतू ये देख  कैसी रहेगी ? -- पिछली बार तो उसने घास ही नही डाला था खुसट था साला ---रिया ये देख तो ये ’इयर-रिंग’ कैसी लगेगी ?---अन्तरा इधर आ न देख न...तेरा वाला तो ठरकी था लास्ट इयर .....ये..मैचिंग कैसी लगेगी...? सब यारी तैयारी में लग गए।
इधर मैं अपनी तैयारी में लग गया
इस बार ऐसा गीत सुनाऊँगा ,,वो बहर-ए-तवील गाऊँगा  कि अपनी वैलेन्टाइन तो क्या उसकी 2-4 सहेलियाँ भी खीची चली  आयेगी .... ’एम डी एच ’ मसाले’ की तरह ....जहां कोई  हो... खीचा चला आए
गीत गुनगुना रहा था --गीत बना रहा था ....अन्तरा नहीं बन पा रहा था ....मीठी मीठे शब्द खोज खोज कर ला रहा था }जेब का खाली कवि बस शब्दों से ही मन बहलाता है -अपनी वैलेन्टाइन को , और वैलेन्टाइन मात्र शब्दो से  नहीं बहलती [ सच्ची वैलेन्टाइन -श्रीमती जी की बात और है शायद उनके  पास  कोई दूसरा ’आप्शन न हो]

एक मन दो बदन की घनी छाँव में
इक क़दम तुम चलो इक क़दम मैं चलूं

 आगे की लाईन सोच ही रहा था कि
 ’वाह वाह वाह वाह ’-  तालियां बजी-- मुड़ कर देखा श्रीमती जी खड़ी-हैं -" घुटने का दर्द ठीक हुआ नहीं... आपरेशन कराने के पैसे  नहीं ......,चलने के क़ाबिल नहीं.... - और चले हैं ’वैलेन्टाइन से कदम-ताल करने"  जाइए जाइए अपने वैलेन्टाइन के पास ....घर की खाँड़ खुरदरी लागे ,बाहर का गुड़ मीठा  ।शिवसेना  --बजरंग दल वाले जब मरम्मत करेंगे तो ’रिपेयरिंग’ कराने यहीं लौट कर आइयेगा
अरे ! अब कहां जाना इस उमर में ,पगली ।

जीवन भर का साथ है ,भला बुरा जो हाल
 मेरी ’वेलेन्टिन यहाँ ? जीणौ कित्तै साल ?  

फिर क्या ! बालकनी में ही बैठ कर वैलेन्टाइन डे मना रहे थे  श्रीमती जी के साथ --प्याज पकौड़ी चाय के साथ
"अच्छा सुन पगली  --प्यार जताते हुआ सुनाया --"’अभी हमने जी भर के देखा नहीं है
अच्छा तो तुम भी सुन लो -श्रीमती जी ने सुनाया --" अभी हमने  तुमको फ़ेंका नही है 

क्या नहले पे दहला मारा ...क्या तुकबन्दी भिड़ाई ...क्या ’डुयेट ’ गाया आखिर बेगम किस की हो ।रेडियो पर गाना बज रहा है ---दो सितारो का "यहीं" पर है मिलन आज की रात ...दो सितारों का,,,,
अब तो बालकनी   ही  मेरा ’पार्क’ .....घरवाली ही मेरी वैलेन्टाईन.......प्याज पकौड़ी चाय ही मेरी ’गिफ़्ट’

दुनिया जले जलती रहे.........
अस्तु

-आनन्द.पाठक-
08800927181


शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

एक व्यंग्य : वैलेन्टाईन डे....उर्फ़ पूजा सामग्री.



कल वैलेन्टाईन डे है। यानी’ प्रेम-प्रदर्शन ’ दिवस ।

अभी अभी अखबार पढ़ कर उठा ही था कि मिश्रा जी आ गए।

अखबार से ही पता चला कि कल वैलेन्टाईन डे है। बहुत से लेख बहुत सी जानकारियाँ छपी थीं  । वैलेन्टाईन डे क्या होता है ,इसे कैसे मनाना चाहिए ।मनाने से क्या क्या पुण्य मिलेगा। न मनाने से क्या क्या पाप लगेगा । कितना ’परलोक’ बिगड़ेगा कितना परलोक सुधरेगा।अगले जन्म में किस योनि में जन्म लेना पड़ेगा। इस दिन को क्या क्या करना चाहिए ,क्या क्या न करना चाहिए.\.बहुत से ’टिप्स" बहुत सी बातें । वैलेन्टाईन डे पर ये 10 बातें न करें ...ये 10 बातें ज़रूर करें ।अगले साल मिलने का वादा करे न करे इस जन्म में क्या पता उसका बाप मिलने दे या न दे। अगले जन्म में मिलने का वादा ज़रूर करें -इस से -वैलेन्टाईन प्रभावित होती है।

इधर नवयुवक नवयुवतियाँ बड़े जोर शोर से मनाने की तैयारी कर रही हैं  । अभी कल ही सरस्वती मैया की पूजा से फ़ुरसत मिली है । ज्ञान की देवी है सरस्वती मैया। कल ही ज्ञान मिला कि प्रेम से बढ़ कर कोई ज्ञान नहीं --ढाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय। पंडित वही होगा जो ’प्रेम’ करेगा वरना उम्र भर "पंडा’[ पांडा नहीं] बना रहेगा.... वैलेन्टाईन डे की पूजा कराता रहेगा।
नई पीढ़ी ग्रीटींग्स कार्ड की ,गिफ़्ट शाप की दुकानों में घुस गई है ।शापिंग माल भर गये हैं इन नौजवानों से ,नवयुवकों से, नवयुवतियों से । कोई कैण्डी बार खरीद रहा है ,कोई गुलाब खरीद रहा है ,कोई गिफ़्ट खरीद रहा है । खरीद ’रहा है’ -इसलिए कि लड़कियाँ गिफ़्ट नहीं खरीदती ,कल उन्हें गिफ़्ट मिलना है।
 एक लड़की दुकानदार से पूछती है-:भईया ! कोई ऐसा ग्रीटिंग कार्ड है जिस पर लिखा हो--- यू आर माई फ़र्स्ट लव एंड लास्ट वन।
" हाँ है न ! कितना दे दूँ बहन?
"5-दे दो"
;बस ?’-दुकानदार ने कहा -" मगर पहले वाली बहन जी तो 10 ले गई है"
’तो 10 दे दो न’
  सत्य भी है ।कल ’प्रेम प्रदर्शन दिवस’ है तो प्रदर्शन होना चाहिए न । देख तेरे पास 5,तो मेरे पास 10
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और इधर ,भगवाधारी लोग ,हिन्दू संस्कृति के वाहक , भारतीय सभ्यता के संरक्षक अपनी अपनी तैयारी कर रहे हैं । बैठके कर रहे हैं। यह ’अपसंस्कृति’ है । इसे रोकना हमारा परम कर्तव्य है ।वरना संस्कृति मिट जायेगी। डंडो मे तेल पिलाया जा रहा है।इसी से ’अपसंस्कृति’ रुकेगी। त्वरित न्याय होगा कल -आन स्पाट न्याय’ । भारतीय संविधान  चूक गया इस मामले में  सो हमने जोड दिया। हम कल खुलेआम ये नंगापन न होने देगें। जो वैलेन्टाईन डे मना रहे हैं  वो भटके हुए ,गुमराह लोग है उन्हें हम इसी डंडे से ठीक करेंगे
और पुलिस? पुलिस की अपनी तैयारी है ...जगह जगह ड्यूटी  लगाई जा रही है ...बीच पर..पार्क में ..रेस्टोरेन्ट में ,झील के किनारे ,,,बागों में.... वादियों में ...जहाँ जहाँ संभावना है ..वहाँ वहाँ ,,,किसी की ड्युटी दिल पर नहीं लगाई जा रही है ..इस दिन .दिल से प्रेम का प्रदर्शन नहीं होता ..सो पुलिस का वहाँ क्या काम?
 खुमार बाराबंकी साहब ने यही देख कर यह शे’र पढ़ा होगा...

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है  और हवा चल रही है

तैयारियाँ दोनो तरफ़ से जबर्दस्त हो रही है ...दीयों ने भी तैयारियाँ कर रखी है ,,,,हवायें भी तैयार है कल के लिए ...। फ़ैसला कल होगा
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अखबार पढ़ कर उठा ही था कि सुबह ही सुबह मिश्रा जी आ धमके। जो हमारे नियमित पाठक हैं वो मिश्रा जी से परिचित है और जो पाठक अभी अभी इस ’चैनेल’ से जुड़े हैं उनके बता दे कि मेरी हर कथा में वह अयाचित आ धमकते है और अपनी राय देने लगते हैं । अगर आप उनकी राय मान लेते हैं तो रोज़ आते हैं , नहीं मानते हैं तो हफ़्ते दो हफ़्ते में एकाध बार आते हैं ।
अपनी हर राय में प्रेम चोपड़ा का एक डायलाग ज़रूर बोलते है...’ मैं वो बला हूँ जो शीशे से पत्थर तोड़ता हूँ। लगता है कि आज भी कोई न कोई पत्थर तोड़कर ही जायेंगे
आते ही आते उन्होने अपने ’शीशे’ से एक प्रहार किया
" अरे भई ! क्या मुँह लटकाये बैठे हो? कल .वैलेन्टाईन डे है ,कुछ तैय्यारी वैय्यारी की है नहीं"?
’क्या मिश्रा ! अरे अब यह उमर है ...वैलेन्टाईन डे मनाने की? बच्चे बड़े हो गये ,बाल सफ़ेद हो गये ,सर्विस से रिटायर भी हो गया ...अब  "आखिरी वक़्त में क्या खाक मुसलमाँ होंगे?’
’यार तुम्हें मुसलमान होने को कौन कह रहा है? वैलेन्टाईन डे  में बाल नही देखा जाता है  ,गिफ़्ट देखा जाता है गिफ़्ट ..उमर नहीं देखी जाती ..आल इज फ़ेयर इन ’लव’ एंड ’वार’
अखबार पढ कर मन तो था कर रहा था कि हम भी वैलेन्टाईन डे  मनाते ..हम 60 के क्यों हो गये ... हमारी जवानी के दिनों  मनाया जाता तो हम भी  5-10 वैलेन्टाईन बना कर रखते अबतक। अतीत में चला गया मैं...उस ज़माने में कहाँ होता था वैलेन्टाईन डे । पढ़्ने में ही लगा रहा...फिजिक्स...कमेस्ट्री ..मैथ। पढ़ाई खत्म हुई तो पिता जी ने एक ’वैलेन्टाईन ’ ठोंक दी मेरे सर ....35 साल से ’बेलन’ बजा रही है मेरे सर पर। यह मिश्रा बहुत काम का आदमी है कहता है वैलेन्टाईन डे मनाने की कोई उमर नहीं होती....न जाने कहाँ खो गया मैं, ख़यालों में....,
 -" अरे भाई साहब ! कहाँ खो गए ?कल .वैलेन्टाईन डे है ,कुछ तैय्यारी वैय्यारी की है नहीं"?
-यार कभी मनाया नहीं ,मुझे तो कुछ आता नहीं .. कुछ बता तो मनाऊँ
-पहले तो 1 वैलेन्टाईन होना ज़रूरी है । कोई है क्या?
-हें हें हें अरे यार इस टकले सर पे कौन वैलेन्टाईन बनेगी? 1-है तो ज़रूर जो मेरे शे’र पर  फ़ेसबुक पर वाह वाह करती है......’-मैने शर्माते शर्माते यह राज़ बताया
-" अच्छा तो तू उसे फोन मिला और कह कि कल वैलेन्टाईन डे है..........." मिश्रा जी ने अपने ’शीशे’ से दूसरा पत्थर तोड़ना चाहा
-यार मुझे करना क्या होगा ?पहले ये तो बता ’-मैने अपनी दुविधा बताई
-कुछ नहीं, बस बाज़ार से 2-4 ग्रीटिग कार्ड खरीद ले....,2-4  कैंडी बार ..2-4 कैडबरी चाकलेट  बार..2-4 गुलाब के फूल ,अध खिली कली हो तो अच्छा..2-4 पेस्ट्री ..2-4 केक ..2-4 .इश्क़िया शे’र -ओ-शायरी ....2-4...."
-;यार मिश्रा ! तू वैलेन्टाईन डे मनवा रहा है कि सत्यनारायण कथा की ’पूजन सामग्री ’ लिखवा रहा है ।
-भई पाठक जी ! वैलेन्टाईन डे भी किसी ’पूजा’ से कम नही । वो खुश नसीब होते है जिन्हें कोई ’पूजा’ डाइरेक्ट मिल जाती है
और यह 2-4 दो-चार क्या लगा रखा है?-और वैलेन्टाईन डे में ’केक’ का क्या काम ?
-कुछ आईटम रिजर्व में रखना चाहिए। एक न मिली तो दूसरे में काम आयेगा...और जब पुलिस तुम्हे डंडे मारेगी पार्क में  तो वही ’केक’ उसके मुँह पर पोत देना..भागने में  सुविधा रहेगी- मिश्रा जी ने ’केक’ की उपयोगिता बताई
-और गुलाब का फूल ’लाल’ लेना है कि ’सफ़ेद ?
-सफ़ेद गुलाब ??? -मिश्रा जी अचानक चौंक कर बैठ गए -बोले---"यार तू वैलेन्टाईन डे मनाने जा रहा है कि मैय्यत पर फूल चढ़ाने जा रहा है?
-यार मिश्रा ! शे’र-ओ-शायरी में मेरा शे’र चलेगा क्या ?
तू सुना तो मैं बताऊँ-"
मैने अपना एक शे’र बड़े तरन्नुम से बड़ी अदा से  बड़ा झूम झूम कर पढ़ा....

नुमाइश नहीं है ,अक़ीदत है दिल की
मुहब्बत है मेरी इबादत में शामिल

मिश्रा जो ठठ्ठा मार कर हँसा कि मैं घबरा गया कि कहीं शे’र का ’बहर’ /वज़न तो नही गड़बड़ा गया कहीं तलफ़्फ़ुज़ तो ग़लत तो नहीं हो गया ।
 मिश्रा जी ने रहस्योदघाटन किया कि तुम्हारे ऐसे ही घटिया शे’र से कोई वैलेन्टाईन  नहीं बनी और न बनेगी । और जो बनाने जा रहे हो सुन कर वो भी भाग जायेगी...एक काम करो...तुम शे’र-ओ-शायरी वाला पार्ट मेरे ऊपर छोड दो..... भुलेटन भाई पनवाड़ी के पास इश्क़िया शायरी का काफी स्टाक है,.... सुनाता रहता है ...कल मैं 2-4 शे’र तुम्हें लिखवा दूँगा ...
अच्छा तो मैं चलता हूँ
मिश्रा जी चलने को उद्दत हुए ही थे  कि यकायक ठहर गये..पूछा
-यार भाभी जी नहीं दिख रही है : कहीं गई है क्या :
-हाँ यार ! ज़रा 2-4 दिन के लिए मैके गई है
-मैके? और इस मौसम में? भई मैं तो कहता हूँ कड़ी नज़र रखना उन पर  । कही वो  न .वैलेन्टाईन डे मना लें मैके में~’-  कहते हुए मिश्रा जी वापस चले गये
-अस्तु-

-आनन्द.पाठक
09413395592

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2016

बेबात की बात : तमसोऽ मा ज्योतिर्गमय...



आज बसन्त पंचमी है -सरस्वती पूजन का दिन  है ।

या कुन्देन्दु तुषार हार धवला या शुभ्र वस्त्रावृता
या वीणा वर दण्ड मण्डित करा या श्वेत पद्मासना
या ब्र्ह्माच्युत् शंकर प्रभृतिभि देवै: सदा वन्दिता
सा माम् पातु सरस्वती भगवती  नि:शेष जाड्यापहा

क्षमा करें माँ !

क्षमा इस लिए मां कि उपरोक्त श्लोक के लिए ’गुगलियाना’ पड़ा [यानी ’गूगल’ से लाना पड़ा] छात्रावस्था में यह ’श्लोक’ मुझे कंठस्थ था ,प्राय: काम पड़ता रहता था विशेषत: परीक्षा के समय ..सुबह शाम यह श्लोक रटता रहता था कि हे माँ !सरस्वती बस इस बार मुझे  पास करा दे...अच्छे नम्बर की माँग नहीं करता था ।कभी कभी हनुमान जी को भी स्मरण कर लेता था ,शायद वही उद्धार कर दें । माँ वह आवश्यकता थी ,प्रीति थी सो इस श्लोक को याद रखना और विश्वास करना मेरी मज़बूरी थी । जब पढ़ाई लिखाई खत्म हो गई तो श्लोक का सन्दर्भ भी खत्म हो गया । सो भूल गया था ।इसी लिए ’गुगलियाना’ पड़ा। जब रोजी-रोटी का ,धन कमाने का समय आया तो ’लक्ष्मी-पूजन’ का श्लोक याद रखने लगा ।माँ ! यह स्वार्थ नही था मां ,प्रीति थी ।मेरी ज़रूरत थी। तुलसीदास ने पहले ही कह दिया है

सुर नर मुनि सबकी यह रीती
स्वारथ लाग करहि सब प्रीती

आज मैं फ़ुरसत में हूँ माँ। रिटायरमेन्ट के बाद यह मेरा पहला पूजन है आप का । पेन्सन फ़िक्स होने के बाद ’लक्ष्मी ’ जी फ़िक्स हो गई जो आना था सो आ गईं सोचा कि अब आप का ही  विधिवत पूजन करू। सेवा काल में तो काम चलाऊ -ॐ अपवित्र : पवित्रो वा...सर्वावस्थां गतोऽपि वा...." -- कह कर कुछ माला-फूल चढ़ा कर जल्दी जल्दी पूजा कर के आफ़िस निकल जाता था । आज कोई जल्दी नहीं है । टाईम ही टाईम है...बास की कोई मीटिंग नहींं....कोई झूठा-सच्चा स्टेटमेन्ट नहीं भेजना...कोई प्रेजेन्टेशन नहीं देना...कोई टेन्सन नहीं....आज पूरा श्लोक पढूंगा...याद करूँगा

  हे माँ ! मै ही आप का आदि भक्त हूँ । हर भक्त ऐसा ही कहता है सो मैं कह रहा हूँ।60-साल की उम्र में 55 साल से पूजा अर्चना कर रहा हूँ आप का । हर वर्ष करता हूँ । 55 साल इस लिए कि मेरी पढ़ाई ही जन्म के 5-साल बाद शुरु हुई। गाँव के ही एक स्कूल में पिता जी ने नाम लिखवा दिया तो विद्या आरम्भ ,आप की पूजा आरम्भ।पट्टी दवात दूधिया सम्भाला । लिखता तो कम था .पट्टी पर कालिख लगा कर दवात से रगड़ रगड़ कर चमकाता ज़्यादा था फिर उस पर सूता भिंगो कर लाईन मारता था [पाठकगण "लाईन मारने" का कोई ग़लत अर्थ न निकालें ] यानी लाईन खीचता था कि लेखन सीधा रहे ।फिर   लिखना सीखा ’अब घर चल’ ...अब घर चल ...अब घर चल ।1 साल तक यही लिखता रहा तो मास्साब ने इसका मतलब समझ लिया और सचमुच मुझे घर भेज दिया

