रविवार, 25 नवंबर 2012

(धारावाहिक) व्यंग्य : ..छपाना एक पुस्तक का (भाग-2)..

[ .....पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि किस तरह ’प्रकाशक ’ महोदय ने ्लेखक पर 200 प्रतियां उठाने की शर्त रखी और बेचारा लेखक किस तरह 2 कम 200 प्रतियां पर प्रकाशक से ’दन्त-चियारी’करता है.......]


अब आगे पढ़िए....गतांक से आगे......



छपाना एक पुस्तक का.......(भाग-2)



2 कम 200 प्रतियों का मैं क्या करता ? इन प्रतियों को यदि हिन्दी के ’गज’ अग्रज अनुज मनुज दनुज या अड़ोसन-पड़ोसन सास ससुर साली सालों को नि:शुल्क भी भेंट करता तो भी यह संख्या 50 से ऊपर नहीं बैठती थी.कवि से क्षमा याचना सहित

ये सास ससुर साली साले ,बीवी बच्चे ये घर वाले

सब जोड़ तोड़ कर देखा तो पचास के भीतर ही पाया

सोचा कुछ प्रतियां काल-पात्र में डाल ’इण्डिया गेट’ कांची पुरम ,हावड़ा ब्रिज के नीचे दफ़ना दूँ कि अगर भविष्य में कभी पुरातत्व विभाग वाले उत्खनन करें और श्रद्धेय रामचन्द्र शुक्ल जैसा कोई समर्थ इतिहासकार उस काल में पैदा हो तो मेरी भी रचना प्रक्रिया पर कुछ प्रकाश पड़ सके और यह प्रमाण रहे कि पूर्वकाल मे भी कुछ साहित्यकार अकवास-बकवास अल्लम-गल्लम लिखा करते थे.

या फिर कुछ प्रतियां अयोध्या मथुरा काशी में ही काल-पात्रस्थ कर दूँ कि भविष्य में मेरे कुछ उर्दू-दाँ दोस्त मेरी रचना पर उर्दू-रचना खड़ा कर दें तो भगवा केसरिया स्कार्फ़ वालों को यह कष्ट न उठाना पड़े कि यह संग्रह मूलत: हिन्दी में था और बाद में अल्लाह के बन्दों ने अपना उर्दू महल इस पर खड़ा कर दिया

या फिर कुछ प्रतियां हिन्दी महापुरुषों की समाधि,चिता-स्थली,भस्म-स्थली या फिर तथाकथित हिन्दी के अखाड़ों ,खेमों ,गुटों ,हिन्दी संस्थानों में काल-पात्रस्थ कर दूं जिससे यह पता चलता रहे कि हिन्दी का व्यंग्य किस दिशा या दशागति को प्राप्त हो रहा है.

वैसे तो प्रकाशक महोदय की हार्दिक इच्छा थी कि में अपने हिस्से की समस्त प्रतियां उनके मुद्रणालय से उठा लूँ जिससे इस पॄथ्वी का कुछ बोझ हल्का किया जा सके .जब मैने स्पष्ट किया कि कुछ प्रतियां उठाने मात्र से ही धरती का बोझ हल्का नहीं हो सकता बल्कि कुछ तथाकथित स्थापित लोगों को भी उठाना पड़ेगा तो जाने क्या सोच कर वह स्वयं ही कुर्सी पे उठ गये.

अन्तत: सोचा कि कुछ प्रतियां हिन्द महासागर कि अतल गहराईयों में डुबों आऊँ कि इस संग्रह को चुल्लू भर पानी में डूब मरने का शर्मनाक कष्ट न झेलना पड़े,साथ ही भविष्य में यदि पुन: सागर मन्थन हो तो "पन्द्रहवां रत्न" जो पौराणिक काल में प्रगट होने से वंचित रह गया था ,वह तब निकल आये.भो सकता है भगवान ’नील-कण्ठ’को एक बार फिर अपने इस भक्त के लिए कष्ट उठाना पड़े.

कुछ प्रतियाँ स्वयंभू स्वनामधन्य तथाकथित स्थापित समीक्षकों के पास भेंज दी .समीक्षा अपेक्षित थी.ये समीक्षक भी एक विशेष किस्म के प्राणी होते हैं.प्राथमिक कक्षाओं में’मास्साब’ एक पट रटवाया करते थे -’हरि बोले ,हरि सुने, हरि गए हरि के पास...जब दोनों हरि मिल गए ,हरि हो गए उदास’. अर्थात एक समीक्षक बोलता है दूसरा सुनता है ,तीसरा सर धुनता है.

यह समीक्षक पहले लेखक का वज़न नापता है कि लेखक कितना ’गुरु’ (चालाक नहीं ,भारी) है उनके लिए अलग समीक्षा और नव लेखकों को ’उड़न छू’ (उड़ते हुए छूना) शैली की समीक्षा. यही कारण है कि ’शैल जी’ हर बार बाजी मार ले जाते हैं और ’चकाचक बनारसी’ रह जाते हैं .कुछ समीक्षक लेखक की चौड़ाई नापते हैं ,उसके खेमे का कितना विस्तार है ,मित्रों की (गुटबन्दियों की नहीं )कितनी संख्या है.? उसके खेमे में कितने खंबे हैं ,कितने खूंटे हैं ? ’बारह खंबा चौसठ खूँटा’ -की समीक्षा अलग ,बिना खेमे वाले की समीक्षा अलग.कुछ समीक्षक लेखक की ऊँचाई नापते हैं कि लेखक का कद कितना ऊँचा है .कहाँ कहां तक पहुँच है .भारत भवन हिन्दी संस्थान,कोई कमेटी ,कोई एकेडेमी? कोई कोर्स बुक चयन समिति छू सकता है कि नहीं ? उसकी समीक्षा विशेष अन्यथा ’टालू-मिक्चर’.आज तक यह रहस्य बना हुआ है कि ये प्राणी लेखक की ’गहराई’ कैसे नापते हैं? कदाचित लेखक के तोल-मोल की क्षमता या प्रवंचना प्रलाप शक्ति को ही गहराई का मापदण्ड मानते हों. ’गुरु’ बड़े ’गहरे हो......

----------------------
-आनन्द.पाठक
09413395592

क्रमश:

(....श्शी.... श्शी......व्यंग्य अभी जारी है.......)



कोई टिप्पणी नहीं: