शुक्रवार, 7 अगस्त 2009

एक व्यंग्य: समर्पित है ....

एक व्यंग्य : समर्पित है....
पाण्डुलिपि तैयार हो गई। काफी श्रम से लिखा था।दिन को दिन नहीं ,रात को रात नहीं समझा।छ्पास की जल्दी थी।हिंदी का लेखक लिखने में जल्दी नहीं करता ,छपने की जल्दी में रहता है। परन्तु जिस का भय था ,वही हुआ।समर्पण का।संग्रह समर्पित नहीं तो रचना क्या !,कन्या रूचि वदन नहीं तो सजना क्या!दिव्यानन्द की अनुभूति तो रचना समर्पण में है।अन्यथा सारा परिश्रम व्यर्थ।समर्पण हमारी संस्कृति है ,हमारी राष्ट्रीय नीति है,अमेरिका के प्रति समर्पण ,बहुदेशीय कम्पनियों के शर्तों के प्रति समर्पण,कांधार आतंकवादियों के शर्तों के प्रति समर्पण,पाश्चात्य मूल्यों के प्रति समर्पण,गिरते मूल्यों के प्रति समर्पण। ’समर्पण’ही किसी रचना का सार-तत्व है।
अन्यथा ,कहानी लेखन में क्या है? कुछ दाएं-बाएं ,कुछ ऊपर-नीचे देख, विदेशी कहानियाँ पढिये और लिख मारिए हिंदी में। क्या पता चलेगा।’डेज़ी’ को ’दासी’ कर दीजिए,’सैमुअल ’ को ’सोम अली’, ’माईकल’ को ’मुकुल’ । चलेगा ,सब चलेगा हिंदी में। वैसे भी हिंदी का पाठक कौन सा किताब पढता है, खरीद कर पढने का तो प्रश्न ही नहीं। अब तो लेखकीय प्रतियां भी निशुल्क नहीं मिलती।पकड़े गये तो क्या।एक टिप्पणी दे देंगे,कह देंगे भाव उनके हैं तो क्या ,भाषा तो अपनी है .परिवेश तो अपना है।सामाजिक परिस्थितियां तो अपनी है,,संस्कॄति तो अपनी है ।कला-पक्ष तो अपना है ।अनुकरण करना भी तो एक कला है।वैसे सामान्य पाठक से आप निश्चिन्त रहें । यह पकड़ने-धकड़ने का कार्य कुछ विशेष प्रकार के प्राणी करते हैं जिन्हे आलोचक कहते हैं
आप आलोचकों की चिन्ता न करें। उनका कार्य ही है आलोचना करना।बताना कि अमुक कहानी ,किस कहानी की नकल है.। मूल कहानी में नायक कहाँ-कहाँ छींका था जो आप की कहानी में छूट गया है। वह उनकी अपनी शैली है जिसे वह ’खोज परक’ शोध कहते हैं। आप का क्या है । आप ’मास’ के लिए लिखतें हैं ’मासिक" पर लिखते हैं’ । सर्वहारा वर्ग के लिए लिखते हैं तो आलोचकों का क्या बिगड़ता है? वैसे रहस्य की बात बता दूँ। इन छुट भैयो की आलोचना मूलत: अपनी नहीं होती। "होल-सेलर’ से खरीदते हैं और ’रिटेल’ में बेच देते है।अपना-अपना व्यापार है।वह साहित्य की सेवा अपनी विधा में करते हैं ,आप अपनी विधा में करे-नकल विधा में।
हाँ, तो पाण्डुलिपि पूर्ण हुई।रहस्य की बात है कि इन्ही कुछ मिर्च-मसालों से, फार्मूला फिल्म के तरह ,मुम्बईया फिल्म शैली में,कई कहानियाँ ताबड़-तोड़ लिख मारी। संपादकों की ’सखेद-सधन्यवाद ’ कॄपा दॄष्टि से छ्पनी तो थी नहीं। तो सोचा स्वयं ही संग्रह बना छ्पा डालें। अन्तरात्मा नें पीठ ठोंकी ,वाह ! वाह ! क्या अभिनव प्रयोग है ! हिंदी कहानी में ’रूपान्तरवाद"-नकलवाद? इस नवीन वाद का प्रयोग हमारे ही कहानी संग्रह से प्रारम्भ हुआ और इसी से खत्म भी। कहते हैं कोणार्क मन्दिर अपने युग के समकालीन मन्दिरों में सबसे अन्त में निर्मित हुआ था और सबसे पहले ध्वस्त हुआ था । अत: मेरे वाद का कोई नामलेवा न बचा।
