शनिवार, 25 जुलाई 2009

एक व्यंग्य : सखेद सधन्यवाद ,....

इधर विगत कुछ दिनो से जब मेरी रचनाएं ’सखेद सधन्यवाद’ वापस आने लगी तो मुझे हिंदी की ’दशा’ व ’दिशा’ दोनों की चिन्ता होने लगी।अब यह देश नहीं चलेगा। रोक देंगे हिंदी के विकास रथ को ये संपादकगण। ले डूबेंगे हिंदी को ये सब।जितने उत्साह व तत्परता से मैं अपनी रचना भेजता था उससे दूने उत्साह से संपादकगण उसे ’सखेद सधन्यवाद’कर देते थे। कहते हैं कि कुछ अति उत्साही युवा संपादक तो अपनी प्रेमिका के ’प्रेम-पत्र’ भी ’सखेद सधन्यवाद’कर देते है ;और प्रौढ़ संपादकों की प्रौढ़ पत्नियाँ तो ’सखेद सधन्यवाद’ मायके में पड़ी पड़ी ’कर्म’ का रोना रोती रहती हैं ।
वैसे रचनाएं लौटती तो बहुतों की हैं ,मगर प्रत्यक्ष प्रगट नहीं करते ।यदि किसी ने पूछ लिया तो कहते हैं -’भईए !मैं छ्पास में विश्वास नहीं करता ।मैं तो ’स्वान्त: सुखाय ,बहुजन हिताय’ लिखता हूँ ।यदि मेरी रचना से इस असार संसार का एक भी प्राणी प्रभावित हो जाय तो मैं अपनी रचना की सार्थकता समझूँगा।यही मेरा पुरस्कार है ,यही मेरा सुख। यह बात अन्य है कि यह हितकारी कार्य अब तक नहीं हुआ है। पत्रिका कार्यालयों में तो वह संपादकों की आरती उतारने जाते हैं। अगर भूले-भटके ’फ़िलर-मैटेरियल’ के तौर पर यदा-कदा कोई रचना छ्प भी गई तो अति श्रद्धाविनत हो कहते हैं-’अरे क्या करें ! यह पत्रिकावाले मानते ही नहीं थे,बहुत आग्रह किया तो देना ही पड़ा।
फ़िर रचना की छ्पी प्रतियां बन्दरिया की तरह सीने से लगाए गोष्ठी-गोष्टी घूमते रहते हैं
मैं उन लोगो में से नही। स्वीकरोक्ति में विश्वास करता हूँ। जब कोई रचना वापस आ जाती है तो मैं भगवान से अविलम्ब प्रार्थना करता हूँ ’हे भगवान दयानिधान ! इन संपादकों को क्षमा कर इन्हे नहीं मालूम कि यह क्या कर रहे हैं ,हमें यह नहीं मालूम कि हम क्या लिख रहे हैं’
सत्य तो यह है कि मेरी कोई रचना आज तक छ्पी ही नहीं। ’सखेद सधन्यवाद’ की इतनी पर्चियां एकत्र हो गई हैं मेरे पास कि इण्डिया गेट पर बैठ आराम से "झाल-मुढ़ी’ बेंच सकता हूँ। वैसे बहुत से लेखक यही करते हैं मगर जरा बड़े स्तर पर। अपने अपने स्तर का प्रश्न है।
"मिश्रा ! अब यह देश नही चलेगा ,हिंदी भी नहीं चलेगी।"- मैने लौटी हुई समस्त रचनाओं की पीड़ा समग्र रूप से उड़ेल दी।
" क्या फिर कोई ’अमर’ रचना वापस लौट आई है?’-मिश्रा ने पूछा
"अरे! तुम्हे कैसे मालूम?"-मैनें आश्चर्यचकित होकर पूछा
"विगत पाँच वर्षों से तुम यही रोना रो रहे हो.। सच तो यह है बन्धु ! भारतेन्दु काल से लेकर ’इन्दु काल’ (कवि या कवयित्री यदि कोई हों) तक हिंदी ऐसे ही चल रही है ।सतत सलिला है ,पावन है । सतत प्रवाहिनी गंगा कैसे मर सकती है?
मिश्रा जी अपने इस ’डायलाग’ पर संवेदनशील व भावुक हो जाया करते है और हिंदी प्रेम के प्रति आँखों में आँसू के दो-चार बूँद छ्लछ्ला दिया करते हैं।
’परन्तु गंगा में प्रदूषण फैल तो रहा है न’- मैने उन्हें समझाना चाहा
’ज्यादा कचरा तो यह ’बनारस’ वाले डालते हैं’- उन्होने मेरी तरफ़ एक व्यंग्य व कुटिल मुस्कान डालते हुए कहा
’और इलाहाबाद वाले क्या कम प्रदूषित करते हैं’-मैने भी समान स्तर के व्यंग्यबोध में प्रतिउत्तर दिया
’देखिए मैं कहे देता हूँ ,मेरे शहर को गाली मत दीजिए’
’तो आप ने कौन सी आरती उतारी है’
’आप ने इलाहाबाद को पढा है? आप कैसे कह सकते है कि कचरा इलाहाबाद वाले डालते हैं?’
’क्यों नहीं कह सकता? जिस ज्ञान से आप बनारस वालों को कह सकते हैं’
’तुम्हारी इसी संकीर्ण मानसिकता से तुम्हारी रचानाएं वापस आ जाती है।अरे! मैं तो कहता हूँ कि वह संपादक भले हैं जो ऐसा कचरा लौटा देते हैं ,वरना तुम्हारा लेखन तो लौटाने योग्य भी नही है’
मैं ’हिटलर" की तरह फ़ुफ़कारने वाला ही था,फ़ेफ़ड़े में श्वास भर ही रहा था कि मिश्रा ने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया। ’सखेद सधन्यवाद’ वाली नस।मैं ’हिटलर’ से ’बुद्ध’ बन गया।कहा-
’मिश्रा ! हिंदी का भट्ठा कचरे से नहीं बैठता ,बैठता है हमारी-तुम्हारी लड़ाई से।
मिश्रा जी ठण्डे हो गये। हिंदी के साहित्यकार थे/
’मगर मिश्रा जी, हमें तो इसमें संपादकों का कोई बड़ा षड्यन्त्र लगता है। विदेशी मीडिया का भी हाथ हो सकता है।हो सकता है कि किसी पड़ोसी देश की राजनैतिक साजिश हो कि हिंदी को पनपने ही न दो, पाठक जी की सारी रचनाएं सखेद सधन्यवाद वापस करते रहो। हमें इसके विरुद्ध एक सशक्त आन्दोलन चलाना चाहिए,एक बड़ा संघर्ष छेड़ना चाहिए।
" मगर हिंदी में संघर्ष तो खेमा से चलता है.बड़ा खेमा ,बड़ा संघर्ष ।बारह खम्भे ,चौसठ खूँटा।"
" अरे है ना, जुम्मन मियाँ से कह कर बड़ा खेमा लगवा लेंगे"
"और योद्धा?"
" हैं न ,हम ,तुम और वो"
"वो कौन?- मिश्रा ने सशंकित दॄष्टि से देखा
"वो? अरे वह नुक्कड़ का पाण्डेय पानवाला,जब तक पान लगाता है मेरी कविता बड़े चाव से सुनता है। और जानते हो?असली योद्धा तो दो-चार ही होते हैं,अन्य तो मात्र ’बक-अप’ बक-अप’ करते रहते हैं"- मैनें मिश्रा जी की जिज्ञासा शान्त की।
आन्दोलन छेड़ने के लिए मानसिक धरातल तैयार कर लिया। कुछ अग्नि-शिखा से शब्द,कुछ विष-सिक्त वाक्य रट लिए।आन्दोलन का शुभारम्भ स्थानीय स्तर से हो तो उत्तम है। दुर्वासा बन कर एक स्थानीय संपादक के कार्यालय में घुस गया और फुँफकारते हुए कहा-
"आप लोगो ने सत्यानाश कर दिया है हिंदी का।’
" आप जैसे कितने कुकुरमुत्ते उग आए है आज कल।"- उक्त संपादक दूसरा दुर्वासा निकला
"देखिए ! कुत्तों को गाली मत दीजिए "- मैने कुत्तो के प्रति समर्थन जताते हुए कहा
"क्यो न दूँ ,यहाँ जो भी आता है अपने को प्रेमचन्द बताता है। चैन से सोने भी नहीं देते उस महान आत्मा को"
"आप ने मेरी रचनाएं पढी है?"
" पढ़ी है ,अरे मैं पूछ्ता हूँ कि वात्सायन (कामसूत्र वाले) से आगे भी कुछ लिखा गया है कि नहीं?
" जब तक आप अतीत से जुड़ेगे नहीं...’काम’ से जुड़ेगे नहीं...."
इससे पूर्व कि मैं अपनी बात पूरी करता ,दो लोगो ने मुझे सशरीर उठा कर ’सखेद सधन्यवाद ’ कर दिया।
०० ००००० ००००
मिश्रा जी सुबह सुबह आ गये।
" मिश्रा जानते हो ,कल मैं एक संपादक से मिला था ।खूब खरी-खोटी सुनाई। मैने कहा कि आप लोगो ने हिंदी का सत्यानाश कर रखा है"
" अच्छा ! -मिश्रा जी उत्सुक हो सुनने लगे -" तो क्या कहा उसने’
’यही तो रोना है ,कहा कुछ भी नहीं ,सशरीर सखेद कर दिया अपने कक्ष से "
अभी युद्ध वर्णन चल ही रहा था कि डाकिए ने आकर एक लिफ़ाफ़ा थमाया। खोला तो देखा रचना प्राप्ति व प्रकाशन-स्वीकृति पत्र था। मन ही मन नतमस्तक हुआ उस संपादक के प्रति।उसके हिंदी प्रेम के प्रति । अरे! क्या हुआ जो उसकी पत्रिका वर्ष में एक बार छपती है। छपती तो है न ।ग्रामीण पॄष्ट भूमि की.गाँव की सोंधी मिट्टी से जु्ड़ी, जहाँ भारत की आत्मा आज भी बसती है ।
" देख मिश्रा ,मैं कहता था न , अब भी कुछ सुधी संपादक हैं"
"और वह खेमा? वह आन्दोलन?"
" छोड़ो यार ! बाद में देखेंगे ।अभी मुझे अगली रचना भेजनी है"
और मैं अपनी कलम में स्याही भरने लगा।
।अस्तु।
-आनन्द

कोई टिप्पणी नहीं: