बुधवार, 21 नवंबर 2012

.....छपाना एक पुस्तक का (भाग-1)

प्रिय पाठको ! बहुत दिनों बाद इस ब्लाग पर लौटा हूं ,कहने की आवश्यकता नहीं कि व्यक्तिगत व्यस्तताओं से इस ब्लाग के लिए समय नहीं निकाल पाया .खेद है एक व्यंग्य रचना " ...छपाना एक पुस्तक का" (भाग -1) धारावाहिक रुप मे लगा रहा हूँ शायद आप लोगों को ,विशेषत: जो उदीयमान लेखक है,को पसन्द आए
सादर
 आनन्द.पाठक
094133 95592
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छपाना एक पुस्तक का..... (भाग-1)
’जो बालक कह तोतरि बाता
सुनहि मुदित मन पितु अरु माता
या
छमिहहि सज्जन मोरि ढिठाई
सुनिहहिं बाल वचन मन लाई
(इस व्यंग्य से यदि कोई सुधि पाठक मनसा आहत होते हैं तो गोस्वामी जी की तरह मैं भी क्षमा प्रार्थी हूँ ,आप अन्यथा न लेंगे.।--लेखक)

प्रकाशक महोदय का उत्तर प्राप्त हो गया.लिखा है "व्यंग्य -संग्रह" सहकारिता के आधार पर प्रकाशित किया जा सकता है.बशर्ते कम से कम 200 प्रतियां कमीशन के आधार पर हम उन से खरीदें.मन हर्षित हुआ.क्या नैवेद्य है ! ’त्वदीयं वस्तु गोविन्द: तुभ्यमेव समर्पयामि" परन्तु इन 200 प्रतियों का मैं करुँगा क्या? मात्र इस के कि अब गली गली हाँक लगाता फ़िरूँ -व्यंग्य ले लो ,अटपटे व्यंग्य ले लो ,चटपट व्यंग्य ले लो.ज्ञातव्य है व्यंग्य ’कसना’ और व्यंग्य ’लिखना’ दोनों ही स्थितियों में एक प्रच्छन्न ख़तरा सन्निहित रहता है.सोचा कुछ प्रतियां कम ही उठानी पड़े तो उत्तम होता. अत: संशोधन प्रस्ताव रखा.200 प्रतियां क्रय करने में अपनी असमर्थता जताई.अपना कटोरा दिखाया ,अपनी गरीबी रेखा दिखाई.काफी तोल-मोल के बोल के पश्चात प्रकाशक महोदय जी मान गए.हिन्दी के थे ,दयालु थे.अन्तिम निर्णय दिया -’भाई जी !आप की ’दन्त-चियारी’ व आप की शाश्वत गरीबी रेखा को ध्यान में रखते हुए यह हर्ष पूर्वक निर्णय लिया गया है कि अब आप प्रस्तावित 200 प्रतियों से 2 प्रति कम क्रय कर सकते हैं.अन्य शर्तें यथावत रहेंगी सोचा,भागते भूत की लँगोटी भली.वैसे भी हिन्दी लेखक के पास ज़्यादा विकल्प होता भी नहीं.इस से अच्छा तोल-मोल तो मैं सब्ज़ी वाले से कर लेता हूं.यह और बात है कि वह तौल में डण्डी मार देता है,तथापि खुश हम दोनों रहते हैं -अपनी अपनी मोल-भाव क्षमता पर.मैं खुश इस लिए भी था कि उक्त प्रकाशक महोदय ,मेरी श्रीमती जी की मोल-भाव क्षमता से परिचित नहीं हैं अन्यथा पुस्तक छापने के बजाय ’कुकर’ बेंचते नज़र आते. बचपने में माँ एक कहानी सुनाया करती थी.एक अहीर भाई और एक दर्ज़ी भाई थे.दोनों में प्रगाढ मित्रता थी.एक दिन अहीर भाई ने सोचा -क्यों न दर्ज़ी भाई से कुछ सिलवा लूं !जब मुफ़्त ही सिलवाना है कच्छा बनयाइन क्या एक बड़ा सा शामियाना ही सिलवा लेते हैं.अहीर भाई ने प्रस्ताव रखा.संयोगत: ’दर्ज़ी भाई’ भी समान मेधा स्तर के थे.उन्होने भी तुरन्त पलट प्रस्ताव रखा -’हम भी बहुत दिन से सोच रहे थे कि एक गाय मिल जाती तो...."दर्ज़ी भाई ने सोचा जब मुफ़्त ही माँगना है क्या बकरी बछिया माँगें, गाय ही माँग लेते हैं दूध-दही की भी सुविधा हो जाएगी.दोनो ही मित्र आपस में प्रस्तावों पर वचनबद्ध हो गए कुछ दिनों बाद दर्ज़ी भाई ने शामियाना सिला और अहीर भाई ने गाय सौंप कर अपना-अपना सत्य वचन निभाया.अहीर भाई जब शामियाना कांधे पर लाद कर चलने को तत्पर हुए कि दर्ज़ी भाई ने हँसते हुए एक जुमला पढ़ा.. टुकड़ी-टुकड़ी कर चिकनाई भल भुलवलहूँ अहिरु भाई अहीर भाई भी कम काव्य चेतना स्तर के नहीं थे. शामियाना कंधे पर लादे-लादे ही पलट जुमला पढ़ा मुँह में दाँत नहीं ,पेट में बछरु पियबा दूध तब जनबा ससरु (टिप्पणी : पाठकों को स्पष्ट कर दें कि ’ससरु’ शब्द का प्रयोग यहाँ किसी आत्मीय सम्बन्ध ,छन्द विधान या शब्द विन्यास की बाध्यता से नहीं हुआ है अपितु अहीर भाई जी की स्वभावगत शब्द सहजता से हुआ है) जो प्रबुद्ध पाठक है वो इस कथा का आशय समझ गए होंगे.जो सुषुप्त पाठक हैं उन्हें स्पष्ट कर दें कि ऐसी ही दो पंक्तियां मैने भी पढ़ीं-- व्यंग्य में रस नहीं ,भाव भी बेमन छापेंगे जब तो समझेंगे श्रीमन कहने की आवश्यकता नहीं कि प्रकाशक महोदय का काव्य-बोध समतुल्य था - सहकारिता पर करौं छपाई बिक्यौ बिक्यौ नहीं अपुन का जाई तत्पश्चात हम दोनों अपनी अपनी प्रवंचना शक्ति पर आसक्त हो श्रद्धानत हो गए..........
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-आनन्द.पाठक
09413395592
 क्रमश: (....श्शी.... श्शी......व्यंग्य अभी जारी है.......)

2 टिप्‍पणियां:

Ravishankar Shrivastava ने कहा…

वाह, जबर्दस्त व्यंग्य है. आशा है आगे भी ऐसी धार रहेगी, बढ़ती हुई... :)

आनन्द पाठक ने कहा…

आ0 श्रीवास्तव जी
आप का आशीर्वादाकांक्षी हूँ
सादर
आनन्द.पाठक