गुरुवार, 21 मई 2009

एक व्यंग : कुत्ता बड़े साहब का .....

एक व्यंग : कुत्ता बड़े साहब का .....
वह बड़े साहब हैं.बड़ी -सी कोठी,बड़ी-सी गाडी, बड़ा-सा मकान ,बड़ा -सा गेट और गेट पर लटका बड़ा-सा पट्टा-'बी अवेयर आफ डाग" कुत्ते से सावधान सम्भवत: बड़ा होने का यही माप-दण्ड हो. चौकीदार चपरासी अनेक ,पर साहब एक मेंम साहिबा एक .परन्तु मेंम साहिबा को एक ही दर्द सालता था हिंदी के प्रति हिंदी के व्याकरण के प्रतिहिंदी में "कोठी" का बड़ा रूप "कोठा" क्यों नहीं होता ?हम मेंम साहिबा का दर्द महसूस करते हैं परन्तु उनकी मर्यादा का भी ख्याल रखते हैं.
परन्तु मोहल्ले के मनचले कब ख्याल रखते हैं.कल साहब के साला बाबू व जमाई बाबू गर्मियों की छुट्टियां व्यतीत करने आये थे बाहर-भीतर चहल-पहल थी लोग स्वागत-सत्कार में व्यस्त हो गए.मगर मनचले! मनचलों ने 'कुत्ते से सावधान' में 'कुत्ते' के आगे एक 'ओ' की मात्रा वृद्धि कर दी -'कुत्तों से सावधान' नहीं नहीं यह तो ज्यादती है 'साला' और 'जमाई' ही तो आये हैं और यह बहु-वचन.!
प्राय: जैसा होता हैं. एक बार पट्ट टंग गया तो टंग गया .कौन पढ़े रोज़ रोज़ !ऐसा ही चलता रहता अगर उस दिन कमिश्नर साहब ने टोका न होता
" अरे सक्सेना ! कितने कुत्ते पाल रखे हो ?"
" नो सर ,यस सर,यस सर ,हाँ सर!एक मैं और एक मेरा कुत्ता सारी सर मेरा मतलब है कि मैं और कुत्ता
बड़े साहब ने अपनी अति विनम्रता व दयनीयता प्रगट की.
नतीजा? भूल सुधार हुआ और एक चपरासी की छुट्टी .
मनचले तो मनचले .एक दिन रात के अँधेरे में 'कुत्ते से सावधान ' के नीचे एक पंक्ति और जोड़ दी ..." और मालिक से भी". लगता है इन निठ्ल्लुओं को अन्य कोई रचनात्मक कार्य नहीं .व्यर्थ में मिट्टी पलीद करते रहते हैं. खैर सायंकाल साहब की दृष्टि पडी ,भूल सुधार हुआ परन्तु बोर्ड नहीं हटा. संभवत: बोर्ड हटने से साहब श्रीहीन हो जाते ,कौडी के तीन हो जाते,जल बिनु मीन हो जाते .
साहब ने नीचे की पंक्ति क्यों मिटवाई? आज कल तो 'शेषन' को बुल डाग एल्सेशियन क्या क्या नहीं बोलते हैं !जितना बड़ा पद,उतना बड़ा विशेषण, उतनी बड़ी नस्ल . और एक हम कि हमें कोई सड़क का कुत्ता देशी कुत्ता ,खौराहा कुत्ता भी नहीं कहता .इस जनम में तो 'शेषन' बनने से रहा .लगता है यह दर्द लिए ही इस दुनिया से 'जय-हिंद' कर जाऊँगा .हाँ यदा-कदा श्रीमती जी झिड़कती रहती हैं -क्या कुत्ते कि तरह घूमते रहते हो मेरे आगे -पीछे ..." मगर यह एक गोपनीय उपाधि है
साहब लोगों के कुत्ते होते ही हैं विचित्र विकसित मेधा-शक्ति के. आदमी पहचानते हैं,'सूटकेस' पहचानते हैं 'ब्रीफ केस' पहचानते हैं .यदा-कदा साहब की कोठी पर आगंतुक सेठ साहूकारों की 'अंटी' व अंटी का वज़न भी जानते हैं.कहते हैं इनकी घ्राण-शक्ति अति तीव्र होती है .बड़े साहब से भी तेज़ .आप अन्दर दाखिल हुए नहीं कि वह तुंरत दौड़ कर आप के समीप आएगा ,आप को सूंघेगा,अंटी सूंघेगा सूटकेस सूंघेगा.माल ठीक हुआ तो तुंरत आप के श्री चरणों में लोट-पोट हो जाएगा .कूँ-कूँ करने लगेगा पूँछ हिलाने लगेगा कभी दौड़ कर साहब के पास जाएगा ,कभी आप के पास आएगा बरामदे में बैठा साहब संकेत समझ जाएगा.खग जाने खग की भाषा " "आइए आइए ! इतना भारी 'सूटकेस 'उठाने का कष्ट क्यों किया ,कह दिया होता तो ......"
और साहब बड़े सम्मान व प्रेम से आप को सीधे शयन कक्ष तक ले जाएंगे
उस दिन ,हम भी साहब की कोठी पर गए थे .व्यक्तिगत समस्या थी.स्थानांतरण रुकवाने हेतु प्रार्थना पत्र देना था.प्रार्थना-पत्र हाथ में था .सोचा प्रार्थना करेंगे ,साहब दयालु है ,संभवत: कृपा कर दें
सहमते-सहमते कोठी के अन्दर दाखिल हुआ 'बुलडाग' साहब दौड़ कर आए आगे-पीछे घूमे,कुछ अवलोकन किया ,कुछ सूँघा कि अचानक जोर-जोर से भौकना शुरू कर दिया .संभवत: संकेत मिल गया ,मैं विस्मित हो गया .
"बड़े बाबू! कितनी बार कहा हैं कि आफिस का काम आफिस में डिस्कस किया करो /सारी आई ऍम बिजी "- कह साहब अन्दर चले गए
" सर! सर! ...." मैं लगभग गूंगियाता ,धक्के खा कर फिंके जाने की स्थिति में आ गया
काश ,मेरे पास भी ब्रीफकेस होता
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मन आहात हो गया .कुत्ते ने क्या संकेत दिया ? वह बड़े साहब हैं तो क्या हुआ ? हम भी बड़े बाबू हैं .दो-चार लोग हमारे भी अधीनस्थ हैं.अत: मैंने भी एक कुत्ता पाल लिया बिलकुल शुध्द ,भारतीय नस्ल का स्वदेशी ,देश की माटी से जुड़ा,अपनी ज़मीन का
अपने हे परिवेश अपनी ही संस्कृति का कम से कम उचित संकेत तो देगा
उस दिन एक पार्टी (क्लाइंट?) आई थी.कुछ सरकारी कार्य करवाना था फाइल रुकी थी बढ़वाना था .मेरा 'शेरू 'दौड़ कर आया ,आगे -पीछे घूमा सम्यक निरीक्षण किया ,कुछ सूँघा .जब आश्वस्त हो गया तो 'क्लाइंट' के श्री चरणों में लोट-पोट हो कूँ -कूँ करने लगा मन प्रफ्फुलित हो गया 'शेरू' ने सही पहचाना मैं अविलम्ब उसे अपने बैठक कक्ष में ले गया स्वागत-भाव,आतिथ्य -सत्कार किया
चाय-पानी ,नाश्ता-नमकीन ,मिठाई प्रस्तुत किया उनका कार्य समझा ,आश्वासन दिया बदले में वह जाते-जाते एक लिफाफा थमा गए--"
पत्रं-पुष्पं हैं बच्चों के लिए "
'हे! हे! इसकी क्या ज़रुरत थी ? -मैंने विनम्रता पूर्वक .ससंकोच लिफाफा ग्रहण कर लिया
जल्दी-जल्दी विदा कर लिफाफा खोला देखा पांच-पांच के पांच नोट स्साला ,काइयां तीस रुपये की तो मिठाई -नमकीन खा गया और यह स्साला 'शेरू'? कुत्ते की औलाद /देशी नस्ल स्साला गंवई का गंवई रह गया पार्टी भी ठीक से नहीं पहचानता लात मार कर भगा दिया उसी दिन उसे

० ०० ०००

अगले दिन साहब ने अपने कार्यालय -कक्ष में बुलाया--" बड़े बाबू ! सुना है तुम ने भी एक कुत्ता पाल रखा है "---बड़े साहब ने चश्में के ऊपर से देख एक कुटिल व व्यंगात्मक मुस्कान उड़ेलते हुए कहा
" नो सर! यस सर! हाँ सर! "- मैंने लगभग घिघियाते हुए कहा -" सर कल शाम ही उसे लात मार भगा दिया गंवई नस्ल का था स्साला क्लाइंट भी ठीक से नहीं पहचानता था "
" करने को क्लर्की और शौक अफसराना" --बड़े साहब ने कहा
खैर ज़नाब ! कुत्ता पालने का अधिकार तो बड़े साहब लोगो को है जब तक पद है ,कुर्सी है तब तक कुत्ते की आवश्यकता है ,जानवर की शकल में हो या आदमी ,चमचे(दलाल) की शकल में क्लाइंट पहचानना है इसीलिए आज भी बोर्ड टंगा है ---
"कुत्ते से सावधान '

--आनंद

2 टिप्‍पणियां:

नारदमुनि ने कहा…

saheb ka dog mara duniya shok jatane aai, saheb chalte rahe koi nahi aaya, narayan narayan

नारदमुनि ने कहा…

saheb ka dog mara, duniya shok jatane aai, ek din saheb chalte rahe, koi nahi aaya. narayan narayan