फिर पिता जी  शहर चले आये ।और यहाँ बेसिक प्राइमरी पाठशाला मुन्स्पलिटी के स्कूल में नाम लिखा दिया जो घर के बिल्कुल पास में था । अगर पिता जी ज़मीन्दार होते ,[जो कि वह नहीं थे] तो वह स्कूल मेरे घर के आंगन में होता । इस नज़दीकी का फ़ायदा मैने खूब उठाया और हर घंटी के बाद पानी पीने घर ही आ जाया करता था। पिता जी को मुहल्ले वालों ने काफी समझाया कि ’कान्वेन्ट’ स्कूल के बच्चे ’स्मार्ट’ होते हैं ..पिता जी  ’नज़दीकी’ वाले तर्क से सबको पराजित कर दिया करते थे ..शायद उस समय उनकी ’पाकेट’ उतनी गहरी न रही होगी जितना ’कान्वेन्ट’ स्कूल के लिए चाहिए था । अत: मैं ’स्मार्ट’ तो न बन सका माँ ...लढ्ड़ का लढ्ड़ ही रहा और नतीजा आप के सामने है कि आजतक बस ’अल्लम गल्लम बैठ निठ्ठलम :-व्यंग्य लिख रहा हूँ।

शहर में आ कर भी समस्या वहीं की वहीं बनी रही ---यानी पास होने के लाले पड़े रहते थे। कक्षा 3- में आया खूब मेहनत की कि इस बार तो पास होना ही है कि इसी बीच चाईना वालों ने युद्ध छेड़ दिया .इस से फ़ायदा यह रहा कि अपने ’फ़ेल’ होने का सारा दोष ’चाइना’ पर मढ़ दिया। लश्टम पश्टम करते इन्टर तक पहुंचा ही था कि इस बार ’पाकिस्तान’ ने युद्ध छेड़ दिया तब मुझे पहली बार आभास हुआ कि हो न हो मेरे फ़ेल होने में विदेशी शक्तियों का ’हाथ’ है।खैर माँ ,आप की कृपा से किसी तरह इन्जीनियर बन गया ..काम बन गया।

मां ! आप ज्ञान कला संगीत की अधिष्टात्री देवी हैं।आप साहित्यकारों की ,बुजुर्गों की इष्ट देवी है ।भगवा धारी  की भी हैं  ,छात्र-छात्राओं की भी है  , युवाओं की भी है ,सभी साथ साथ पूजा में व्यस्त है }2-दिन बाद इसी उत्साह से उन्हें ’वैलेन्टाइन-डे’ भी मनाना है ।तब भगवा धारी साथ साथ नहीं रहेंगे ।आप का ज्ञान उन्हें प्राप्त हो चुका होगा कि ’प्रेम-प्रदर्शन’ -अपसंस्कृति है । तब उनके हाथ में ’संस्कृति’ का डंडा रहेगा -जो ’अपसंस्कृति’ को ठीक करेंगे । इस काम का ठेका आजकल उन्हीं के पास है।

आप ने सबके हाथ में ज्ञान का मशाल दे दिया । लोग ज्ञान की अपनी अपनी व्याख्या से मशाल ले कर चल दिए। सब की अपनी अपनी मशाल ।हिन्दू की मशाल अलग...मुस्लिम की मशाल अलग। ज्ञान के इस रोशनी में चेहरे नज़र आने लगे -कौन हिन्दू है ,कौन मुसलमान है  । हिन्दुओं में भी अलग अलग हाथों में अलग मशालें ।मेरे ज्ञान की मशाल में ज़्यादे रोशनी है । सबूत? सबूत क्या? घर -मकान-बस्तियाँ जला कर दिखा देते है । हाथ कंगन को आरसी क्या ।और कई बार दिखा भी दिया । और इधर, ब्राह्मण महासंघ...राजपूत महासंघ ...तैलीय समाज..वैश्य समाज..वाल्मिकी समाज... इस ज्ञान की मशाल में चेहरे दर चेहरे और साफ़ नज़र आने लगे ..आदमी ही आदमी ......’आदमियत’ अँधेरे में चली गई ..कहीं नज़र नहीं आ रही है.....।हम यहीं तक नहीं रुके। हर महासंघ में एक महासंघ।पहिये के अन्दर पहिया-’ व्हील विद इन व्हील "  ब्राह्मण समाज ही को ले लें ...गौड़ ब्राह्मण ....कान्यकुब्ज़ी ...सरयूपारीय ...पराशर.... यही हाल क्षत्रिय संघ ,वैश्य समाज सब के हाथ में एक एक मशाल .....संघौ शक्ति कलियुगे........."तमसो मा ज्योतिर्गमय-....अभी तक हम अंधेरे में थे ..ज्ञान का प्रकाश मिलता गया  हम अंधेरे से रोशनी की तरफ़ बढ़ते गए...हम बँटते गए

 राजा भोज आप के अनन्य भक्त थे । अपने शासन काल में  भोज शाला  में आप की पूजा विधिवत और बड़े धूम धाम से कराते थे । आजकल उनके भक्त कर रहें है करा रहे है । कल टी0वी0 पर समाचार आ रहा था कि भोजशाला में आप का पूजन अर्चन चलेगा और पास में ही जुमा की नमाज़ भी चलेगी। किसी ज़माने में यह भाई-चारे का प्रतीक रहा होगा ,आप की कृपा से अब हमको ज्ञान प्राप्त हो गया है --दोनो का ज्ञान अलग अलग ..मेरा ज्ञान तेरे ज्ञान से बेहतर ...तेरा ज्ञान मेरे ज्ञान से कमतर.. । ’धार’ मे लोग अपने अपने-अपने ज्ञान को ’धार’ दे रहे हैं -और बीच में पुलिस का डंडा । कहीं दोनो का ज्ञान आपस में मिल न जाय ’वोट’ बैंक का मसला है कुर्सी बचानी है तो इन्हें अलग अलग रखना ही बेहतर है

राजा भोज की बात चली तो ’गंगू तेली’ की बात चली। लोगो ने इस कहावत के अपने अपने ढंग से व्याख्या की कुछ ने ’गांगेय’ और "तैलंग’ का संबन्ध बताया जो कालान्तर में ’गंगू’ बन गया
किसी ने ’गंगू’ तेली के राज्य हित में बलिदान की बात बताई । मगर हमारे ज्ञान भाई [ ज्ञान चतुर्वेदी जी[भोपाल वाले] ने पतली गली से रास्ता निकाल लिया....बताया वर्तमान में कई राजा ’भोज’ है ..भोपाल के राजा ’भोज’ अलग ..लखनऊ के राजा भोज अलग...दिल्ली के राजा भोज अलग..ग्राम पंचायत के राजा भोज अलग ।..और गंगू तेली? गंगू तेली यानी -हम

इसी सिलसिले में एक पतली गली हम ने भी निकाली । मीडिया वालों नें अपना कैमरा मेरी तरफ़ नहीं किया वरना हिन्दी जगत को इस मुहावरे को एक नया रूप मिल गया होता....
वस्तुत: इस मुहावरे को ---कहाँ राजा "भोज’ कहाँ ;भोजू’ तेली --होना चाहिए था ।”भोजू’  का राजा ’भोज’ के साथ समानता भी बैठ रही है।  इसी बिना पर तो ’भोजू’ तेली भी अपने को राजा भोज समझने लगा होगा और ऐठ कर चलने लगा होगा तो किसी ने तंज़ किया होगा...वैसे ही जैसे कल शाम शुक्ला जी मुझ पर तंज़ किया---कहाँ मुल्कराज आनन्द....और कहाँ आनन्द.पाठक आनन्द....हा हा हा हा हा ।

तो हे माँ सरस्वती ...आज का पूजन यहीं तक ।अगला पूजन अगले बसन्त पंचमी को

सादर/अस्तु

-आनन्द.पाठक-
09413395592


शुक्रवार, 29 जनवरी 2016

एक व्यंग्य : अवसाद में हूं ..

अवसाद में हूँ...

जी हाँ, आजकल मैं अवसाद में हूँ । अवसाद में हूँ इस लिए नहीं कि कल बड़े बास ने डाँट पिला दी।  इस ठलुए निठलुए पर जब वह डाँट पिलाने का कोई असर नहीं देखते हैं तो  खुद ही अवसाद में चले जाते हैं। मैं अवसाद में इसलिए भी नही हूँ कि मैं रिटायर हो गया -ताड़ से गिरा खज़ूर पे अटका और श्रीमती जी की सेवा में लग गया और मटर [अभी सीजनल फ़ली यही है] छीलने में लग गया। अवसाद में इसलिए भी नहीं हूँ कि मुझे अपनी किसी बेटी की शादी करनी है ..भगवान ने पहले ही इस ’सुख’ से वंचित कर दिया।

जब से "असहिष्णुता" के नाम पर कुछ लोग "अवार्ड’  लौटाने लगे तो मैं अवसाद में आ गया। मेरे पास कोई ’अवार्ड’ नहीं है कि मैं भी लौटा आता सरकार को --यह ले अपनी लकुट कमरिया मेरौ काम न आयौ-। उन लोगों की अन्तरात्मा कभी कभी जगती है...बाक़ी समय सोती रहती है । जब जगती है तो अचानक ख़याल आता है अरे! मेरे निद्रा काल में इतना सब कुछ हो गया ...धिक्कार है इस निद्रा को। जमाना क्या कहेगा  ....साहित्यकार है ..बुद्धिजीवी हैं ...समाज के प्रहरी है... हमें जगे रहना है ..समाज को जगाए रहना है तो जगने का प्रमाण पत्र देना ही होगा...मुझे अपना ’अवार्ड’ लौटाना ही होगा ...
मैं जानता हूं वह सड़कों पर नही उतरेंगे..झण्डा नहीं उठायेंगे.....वह आन्दोलन नहीं करेंगे.....आन्दोलन के लिए युवा पीढ़ी है ...वह तो बस ’अवार्ड’ लौटायेंगे और  लौटाने के बाद  फिर सो जायेंगे ...फिर कभी जगने के लिए...
इसी बात का अवसाद है मुझे कि मेरे पास कोई सरकारी ’अवार्ड’ नहीं है कि मैं भी लौटा आता और अपने जगे होने का प्रमाण दे आता वरना दुनिया मुझे ’मुर्दा’ ही समझ्ती होगी...’असहिष्णु’ ही समझ रही होगी। कुछ ’अवार्ड’ है मेरे पास पर सरकारी नहीं हैं  ..नितान्त व्यक्तिगत है..श्रीमती जी ने दिये हैं बिना किसी खर्चे पानी के..। जैसे "निठ्ल्ले है आप "...कामचोर.. आलसी..’कलम-घिसुआ" अवार्ड [मेरे लेखन प्रतिभा से प्रभावित हो कर] वग़ैरह वग़ैरह। कुछ ’खिताब’ तो ऐसे हैं कि मैं यहां लिख नहीं सकता ..पर आप समझ सकते है। उस में से एक अवार्ड ये भी है -" क्या .....   की तरह मेरे पीछे पीछे घूमते है। रिक्त स्थान आप स्वयं भर लें अपनी सुविधानुसार। मैं कई बार ऐसे ’अवार्ड’ लौटाने के लिए श्रीमती जी को कहा ...मगर वह लेने को तैयार नहीं ...कहती हैं सही ’अवार्ड’ दिया है .रखिए अपने पास ....एक और दूँ क्या !!

बड़े लोगों की बात और है। वो ’अवार्ड’ पाते हैं तो तालियाँ बजती हैं ,,,और जब लौटाते हैं तो और बजती है..बड़े लोग ’गालियाँ’ भी देते हैं तो ’तालियाँ; बजती है । सही वक़्त पर सही निर्णय लेते है....सही दलील देते है....मानना न मानना आप पर छोड़ देते है। और मैं ?अगर मैं अवार्ड लौटाऊँ तो श्रीमती मेरी ही बजा देंगी।

कल शाम मुझे अवसाद में देख ,नुक्कड़ का भुलेटन पनवाड़ी से रहा न गया....." उस्ताद क्या बात है"? फिर कहीं मंच पर कोई ’शे’र पढ़ दिया क्या कि मुँह सूजा हुआ है?"

 भाई भुलेटन की नुक्कड़ पर पान की दुकान है ...भुलेटन पान दरीबा"..यहीं पर सुबह शाम मुलाकात होती है । एक बार मैं उस के किसी बब्बर शे’र का इस्लाह कर दिया था तभी से वो मुझे उस्ताद कहने लग गया और कभी कभी  गुरु-दक्षिणा में 1-2  गिलौरी पेश कर देता है। शायर तो वह भी ..फिर हम दोनों एक दूसरे को शे’र सुनाते रहतें है और दाद वाद देते रहते हैं ..वो मेरा पीठ खुजा देता है और मैं उसका जब कि वह अपने को ’मीर’ और मैं अपने को ’ग़ालिब’ समझने लगता हूँ...
"क्या बात है उस्ताद ...मुँह सूजा सूजा लगता है"---- भुलेटन भाई ने पूछा
" यार भुलेटन ! आजकल अवसाद में हूं"
" भाई ! ये ’अवसाद’ क्या होता ? ,,,,भुलेटन ने जिग्यासा प्रगट की
"तू नहीं समझेगा...तू तो बस पान लगा। बड़े लोगों के चिन्तन को अवसाद कहते हैं  ...लोग अपना अपना ’अवार्ड’ लौटा रहें है और मेरे पास कोई ’अवार्ड’ नहीं है कि मैं भी लौटा देता...बस इसी बात की चिन्ता यानी चिन्तन है "
" अरे उस्ताद बस ,इतनी सी बात । अरे कल ही आप को अवार्ड दिलवा देता हूँ वो भी बिना हर्रे-फिटकरी के"
"अरे ! तू और तेराअवार्ड ? यार भुलेटन मजाक न कर ... मैं अभी गहन चिन्तन में हूँ"

तरदामनी पे शेख हमारे न जाइयौ
दामन निचोड़ दूँ तो फ़रिश्ते वज़ू करें   -------पता नहीं भुलेटन भाई किस शायर का शे’र पढ़ गए...

खैर मैने पूछा -" अवार्ड क्या तेरी पान की गिलौरी है कि जिसको चाहे उसको दे दे?
"नहीं उस्ताद ’आथिन्टिकेटेड अवार्ड’ दिलवाऊँगा....’अखिल भारतीय पनवाड़ी संघ का कल्चरल सेक्रेटरी जो हूँ"
"अरे ये नुक्कड़ और ये तेरा अखिल भारतीय....!!"
अरे उस्ताद ! अब तो गली गली में अखिल भारतीय कवि सम्मेलन /मुशायरा होने लगा है ,,बैनर ही तो लगाना है खाली..बस 2-4 फोटू खिचवा  लेना...रमनथवा से माला-फूल चढ़वा देंगे आप पर...
फिर आप जो लिख कर देंगे वही ’प्रशस्ति-पत्र" पढ़वा देंगे...श्यम ललवा से .।.बस हो गया आप का अवार्ड ....फ़ेसबुक पर चढ़ा देना...मिल ही जायेंगे 100-50 वाह वाह करने वाले...फिर चाहे ये अवार्ड रखो या लौटाऒ कोई पर्क़ नहीं पड़ता...."  भुलेटन भाई ने अवार्ड का ’रहस्य’ और ’महत्व’ समझाया

-सौदा कोई बुरा नहीं था...सो अवार्ड ले ही लिया..."अखिल भारतीय पनवाड़ी संघ व्यंग्य सम्राट " का
सोचा कि अब वक़्त आ गया कि इसे ’फेसबुक’ पर चढ़ा दूं....
..देखा कि वहाँ तो पहले से ही ऐसे 50-60 "अवार्डी" हैं
सोचता हूँ कि फिर कही ’दंगा’ या कोई ’असहिष्णु’ हो तो  विरोध स्वरूप  मैं भी यह ’अवार्ड’ लौटा दूँ....यह ले अपनी लकुट कमरिया.......

-अस्तु

-आनन्द.पाठक
09413395592

शनिवार, 5 सितंबर 2015

Ek VyaNgY : Boss Katha Charitam


                                            बॉस कथा चरित्रम्


दैवो न जानाति ;’बॉस चरित्रम’- संस्कृत में आप ने पढ़ा होगा ?। ’त्रिया चरित्रम’ और ’बॉस चरित्रम्’ में कोई ख़ास अन्तर भी नहीं होता । दोनों ही तुनुक मिज़ाज,दोनों ही सेवा से असन्तुष्ट ,दोनो ही कज़रवी [ऐंठ के चलना] दोनों ही सीधे मुँह बात नहीं करते कि उनका मुँह सीधा करते करते करते अपुन  का सीधा हो जाता हैं बाप ,मगर दोनो ही..

हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता
बॉस कथा ज्यूँ  सन्ता-बन्ता

-"हे श्रोतागण ! जिस प्रकार हरि अनन्त है और हरि कथा अनन्त है उसी प्रकार बॉस की कथाएं भी ’सन्ता-बन्ता’ की कथाओं  की तरह रस पूर्ण है और कभी खत्म न होने वाली अनन्त है ...आप रिटायर हो जायेंगे ..आप की सर्विस खत्म हो जायेगी परन्तु ’बॉस’ की कथा कभी खत्म न होने वाली है } एक बार प्रेम से बोलिए ’बॉस’ महराज की जै....

लगता है कि गोस्वामी तुलसी दास जी भी अपने समय में किसी ’बॉस’ से पीडित रहे होंगे तभी उन्होने आगे लिखा

करू भलु 'बॉस' नरक कर ताता 
दुष्ट संग जन देहु बिधाता 

अर्थात..हे भगवन ! मुझे भले ’नरक’ में पोस्टिंग दे दो मगर किसी ;रावण’ जैसे बॉस के साथ अटैच न करो .अब इस के आगे अर्थ बताने की ज़रूरत नहीं है --जो पीडित हैं वो इसका अर्थ अच्छी तरह जानते है और जो ऐसे ’बॉस’ की चपेट में नहीं आये है बाद में जान जायेंगे

तो कथा आरम्भ करते है

एकदा नैमिष्यारणे.. एक बार नैमिष्यारण में भ्रमण करते हुए एक रिटायर ऋषि माधवानन्द  जी पधारते भए। Rule-14 &16 kaa बनवास झेल रहे उस जंगल में कुछ राजकीय कर्मचारी/अधिकारी  एकत्र हो कर प्रार्थना करने लगे और कहा-" हे ॠषि प्रवर माधवानन्द जी ।इस जंगल में पधार कर आप ने महती कृपा की वरना तो लोग रिटायर के होने के तुरन्त बाद ही कहीं न कहीं अन्य कार्य का अपना जुगाड़ बैठा लेते हैं ..कुछ तो रिटायर होने के बाद उसी विभाग के सेवा सलाहकार बन जाते है जिसका उन्होने अपने सेवाकाल में भट्टा बैठा दिया था ..मगर आप उनसे अलग है..निस्पॄह हैं..निर्विकार है ..निष्कंलक है ...निष्कपट है...और इसी कारण आप को इस विभाग ने या किसी विभाग ने ’सलाहकार’ पद के योग्य नहीं समझा ...और आप भ्रमण करते करते यहाँ पहुँच गये. ..यह हम लोग का अहो भाग्य है कि आप के दर्शन हो गये।साधु । साधु । सुना है कि आप ने अपने सेवा काल में बहुत से ’बॉस’ निपटाये हैं---सो हे प्रभु ! कुछ बॉस चरित्रम पर  प्रकाश डाले -- तो हम लोगों की तपती दग्ध आत्मा को शीतलता प्राप्त हो । बॉस कितने किस्म के होते है ...कैसे होते हैं ..वो क्या क्या करते है ..उनका चरित्र कैसा होता है  --चरित्रवान होते है या चरित्रहीन ...जानने की हम कर्मचारियों/अधिकारियों की  बड़ी उत्कंठा है ...आप सविस्तार बतायें सर ! कि आने वाली पीढियाँ आप के  ग्यान से लाभान्वित हो सके......
 माधवानन्द जी ने अपना ’ब्रीफ़ केस" एक तरफ़ सरकाते हुए और ’लैप टाप’ सम्भालते हुए कहा’-" मित्रों ! ’नो लुक वियाण्ड फ़र्दर’ अर्थात अब तुम्हे और कहीं देखने की ज़रूरत नहीं ..तुम सही जगह आए हो...अब तुम्हारी समस्या समझो कि मेरी समस्या हो गई। आप की ’बॉस कथा चरित्रम ’ सुनने की उत्कंठा से मुझे बड़ी खुशी हुई कि बॉस की चुगली करने और सुनने में आप सब की आदत आज भी वैसे ही है जैसे पहले थी। आप लोगों ने जो विश्वास मुझ में प्रगट किया है और जो यहाँ मंच प्रदान किया है और  गौरव दिया है मैं इस हेतु आप सब का आभारी हूं। मैं अपने पूरे सेवा काल में काम से ज़्यादा बॉस के चरित्र का जिस गहराई से अध्ययन किया है वो आप को अन्यत्र नहीं मिलेगा..आप को रिटायरी तो बहुत मिल जायेंगी परन्तु ऐसा सूक्ष्म अन्वेषक नहीं मिलेगा....
’महर्षि अब आप ज़्यादा समय न लें अब हम लोगों की प्यास बुझायें’----भक्तों ने समवेत स्वर में कहा
"तो सुनो...."
भक्तो !तुमने वो कहावत तो सुनी होगी ’-बॉस के अगाड़ी और घोड़े के पिछाड़ी ’ नहीं रहना चाहिए। यह सेवा का मूल मन्त्र है।
पता नहीं किस भक्त ने पहली बार यह मुहावरा कहा होगा...मगर जब भी कहा होगा ..बड़े अनुभव और अध्ययन के आधार पर कहा होगा ...या तो वो घोड़े के पीछे की 2-4 दुल्लत्ती खाई होगी या बॉस ने उस के पीछे पर 2-4 दुलत्ती जमाई होगी ..तभी वो बिलबिला कर यह मुहावरा कहा होगा। मुझे आज तक यह  पता न चला कि वह पीड़ित कर्मचारी ने बॉस के लिए घोड़ा ही क्यों चुना ...गधा भी तो चुन सकता था..गधा भी तो दुलत्ती मारता है...गधा और बॉस में सामंजस्य भी ठीक बैठता ..गधा के पास जब काम नहीं रहता तो ढेंचू ढेंचू करता रहता है -खाली समय में।
घोड़े के बारे में तो नहीं कह सकता मगर ’गधा’ के बारे में कहीं पढ़ा था कि गधा ही एक ऐसा प्राणी है कि वो अपनी आंख से सामने भी देख सकता है और  पीछे  भी देख सकता है और यही कारण कि उस की दुलत्ती खाली नहीं जाती। बॉस तो पीछे देख नहीं सकता क्योंकि वो गधा नहीं है अत: अपने से आगे वाले के "पॄष्ट-भाग’[पीठ भी हो सकता है और पीठ से ज़रा नीचे भी हो सकता है -यह बॉस के विवेक पर निर्भर करता है ] पर "एक-लत्ती" मारता है[ दुलत्ती मारने की सुविधा सिर्फ़ गधे को प्राप्त है और बॉस गधा नहीं है]
गधे और बॉस में एक बात और दॄष्ट्व्य है -बॉस गधा हो सकता है मगर गधा बॉस नहीं हो सकता -यह एक सार्वभौम सत्य है....
"हे मुनिवर! यह बॉस कौन होता है ...यह किस किस्म का प्राणी होता है? आप सविस्तार वर्णन करें ..हमें जानने की महती उत्कंठा है
"भक्तो ! बड़ा ही अच्छा प्रश्न किया है ..बॉस की परिभाषा अंग्रेजी के शब्दकोश में कई प्रकार से दी गई है जिससे आप दिग्भ्रमित भी हो सकते है ।बस आप तो सर्व साधारण और सर्व सुलभ परिभाषा समझे । Boss is always right| मैने इसी परिभाषा के सहारे सारी सर्विस गुज़ार दी ..भविष्य में आप भी इसी मन्त्र से गुज़ार देना
बॉस स्वतन्त्र इकाई नहीं है एक सापेक्ष प्राणी है बॉस का भी बॉस होता है । बॉस निरपेक्ष नहीं होता..अगर वह स्वतन्त्र रूप से बॉस है और उसके under  कोई स्टाफ़ नहीं हो तो वो Boss नहीं होता ..श्री हीन होता है .कौड़ी का तीन होता ...जल बिनु मीन होता है .और .फिर वो निराशा भाव से मर जाता है। अत: Boss होने के लिए ज़रूरी है कि उसके अधीनस्थ 10-20 स्टाफ़ हो जिस से वो अपने को Boss और अधीनस्थ को ’घास’ समझे। जितनी बड़ी संख्या अधीनस्थ स्टाफ़ की उतना ही बड़ा बॉस।
इस परिभाषा से एक चपरासी भी बॉस हो सकता है बस शर्त यह कि वो किसी लतिया सके ।
"एक चपरासी भी बॉस हो सकता है? आश्चर्य ! मुनि श्रेष्ठ आश्चर्य !  कैसे मुनिवर ? समझाने का कष्ट करेंगे?---एक भक्त ने जिग्यासा प्रगट की
" सत्य वचन वत्स !  सत्य वचन! मैं इस बात की पुष्टि एक घटना से करता हूँ --आप सभी लोग मनोयोग से सुने।
एक बार इन्द्रप्रस्थ प्रदेश [जो आजकल दिल्ली नगरी है] में एक सरकारी कार्यालय में किसी बड़े साहब ने कोई ’फ़ाईल’ तलब किया । बहुत खोजबीन के बाद मालूम हुआ कि उक्त फ़ाइल गायब है , मिल नहीं रही है तो बड़े बाबू ने यह बात बड़े साहब को बताई ---फिर क्या था बड़े साहब चीख उठे---तुम सब निकम्मे...कामचोर..हरामखोर.. एक फ़ाइल सम्भाल कर नहीं रख सकते है और शर्म नहीं आती कह रहे हो कि फ़ाईल मीसिंग है....जाओ ’नोट शीट’ पर लिख कर लाओ कि फ़ाइल मीसिंग है फिर देखता हूँ तुम सब को..बताता हूँ कि सर्विस करना क्या होता है .....
बड़े साहब यहाँ ;बॉस’ हैं अभी सही चल रहे है,,,
बड़े बाबू ने "नोट शीट ’ तैयार किया और लिखा -as desired ,file is missing'--फिर क्या हुआ आदेश हुआ कि फ़ाइल खोजी जाय...बड़े बाबू का जो तिया-पाँचा हुआ सो अलग
बड़े बाबू ने अपने सेक्शन के अधीनस्थ बाबू को बुलाया और उसी शैली मे  डाँटा जिस शैली में उसके  बॉस ने डांटा था -अब यहाँ बड़े बाबू  बॉस हो गये...
यह क्रम चलते चलते एक मरियल से कनिष्ठ लिपिक तक पहुँचा और उस ने ’चपरासी’ को बुलाकर डाँटना शुरु किया....निकम्मे ..कामचोर सब के सब हरामखोर ..एक फ़ाईल भी सम्भाल कर नहीं रख सकता ...अब यहा कनिष्ठ लिपिक चपरासी का बॉस हो गया ...
अन्तत: चपरासी ने स्टोर रूम में जा कर फ़ाईल खोजना शुरु किया ...कनिष्ठ लिपिक महोदय  ने पहले से ही  मूड आफ़ कर दिया था..ऊपर से फ़ाईल नहीं मिल रही थी कि देखा कि 2-आलमीरा के बीच एक कुत्ता बड़े आराम से सोया हुआ था कि चपरासी महोदय ने एक लात जमाया उस कुत्ते को...स्साला ! मेरी फटी जा रही है हमें मरने की फ़ुरसत नही और ये हराम खोर निकम्मा ...कामचोर...कुत्ते का बच्चा .यहाँ आराम से....। और कुत्ता कें ..कें..कें..करता हुआ भाग गया...
यहाँ अब चपरासी बॉस हो गया कुत्ते का ...जो लात मार दे वो बॉस
तो भक्तो ! अब स्पष्ट हो गया होगा कि बॉस एक शॄंखला है ...बॉस वो जो लतिया सके अधीनस्थ वो जो लात खा सके..

तो भक्तों ! इस कथा का अभी यहीं विराम देता हूं.......बाक़ी कथा अगले प्रवचन में सुनाऊँगा....
सभी लोग एक बार प्रेम से बोलें - बड़े बॉस की जय हो...

बॉस जन तो तेणे कहिए पीड़ पे पीड़ बढ़ाई रे--

anand pathak
09413395592
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रविवार, 22 मार्च 2015

लघु कथा :शान्ति भंग

" उस मकान वाले को इस मुहल्ले से निकालो। एक मछली सारे तालाब को गन्दा कर रही है ।  मकान में अवैध धन्धा चलवा रहा है’----बूढ़े व्यक्ति ने चिल्ला चिल्ला कर कहा
किसी ने अपनी खिड़कियाँ नहीं खोली
 थाने में रिपोर्ट लिखाने गया-रिपोर्ट नहीं लिखी गई
कुछ दिनो बाद.....
उसे गिरफ़्तार कर लिया गया -शान्ति-भंग के जुर्म में
कि वह बूढ़ा आदमी मुहल्ले का शान्ति भंग कर रहा था
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-आनन्द.पाठक
09413395592

बुधवार, 18 मार्च 2015

लघु कथा 13 : मान-सम्मान


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"....कुछ तर्बियत बची है कि नहीं कि सब घोल कर पी गये  तुम लोग..." -पड़ोसी अब्दुल चाचा ने नन्हें को लानत भेजते हुए फोन पर साधिकार कहा- " तुम लोगो को मालूम है कि नहीं कि भाई जान यानी तुम्हारे पिता जी एक हफ़्ते से खाट पकड़े है ...पंडित जी को कोई देखने वाला नही...और तुम लोग हो कि.."
पिछले हफ़्ते बाथरूम में फिसल गये  पिता जी ---चोट गहरी लगी थी --खाट पकड़ लिया था  । कोई देखने वाला नहीं--कोई सेवा करने वाला नही। शून्य में कुछ निहारते रहते थे। मन ही मन कुछ बुदबुदाते रहते थे एकान्त में  ।लड़के सब बाहर अपने अपने काम में व्यस्त। देखने कोई नहीं आया  । अब्दुल चाचा ने नन्हें को ख़बर कर दिया  ।
नन्हें भागा -भागा पिता जी को देखने आया ।देख कर घबरा गया।मरणासन्न स्थिति में आ गये हैं अब तो। हालत देख कर आभास हो गया कि पिता जी अब ज़्यादा दिन नहीं चलेंगे।
" भईया ! पिता जी को आप दो महीने अपने यहाँ रख लेते तो मैं अपनी बेटी की शादी निपटा लेता फिर मैं उन्हें अपने यहाँ ले जाता"- नन्हें ने बड़े भाई को टेलीफोन पर अपनी व्यथा बताई
" नन्हें ! तू तो जानता ही है कि मैं हार्ट का मरीज़ हूँ डाइबिटीज है ..सुगर लेवेल बढ़ गया है आजकल....मैं तो ख़ुद ही मर रहा हूँ"- बड़े भाई ने अपनी असमर्थता जताई और पत्नी पार्श्व में खड़ी निश्चिन्त हो गईं
नन्हें ने  छॊटे भाई से बात की--" छोटू ! पिता जी को अगर दो महीने के लिए अपने पास रख..लेता तो......"
बात पूरी होने से पहले ही छोटू बोल उठा-" भईया ! बम्बई की खोली में एक कमरे का मकान भी कोई मकान होता है ---पाँव फैलाओ तो दीवार से सर लगता है...स्साला रोज घुट घुट कर जीना-पड़ता है अरे !--इस जीने से तो मर जाना बेहतर---भईया ! आप मेरी मज़बूरी तो जानते ही हो..." छोटे ने अपनी असमर्थता जताई और पत्नी पार्श्व में खड़ी मुस्कराई
 थक हार कर नन्हे एम्बुलेन्स’  खोजने निकल गया कि कोई उधारी में एम्बुलेन्स मिल जाता तो.....
 पिता जी अकेले खाट पर पड़े शून्य में बड़ी देर तक छत की ओर निहारते रहे....कुछ सोचते रहे...शायद अतीत चलचित्र की भाँति एक बार उनके नज़रों के सामने से घूम रहा था......बेटों के जवाब सुनने से पहले..भगवान ने सुन ली...टिमटिमाटी लौ थी...बुझ गई...कमरे में धुँआ फैल गया ...एक इबारत उभर गई

तमाम उम्र  इसी  एहतियात  में  गुज़री
                  कि आशियाँ किसी शाख-ए-चमन पे बार न हो

[बार =भार]

 नन्हें ने सबको खबर कर दिया ....
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"नन्हें ! तू वहीं रुक ,मैं आ रहा हूँ ! पिता जी का क्रिया-कर्म गाजे-बाजे के साथ बड़ी धूम-धाम से होना चाहिए ..पूरे गाँव को बुलाना है...पूरे शहर को खिलाना है
पूरे शहर में कितना "मान सम्मान"था पिता जी का। शहरवालों को भी तो पता चले कि वकील साहब के लड़को ने मान-सम्मान में कोई कसर नहीं छोड़ी...."-बड़े भाई ने फोन किया

जो ’मर ’ रहे थे वो ’ज़िन्दा’ हो गए .... जल्दी जल्दी तैयार होकर अपनी गाड़ी निकाली और रवाना हो गए---पिता जी की ’विरासत’ सम्भालने और ’नगदी’-गहने भी !

-आनन्द.पाठक
09413395592

मंगलवार, 10 मार्च 2015

लघु व्यंग्य कथा 12 : अस्मिन असार संसारे.....

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---’तीये’ की बैठक चल रही है । पंडित जी प्रवचन कर रहे हैं -"अस्मिन असार संसारे !..इस असार संसार में ..जगत मिथ्या है .ईश्वर अंश ...जीव अविनाशी
ज्ञानी ध्यानी लोगो ने कहा है ---पानी केरा बुलबुला अस मानुस की जात... तो जीवन क्या है... पानी का बुलबुला है ...नश्वर है..क्षण भंगुर है..मैं नीर भरी दुख की बदली...उमड़ी थी कल मिट आज चली...जो उमड़ा ..वो मिटा..जो आया है वो जायेगा ,,’जायते म्रियते वो कदाचित...तो फिर किसका शोक ....जो भरा है वो खाली होगा..यही जीवन है यही नश्वरता है गीता में लिखा है -"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ....अर्थात यह शरीर क्या है माया है ..फटा पुराना कपड़ा है ...आदमी इसे जान ले कि व्यर्थ ही इस कटे-फटे कपड़े को सँवार रहा था तो शरीर छूटने का कोई कष्ट नहीं....शरीर तो दीवार है .मिट्टी की दीवार ..एक घड़े की दीवार की तरह...जल में कुम्भ...कुम्भ में जल है ..बाहर भीतर पानी....फुटा कुम्भ जल जल ही समाना ...यह तथ कहें गियानी---... .."-
--"तुलसी दास जी ने कहा है क्षिति जल पावक गगन समीरा ...जब यह शरीर क्षिति का बना है मिट्टी का बना है तो इसके मिटने का क्या शोक करना.....मिट्टी का तन मिट्टी का मन क्षण भर जीवन मेरा परिचय...तो सज्जनों ! आप सब जानते है ..एक फ़िल्म का गाना है---चल उड़ जा रे पंक्षी कि अब यह देश हुआ बेगाना...शरीर पिंजरा है ..आत्मा पंक्षी है..आत्मा ने पिंजरा छोड़ दिया अब वह और पिंजरे में जायेगी...
पंडित जी ने अपना प्रवचन जारी रखा,, उन्हें आत्मा-परमात्मा जीव के बारे में जितनी जानकारी थी सब उड़ेल रहे थे

और धन ...धन तो हाथ का मैल है ...सारा जीवन प्राणी इसी मैल के चक्कर में पड़ा रहता है...इसी मैल को बटोरता है ..और अन्त में सब कुछ यहीं छोड़ जाता है ..धन तो माया है
धन मिट्टी है शास्त्रों में इसे "लोष्ठ्वत’ कहा गया है ...मगर सारी जिन्दगी आदमी इसी "लोष्ठ’ को एकत्र करता रहता है ..और अन्त में? अन्त में ’धन ’ की कौन कहे वो तो यह मिट्टी भी साथ नहीं ले जा सकता ... आदमी इस मिट्टी को समझ ले तो कोई दुख न हो....जब आवै सन्तोष धन ..सब धन धूरि समान’ अन्त में मालूम होता है कि आजीवन हम ने जो दौड़-धूप करता रहा वो सब तो धूल था ..तब तक बहुत विलम्ब हो चुका होता है---सब ठाठ पड़ा रह जायेगा...जब लाद चलेगा बंजारा...बंजारा चला गया..किस बात का शोक....
पंडित जी घंटे भर आत्मा-परमात्मा--जीव..जगत .माया...धन..मिट्टी आदि समझाते रहे और श्रोता भी कितना समझ रहे थे भगवान जाने

अन्त में ...अब हम सब मिल कर प्रार्थना करें कि भगवान मॄतक की आत्मा को शान्ति प्रदान करें और और परिवार को दुख सहने की शक्ति....."-पंडित जी का प्रवचन समाप्त हुआ

...लोग मृतक की तस्वीर पर ’श्रद्धा-सुमन’ अर्पित करने लगे ...पंडित जी ने जल्दी जल्दी पोथी-पतरा सम्भाला --चेले ने ’लिफ़ाफ़े’ में आई दान-दक्षिणा संभाली..इस जल्दी जल्दी के क्रम में चेले से 2-दक्षिणा का लिफ़ाफ़ा रह गया...पंडित जी की ’तीक्ष्ण दॄष्टि’ ने पकड़ लिया और चेले को एक हल्की सी चपत लगाते हुए कहा-" मूढ़ ! पैसा हाथ का मैल है..लिफ़ाफ़ा’ तो नहीं -यह लिफ़ाफ़ा क्या तेरा बाप उठायेगा..
पंडित जी ने दोनो लिफ़ाफ़े उठा कर जल्दी जल्दी अपने झोले में रख लिए...उन्हे अभी दूसरे ’तीये’ की बैठक में जाना है और वहाँ भी यही प्रवचन करना है---" अस्मिन असार संसारे !....पैसा हाथ का मैल है ....

-आनन्द.पाठक
09413395592

गुरुवार, 5 मार्च 2015

लघु कथा 11 : इवेन्ट मैनेजर

मंच के सभी मित्रों को होली की शुभकामनायें........




"...आप ही ’आनन’ जी है? फ़ेसबुक पर आप ही "अल्लम-गल्लम’ लिखते रहते है तुकबन्दिया शायरी करते रहते है?"-आगन्तुक ने सीधा तीर मारा
" जी आप कौन ?"-मैने प्रश्नवाचक मुद्रा में पूछा
"अरे ! आप ने मुझे नहीं पहचाना? मैं कवि ’फ़लाना’ सिंह ..बहुत दिनों से आप फ़ेसबुक पर दिखाई नहीं दिए तो सोचा आप के दर्शन कर अपना जीवन सँवार लूँ।"
अकारण  स्तुति वाचन से ,मैं सचेत हो गया -: " अच्छा किया कि आप ने अपने नाम के आगे कवि जोड़ दिया है वरना श्रोताओं का कोई भरोसा नहीं कि क्या समझ लें आप को --भ्रम की स्थिति स्वयं दूर कर दी आप ने --हिन्दी साहित्य में फेसबुक के रास्ते बहुत घुसपैठिये आ गये है आजकल.....""मैने कहा

" हें ! हें ! हें !! अच्छा मज़ाक कर लेते है आप भी। आप ने मेरी कविता नहीं पढ़ी ? कल ही छपी है ’फ़लाना’ पत्रिका में ..कतरन तो इन्टरनेट के सभी साईटों पर चढ़ा दी ..सभी मंच पर लगा दी है ...सैकड़ों लोगों ने "लाईक’ किया है दर्ज़नो नें ’वाह , वाह किया...पच्चीसियों ने अपनी ’टिप्पणियाँ लिखी कि ऐसे कविता हिन्दी साहित्य में पिछले 3 दशक से नहीं लिखी गई ..अगर उस समय लिखी जाती तो ’तार-सप्तक’ में अवश्य स्थान पाती....सोचा कि आप का आशीर्वाद भी लेता चलूं"

और उन्होने पत्रिका की कतरन मेरे सामने रख दिया। पढ़ा। सम्पादक ने अपनी तरफ़ से , उनके परिचय में उन्हे वरिष्ठ कवि ..कविता जगत में नया हस्ताक्षर..हिन्दी साहित्य को उनमें छिपी अनेक संभावनाओं का लाभ......एक नये तारे का अभ्युदय....और भी बहुत कुछ लिखा था। मैं तय नहीं कर पा रहा था कि कवि और सम्पादक में कौन महान है ।आप इसे मेरी तंग नज़र भी कह सकते है
" तार सप्तक’ में नहीं छपी तो कोई बात नहीं..."कविता अनवरत" में छप जायेगी ’सूद’ जी छाप रहें है आजकल। 3-खण्ड निकाल चुके हैं अबतक । आप की कविता जो है सो है मगर मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूँ"
" आनन जी ! बस आप तो आशीर्वाद दीजिये इस ग़रीब-उल-फ़क़ीर को"

  मैने आशीर्वाद स्वरूप, मेज की दराज से एक ’रेट कार्ड’ निकाल कर उन के सामने बढ़ा दिया.उन्होने पढ़ा..हल्का सा मूर्छित हुए फिर चेतनावस्था में आते हुए कहा
" अयं ,ये क्या ? इसमें तो सब आईट्म का रेट लिखा है ....सम्मान कराने का .अलग...ताम्र-पत्र का अलग..स्तुति गीत का अलग...नारियल-साल भेंट करने का अलग...श्रोता इकठ्ठा करने का अलग...फोटो खिचवाने का अलग ..समीक्षा करवाने का अलग...आरती करने कराने का अलग....टिप्पणियां ’फ़्री ’ में है .पुस्तक विमोचन करवाने का अलग वरिष्ठ कवियों को आमन्त्रित करने का मय यात्रा-खर्च और ठहराने का रेट अलग....ये सब तो ’इवेन्ट मैनेजमेन्ट का रेट है ."तो क्या आप ने शे’र-ओ-शायरी करना छोड दिया है?"----उन्होने जिज्ञासा प्रगट की

" जी ,बहुत पहले छोड़ दिया फ़ायदे का सौदा नहीं था सो "इवेन्ट मैनेजमेन्ट" कम्पनी खोल ली और आप जैसे "छपास पीड़ित’ लेखकों कवियों की सेवा करता हूँ। कहिए कौन सा ’डेट बुक’ कर दूं । मैं तो कहता हूं कि आप भी यह कविता वविता लिखना छोड़ मेरी कम्पनी ज्वाइन कर लें, सुखी रहेंगे"
" बस बस पाठक जी ! मिल गया आशीर्वाद:"-- कवि ’फ़लाना सिंह -जो गये तो फिर लौट के इधर न आये।
सुना है उन्होने भी कोई कम्पनी खोल रखी है

[नोट : सुरक्षा कारणों से कॄपया ’कवि’ और ’पत्रिका" का नाम न पूछियेगा]
-आनन्द.पाठक.
09413395592


सोमवार, 2 मार्च 2015

एक व्यंग्य लघु कथा 10 : यू टर्न



".....राम राम !राम !! घोर कलियुग आ गया ....अब यह  देश नहीं चलेगा ...चार दिन इन्टर्नेट पर ’चैटिंग क्या कर ली कि सीधे "शादी" कर ली । इन ’फेसबुक" वालों ने तो धर्म ही भ्रष्ट कर के रख दिया ....." पंडित जी ने नाक-भौं सिकोड़ते हुए कथन जारी रखा - "--- अब आप ही  बताइए माथुर साहब !-देखा न सुना ,न घर का पता न खानदान का ...अरे यह भी कोई शादी हुई ....शादी विवाह में जाति देखी जाती है.... बिरादरी देखी जाती है ...अरे हमारे यहाँ तो गोत्र की कौन कहे ..हम तो ’नाड़ी" तक चले जाते हैं.....धर्म-कर्म भी कोई चीज  है कि नहीं ...शास्त्रों में क्या झूट लिखा है ...मनु-स्मृति में ग़लत लिखा है...विजातीय विवाह कोई विवाह होता है ...और वो भी कोर्ट में ...न पंडित न फ़ेरा ..न वर न बरात ..न अग्नि का फेरा .....ऐसे में तो संताने ’वर्ण-संकर’ ही पैदा होगी....धर्म का क्षय होगा "
माथुर साहब धर्म की यह  व्याख्या वह बड़े ’चाव’ से सुन रहे थे कारण कि उनके पड़ोसी अस्थाना साहब की बेटी भाग कर कोई विजातीय " कोर्ट मैरिज" कर ली थी
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कुछ वर्षों पश्चात.....एक दिन

रास्ते में पंडित जी और माथुर साहब टकरा गये.एक "ट्रैफ़िक-पोस्ट" पर.। ....प्रणाम पाती हुआ ...
माथुर साहब---" ...सुना है आजकल आप का ’छुट्टन’ आया है विलायत से छुट्टी पर ..छोटा था तो देखा था अब तो बड़ा हो गया होगा ...साथ में कोई "अंग्रेजन बहू’ भी साथ लाया है... ?
"- बड़ी संस्कारी बेटी है मेरी बहू ....उतरते ही "हाय-डैडू’- कहा ..इसाई "ब्राह्मण" की बेटी है..सुना है उसके पिता भी पूजा-पाठ कराते  है वहाँ । भाई ! शादी विवाह तो ऊपर वाला ही बनाता है..... हम कौन होते हैं ..... क्या देश क्या विलायत ...जोड़ियाँ तो स्वर्ग से ही बनती है...भगवान बनाते है ..सब में एक ही प्राण ,सब में एक ही खून ..सबके खून का एक ही रंग ..ये तो हम हैं कि हिन्दू मुसलिम सिख ईसाई छूत-अछूत कर बैठे हैं...’सर्व धर्म सदभाव देश आगे बढ़ेगा... बहू भी वहाँ नौकरी करती है ..अच्छा पैसा कमाती है..बेटा भी कभी कभी कुछ भेंज देता है .......दोनो राजी-खुशी रहें हमें और क्या चाहिए......

माथुर साहब को इस बहू-कथा में ज़्यादा ’आनन्द’ नही आ रहा था क्योंकि यह उनके पड़ोसी ’अस्थाना" साहब की बेटी की कथा न थी ....
फिर कुछ औपचारिक बात-चीत के बाद दोनों ने अपनी अपनी राह ली
पीछे "ट्रैफ़िक-पोस्ट’ पर लिखा था--" यू-टर्न"

-आनन्द.पाठक-
09413395592

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

एक लघु कथा : चार लाठी

व्यंग्य लघुकथा 09 : चार लाठी
----उनके चार लड़के थे।  अपने लड़कों पर उन्हे बड़ा गर्व था। और होता भी क्यों न । बड़े लाड़-प्यार  और दुलार से पाला था । सारी ज़िन्दगी इन्हीं लड़को के लिए तो जगह ज़मीन घर मकान करते रहे और पट्टीदारों से मुकदमा लड़ते रहे, खुद वकील जो थे ।
गाँव जाते तो सबको सुनाते रहते -चार चार लाठी है हमारे पास ।ज़रूरत पड़ने पर एक साथ बज सकती है ।  परोक्ष रूप से अपने विरोधियों को चेतावनी देने का उनका अपना तरीका था। जब किसी शादी व्याह में जाते तो बड़े गर्व से दोस्तों और रिश्तेदारों को सुनाते -चार चार लाठी है मेरे पास -बुढ़ापे का सहारा।
 इन लड़को को पढ़ाया लिखाया काबिल बनाया और भगवान की कृपा से चारो भिन्न भिन्न शहरों में जा बसे और अच्छे कमाने खाने लगे ।
  समय चक्र चलता रहा जिसकी जवानी होती है उसका बुढ़ापा भी होता है।लड़के अपने अपने काम में व्यस्त रहने लगे । लड़को का धीरे धीरे गाँव-घर आना जाना कम हो गया । समय के साथ साथ गाँव-घर छूट भी गया।पत्नी पहले ही भगवान घर चली गई थी अब अकेले ही घर पर रहने लगे थे -अपने मकान को देखते ज़मीन को देखते ,ज़मीन के कागज़ात को देखते जिसके लिए सारी उम्र भाग दौड की-इन बच्चों के लिए। शरीर धीरे धीरे साथ छोड़ने लगा और एक दिन उन्होने खाट पकड़ ली...अकेले नितान्त अकेले... सूनापन...कोई देखने वाला नहीं--कोई हाल पूछने वाला नहीं...लड़के अपने अपने काम में व्यस्त...कोई उनको अपने साथ रखने को तैयार नहीं ...लड़को को था कि उन्हें अपनी ज़िन्दगी जीनी  है..."बढ़ऊ’ को  आज नहीं तो कल जाना ही है अपने साथ रख कर क्यों अपनी ज़िन्दगी में खलल करें।
-- हफ़्तों खाट पर पड़े रहे ... मुहल्ले वालों ने चन्दा कर ’अस्पताल’ में भर्ती करा दिया। चारों लड़के खुश और निश्चिन्त  हो गये -’पापा की सेवा करने वाली मिल गई-नर्से सेवा करेंगी।  --कोई लड़का न ’पापा’ को देखने गया और न अपने यहाँ ले गया ।वही हुआ जो होना था और एक दिन ’पापा’भी  शान्त हो गये....
----
-कल तेरहवीं थी । चारों लड़के आये थे। एक साथ इकठ्ठा हुए थे पहली बार।
’भईया ! बड़े "संयोग’ से एक साथ इकठ्ठा हुए है हम सब। फिर न जाने कब ऐसा मौका मिलेगा ।’पापा’ का तो फ़ैसला हो गया। जगह ज़मीन का भी फ़ैसला हो जाता तो ....." -छोटे ने सकुचाते हुए प्रस्ताव रखा -बहुओं ने हामी भरी।

मगर .....फ़ैसला न हो सका --चारों ’लाठियां’ औरों पर क्या बरसती आपस में ही बज़ने लग गईं।

-आनन्द.पाठक-
09413395592

मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

व्यंग्य कथा 08 -साहित्यिक जुमला


---- पण्ड्ति जी आँखें मूँद,बड़े मनोयोग से राम-कथा सुना रहे थे और भक्तजन बड़ी श्रद्धा से सुन रहे थे। सीता विवाह में धनुष-भंग का प्रसंग था-
पण्डित जे ने चौपाई पढ़ी
"भूप सहस दस एक ही बारा
लगे उठावन टरई  न टारा "

- अर्थात हे भक्तगण ! उस सभा में "शिव-धनुष’ को एक साथ दस हज़ार राजा उठाने चले...अरे ! उठाने की कौन कहे.वो तो ...
तभी एक भक्त ने शंका प्रगट किया-- पण्डित जी !  ’दस-हज़ार राजा !! एक साथ ? कितना बड़ा मंच रहा होगा? असंभव !
पण्डित जी ने कहा -" वत्स ! शब्द पर न जा ,भाव पकड़ ,भाव । यह साहित्यिक ’जुमला’ है । कवि लोग कविता में प्रभाव लाने के लिए ऐसा लिखते ही रहते है"
भक्त- " पर तुलसी दास जी ’हज़ारों’ भी तो लिख सकते थे ....। "दस हज़ार" तो ऐसे लग रहा है जैसे "काला धन" का 15-15 लाख रुपया सबके एकाउन्ट में  
      आ गया
पण्डित जी- " राम ! राम ! राम! किस पवित्र प्रसंग में क्या प्रसंग घुसेड़ दिया। बेटा ! 15-15 लाख रुपया वाला ’चुनावी जुमला" था । नेता लोग चुनाव में प्रभाव लाने के लिए "चुनावी जुमला ’ कहते ही रहते हैं । ’शब्द’ पर न जा ,तू तो बस भाव पकड़ ,भाव ......

"हाँ तो भक्तों ! मैं क्या कह रहा था...हाँ- भूप सहस द्स एक ही बारा’----- पण्डित जी ने कथा आगे बढ़ाई..

-आनन्द.पाठक
09413395592

शुक्रवार, 13 फ़रवरी 2015

एक लघु कथा 07- गिद्ध दृष्टि



----  वो अपनी माँ के चार बेटों में सबसे छोटा बेटा था ।  माँ ने बड़े प्यार दुलारा से पाला था कि उसका बेटा डाक्टर बन जाय ।  माँ के आशीर्वाद से वह डाक्टर बन भी गया
... जीवन के आखिर में माँ को "लकवा" मार गया और वो शैया ग्रस्त हो गई। 3-महीने तक खाट पर पड़ी रही ,उठ बैठ नहीं सकी, आँखे निरन्तर राह देखती रही  कि "छुट्ट्न" एक बार आ जाता तो देख लेती....खुली आंखें हर रोज़ छत को निहारती रही ....मगर ’वह’ नहीं आया ।एक ही बहाना -कार्य की व्यस्तता।---वो पिछले 2-साल से एक नि:संतान "बुढ़िया’ की प्राण-प्रण से सेवा कर रहा था क्योंकि उस "बुढिया’ के पास 3-कठ्ठा ज़मीन का टुकड़ा था और उस की कोई सन्तान नही थी।
... प्रतीक्षा करते करते आखिर माँ ने एक दिन आँखें मूद ली । माँ की ’तेरहवीं’ में आया मगर ’ब्रह्म भोज’ खाने से पहले ही फ़्लाइट से वापस चला गया।कारण वही -कार्य की व्यस्तता। उसे मालूम था घर की ज़मीन तो बँट्वारे में मिलेगी ही मिलेगी ,जो मर गया उसको कौन रोये जो मरने जा रही है उसको पकड़ो
---कुछ दिनों बाद वो ’बुढ़िया" भी मर गई और उसने वो ज़मीन अपने नाम लिखवा लिया था।

वो लड़का ’गिद्ध’ तो नहीं था ,मगर - ’गिद्ध-दॄष्टि’-ज़रूर थी।

-आनन्द.पाठक-
09413395592

बुधवार, 11 फ़रवरी 2015

एक लघु व्यंग्य कथा-06 : नेता जी और मेढक

एक लघु व्यंग्य कथा- 06

.......... नेता जी ने तालाब का उद्घाटन कर दिया। तालियां बजने लगीं।किनारे पर बैठा मेढक, मारे डर के छपाक से पानी में कूद गया
तालाब में मेढक के साथियों ने पूछा- क्या हुआ?  घबराए हुए क्यों हो?
मेढक - मैने एक नेता देखा
अन्य मेढक ने पूछा  - नेता कैसा होता है?
मेढक - बड़ी बड़ी तोंद होती है ।सफ़ेद खादी का कुर्ता पहनता है । टोपी पहनता है और पहनाता है
अन्य मेढक ने पूछा- खादी कैसा होता ?
मेढक -सफ़ेद होता है
अन्य मेढक - तोंद कैसी होती है ?
इस बार मेढक सावधान था .।उसे मालूम था कि पिछली बार उस के पिताश्री इन्ही मूढ़ मेढकों को "बैल" का आकार समझाने के चक्कर में पेट फुला फ़ुला कर समझा रहे थे कि मर गए  । इस बार का मेढक समझदार था।
मेढक ने कहा - तुम सब मेढक के मेढक ही रहोगे। बाहर चल कर देख लो कि नेता का तोंद कैसा होता है?
सभी मेढक टर्र टर्र करते उछलते कूदते नेता जी का तोंद देखने किनारे आ गये ।मगर नेता जी उद्घाटन कर वापस जा चुके थे
मेढको ने कहा -नेता का तोंद कैसा होता है?
इस बार मेढक पास ही बैठे जुगाली करते हुए सफ़ेद साढ़  की पीठ पर उछल कर जा बैठा और बोला-"ऐसा"
तभी से सभी मेढक ’जुगाली करते साँढ़’ को ही ’नेता’ का पर्याय मानने लगे ।
वो मेढक कुएँ के मेढक नहीं थे ।

-आनन्द पाठक-
09413395592