अभी प्रस्तावना लिखना शेष था । दूल्हे के सर पर ’सेहरा’ नहीं तो रीता है ,संग्रह प्रस्तावित नहीं तो फ़ीका है।सोचा ,दूर कहाँ जाएं, मुहल्ले में ही एक ’स्वनामधन्य’ ’लपक-प्रतिष्ठित" साहित्यकार हैं,लिखवा लेते हैं ।किसी कालेज़ में हिंदी विभागाध्यक्ष पद पर ’तिष्ठित’ हैं और यह पद उन्होने ’लपक’ कर लिया था।प्रयास करता तो यह प्रस्तावना मैं भी लिख सकता था । मगर अपने मुँह मियां मिठ्ठू कैसे बनता? सामयिक साहित्यकार क्या कहते!।
परन्तु उन तथाकथित महोदय ने जो प्रस्तावना लिखी ,वह भी हमारी शैली में लिखी-नकल प्रधान शैली। प्रतीत होता था सारी उम्र उन्होने कई पुस्तकों की मात्र प्रस्तावना ही पढ़ी होगी और घोंट-घांट कर एक मिश्रण तैयार कर दिया था जो हर रोग में दिया जा सकता था।यदि आप ने कहानी लिखी है तो वह आप की ’काव्य-चेतना’पर प्रकाश डालेंगे।’फैन्टेसी’ लिखी है तो ’यथार्थवाद’ पर। यदि कोई ’रोमान्स-कहानी लिखी है तो प्रस्तावना में आप के मुहल्लेवाली लडकी के प्रेम-प्रसंग की चर्चा कर कहानी में जीवन्तता व प्रासंगिकता स्थापित कर देंगे।ये सिद्धहस्त होते हैं। उन्होने जो प्रस्तावना मेरे संग्रह के लिखी थी उसका दूर-दूर तक कहीं भी, मेरी कहानियों से नैतिक या अनैतिक संबंध नहीं था । पढा़ तो अन्तरात्मा चीत्कार कर उठी-’अरे मूढ पुरूष !कृशन चन्दर के गधे ! कस्तूरी कुण्डल बसे मृग ढूढे बन माहि। अरे भद्र पुरूष !जब तू इतनी नकल-प्रधान कहानियां लिख सकता है तो नकल प्रधान प्रस्तावना नहीं लिख सकता क्या? उठ जाग, अन्तस की शक्ति को पहचान,जगा अपनी कुण्डलिनी और कर सत्यानाश हिंदी का....।
मेरी कुण्डलिनी न जगनी थी न जगी।उक्त स्वनामधन्य महापुरुष से प्रस्तावना लिखवाने में जो सुरा-सोम और दो-चार दिन का मध्याह्न व रात्रि भोज पर खर्च हुआ था,आय-व्यय देखते हुए ,उसी प्रस्तावना से काम चलाया।
मगर समर्पण? सोचा अब लौ नसानी ,अब ना नसैहॊं । अब अन्यत्र नहीं जाउँगा। स्वयं ही लिखूँगा ।मगर किसको?? उसको ,उस अंग्रेज़ी लेखिका को ,जिसकी कहानी का रूपान्तर गुप्त रूप से मैनें हिंदी में कर दिया था या उस ’रशियन’ को जिसकी मूल कहानी को हिंदी में क्षत-विक्षत कर दिया था ,या उस चेकोस्लाविक लेखक को जिसकी कहानी का मैने ’मिक्स्ड-चाट’ बना दिया था ।सोचा बहुत सारे "उस" हो गए अत: सभी लेखकों को श्रद्धा व सम्मान देते हुए एक सर्वमान्य सन्तुष्ट शब्द " उसको" समर्पित कर देंगे। अन्तरात्मा ने पुन: दुत्कारा -"अरे आर्य पुत्र ! कुछ तो मौलिक कर ,समर्पण तो मौलिक लिख।
मेरा मौलिकत्व जाग उठा।समस्त मोह माया त्याग कर लिख मारी प्रथम पॄष्ठ पर प्रथम पंक्ति :--
" समर्पित है
अपनी "उसको"
जिसकी प्रेरणा से
यह संग्रह निर्विघ्न निकालना
सम्भव हुआ "
मगर हतभाग्य !न जाने किस दिशा से श्रीमती जी आ टपकीं।प्रथम पॄष्ठे अग्निपात:।पढा़ तो उबल पड़ीं। वाह! वाह ! क्या समर्पण किया है ! कौन है वह ’कलमुही ? सारी रात परेशान करें हमे , रात-रात भर काफ़ी बनाउँ मैं, कलम-दवात लाउँ मैं, बच्चे सुलाउँ मैं और समर्पण किया "उसको"? कौन है कुलच्छ्नी ,हराम....? अरे कॄतघ्नी पुरुष !हमारे तो भाग्य ही खोटे थे जो तुम जैसे ’ कलम-घिसुए’ से शादी हो गई।अरे! तुमसे अच्छा तो वह बनारस वाला दरोगा था । अहा ! क्या जवां मर्द था ! कम से कम ऊपरी आमदनी तो थी ,तुम्हारे जैसा चप्पल तो नही घिसता फिरता था।अरे ! वाह रे हिंदी जगत के प्रेमचन्द! कुछ तो शर्म हया रखी होती इन चश्मीली आँखों में । मुझको समर्पित न करता न सही मगर "उसको" तो न करता......."
श्रीमती जी चीखते-चीखते चिल्लाने लगीं। अन्तिम अस्त्र ,अचूक निशाना।आँखों से अश्रु की धारा ,मुँह से गालियों का (जो उल्लेख करने योग्य नहीं और सभ्य पाठकों के सुनने योग्य नहीं ) पनाला बहता रहा। तत्पश्चात ,उन्होने एक कठोर भीष्म-प्रतिज्ञा की जो प्रसंगानुकूल व समयोचित भी था।
" ऊपर चलते पंखे व नीचे ह्स्त-बेलन को साक्षी मान ,जो भी चर-अचर,कलम-दवात,स्थावर-जंगम,जड़-चेतन, जीव जगत में व्याप्त हैं और वह जन्तु जो उष्ट्रवत सम्प्रति कुर्सी पर बैठा है ,मेरा यह सत्य-वचन सुने।मैं आर्य-पुत्री ,जो भी मेरा नाम हो, एक श्वाँस में घोषणा करती हूँ यदि निकट भविष्य में किसी दूसरी शादी का सुखद सुयोग प्राप्त हुआ तो मैं किसी "कलम-घिसुए" से शादी नहीं करूँगी ....साथ ही यह भी सुने..."
संभवत: निकट भविष्य में उक्त सुखद सुयोग की क्षीण आशा से उनकी आँखों से अविरल अश्रुधारा बह निकली। मैने लाख समझाया स्पष्टीकरण दिया ,स्थिति स्पष्ट की ,परन्तु मेरे इस लप्पो-चप्पो नवनीत लेपन का प्रभाव न पड़ना था ,न पडा़। न मानना था,न मानी।
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पाठकों की जानकारी के लिए ,जिस संग्रह की लेखन नींव ही ऐसी हो ,उसका छपना क्या ,उसका बिकना क्या।प्रकाशक महोदय सारी प्रतियां घर पर पटक गये । और अब मैं आजकल हर मिलने-जुलने वाले आगन्तुक को एक-एक प्रति भेंट कर रहा हूँ-चाय-पानी-नाश्ते के साथ। हानि-लाभ की बात छोड़िए । स्पष्ट हो गया होगा कि यह मेरा प्रथम दुस्साहस व अन्तिम प्रयास है। बकौल बाल स्वरूप ’राही’ जी---

कौन बिजलियों की धमकियाँ सहता
खुद आशियां अपना जला दिया मैंने

॥अस्तु॥


---आनंद पाठक

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