गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

एक व्यंग्य : ....सखेद सधन्यवाद .....(भाग 1/2)

सखेद सधन्यवाद.....




इधर विगत कुछ दिनों से जब मेरी रचनाये ’सखेद सधन्यवाद’ वापस आने लगीं तो मुझे हिन्दी की ’दशा’ व ’दिशा’ दोनों की चिन्ता होने लगी। अब यह देश नहीं चलेगा। रोक देंगे हिन्दी के विकास रथ को ये सम्पादक गण।ले डूबेंगे हिन्दी को ये सब। जितने उत्साह और तत्परता से मैं अपनी रचना प्रकाशनार्थ भेंजता था उसके दूने उत्साह से ये सम्पादक गण उसे ’सखेद सधन्यवाद’ कर देते थे।कहते हैं कुछ युवा सम्पादक तो अपनी प्रेमिका के प्रणय पत्र भी ’सखेद सधन्यवाद’ कर देते हैं और प्रौढ़ सम्पादक की प्रौढ़ पत्नियां तो ’सखेद सधन्यवाद’ मायके में ही पड़ी पड़ी अपने कर्म का रोना रोती रहती हैं।



वैसे रचनायें तो बहुतों की लौटती है मगर स्पष्टत: प्रगट नहीं करते।यदि किसी ने पूछ लिया तो कहते फिरते हैं -’भईये ! मैं छपास में विश्वास नहीं करता ,मैं तो बाबा तुलसी दास की तरह ’स्वान्त: सुखाय" बहुजन हिताय लिखता हूं।यदि मेरी रचना से इस असार संसार का एक भी प्राणी प्रभावित हो जाय तो अपनी रचना की सार्थकता समझूँगा ।यही मेरा पुरस्कार है यही मेरा सुख।’ यह बात अन्य है कि यह हितकारी कार्य अब तक नहीं हुआ है।पत्रिका कार्यालयों के चक्कर तो सम्पादकों की आरती उतारने जाते हैं।अगर भूले-भटके ’फ़िलर मैटिरीयल’ के तौर पर यदा-कदा कोई रचना छप भी गई तो अति श्रद्धाविनत हो कहते हैं-’क्या करें ।यह पत्रिका वाले मानते ही नहीं थे ,बहुत आग्रह किया तो देना ही पड़ा।

फिर रचना की छपी प्रतियां बन्दरिया की तरह सीने से चिपकाये ,गोष्ठी गोष्ठी घूमते रहते हैं।

मैं उन लोगों में से नहीं हूं।’स्वीकारोक्ति’ में विश्वास करता हूं।जब कोई रचना वापस आ जाती है तो भगवान से अविलम्ब प्रार्थना करता हूँ -’हे भगवान ! दया निधान ! इन सम्पादकों को क्षमा कर । इन्हें यह नहीं मालूम कि ये क्या कर रहे हैं और हमें यह नहीं मालूम कि हम क्या लिख रहे हैं।



सत्य तो यह है कि मेरी कोई रचना आज तक छपी ही नहीं। ’सखेद सधन्यवाद’ की इतनी पर्चियां एकत्र हो गईं है मेरे पास कि इण्डिया गेट पर बैठ कर आराम से झाल-मूड़ी बेंच सकता हूँ। वैसे भी बहुत से लेखक यही करते हैं ज़रा बड़े स्तर पर।अपने अपने स्तर का प्रश्न है।

" मिश्रा ! अब यह देश नहीं चलेगा , हिन्दी भी नहीं चलेगी "- मैने लौटी हुई समस्त रचनाओं की पीड़ा समग्र रूप में उड़ेल दी

"क्या फिर कोई तुम्हारी ’अमर रचना’ वापस लौट आई"?

"तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ?’- मैने आश्चर्य चकित होकर पूछा

’विगत 5-वर्षों से तुम यही रोना रो रहे हो। सच तो यह है बन्धु ! भारतेन्दु काल से लेकर ’इन्दु काल (कवि या कवयित्री यदि कोई हों) तक यह हिन्दी ऐसी ही चल रही है।सतत सलिला है ,पावन है। सतत प्रवाहिनी गंगा है कैसे मर सकती है?।’

मिश्रा जी अपने इस डायलाग पर संवेदनशील और भावुक हो जाया करते हैं और हिन्दी प्रेम के प्रति आँसू के दो-चार बूँद छलछला दिया करते हैं।

" परन्तु गंगा में प्रदूषण फैल तो रहा है न !’- मैने समझाना चाहा

’ज़्यादा कचरा तो यह बनारस वाले डालते हैं’- उन्होने मेरी तरफ़ एक व्यंग्य व कुटिल मुस्कान डालते हुए कहा

’और इलाहाबाद वाले क्या कम प्रदूषित करते हैं" मैने भी समान स्तर के व्यंग्यबोध से उत्तर दिया

’देखिए जनाब ! मैं कहे देता हूं ,मेरे शहर को गाली मत दीजिए"

’तो आप ने मेरे शहर की कौन सी आरती उतारी है?’

’आप ने इलाहाबाद को पढ़ा है?बिना पढ़े आप कैसे कह सकते हैं कि कचरा इलाहाबाद वाले डालते हैं?

"क्यों नहीं कह सकता? जिस ज्ञान से आप यह बनारस वालों को कह सकते हैं’

"तुम्हारी इसी संकीर्ण मानसिकता से तुम्हारी रचना वापस आ जाती है । अरे मैं तो कहता हूँ कि वो सम्पादक भले हैं कि ऐसा कचरा लौटा देते हैं वरना तो तुम्हारा लेखन तो लौटाने योग्य भी नहीं है’

मैं हिटलर की तरह फ़ुंफ़कारने वाला ही था,फेफड़े में श्वास भरने ही वाला था कि मिश्रा ने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया ।वही सखेद सधन्यवाद वाली नस।मैं हिटलर से बुद्ध बन गया।कहा-

" मिश्रा ! हिन्दी का भट्टा कचरे से नहीं बैठता । बैठता है हमारी तुम्हारी लड़ाई से ’-मिश्रा जी ठण्डे पड़ गए । हिन्दी के साहित्यकार थे ।



[क्रमश: .....व्यंग्य अभी जारी है]

-आनन्द.पाठक
09413395592

शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

धारावाहिक व्यंग्य :...छपाना एक पुस्तक का..(भाग 6 और अन्तिम कड़ी)




[मित्रो ! पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि मिश्रा जी ने किन किन लोगों से मेरी किताब की समीक्षा करवाई । पिछली बार मुन्ना भाई सिनेमा का ’ब्लैक टिकट" बेचने वाले ने मेरे व्यंग्य-संग्रह पर कैसे अपने स्वस्थ विचार रखे थे कि अब ,,,........]



          मैने निश्चय कर लिया कि अब कहीं नहीं जाऊँगा । लिखना पढ़ना सब व्यर्थ।मिश्रा जी ने ढाढस बधाँया।दर्शन बताया ,समीक्षा का रहस्य समझाया।फिर भी...’आशा बलवती राजन’।अनमने मन से ,मिश्रा जी के साथ चल पड़ा। कदाचित कोई सुयोग्य समीक्षक मिल ही जाय कि अचानक मिश्रा ने स्कूटर खड़ा किया।

"सलाम साहब"- स्कूटर रुकते ही रहमान मियां ने कहा

रहमान मियां रद्दी बेंचने और ख़रीदने का काम करते थे।कबाड़ी थे। संग्रह की एक प्रति सम्भवत: मिश्रा जी उन्हें भी दे आए थे।

’किताब पढ़ी"?

’कौन सी साहब?’अच्छा वो ? बण्डल है साहब ,पेपर सड़ीला है ।इसका तो ठोंगा भी नहीं बनता। आप कहेगा तो तीन रुपया किलो लगा दूंगा।

’यार रद्दी का भाव नहीं ,व्यंग्य का भाव पूछ रहा हूं’

’व्यंग्य श्यंग्य सब बरोबर । फ़िल्मी मैगज़ीन चार रुपए किलो चल रहा है। साहब लोग ठोंगे में भूँजा खाता है और फ़ोकट में हीरोइन का फ़ोटू भी देखता है।’

’यार मिश्रा ! ’-मैने कहा-’व्यंग्य का भाव अब किलो में ?तीन रूपया?’

’तुम कहेगा साहब’-रहमान मियां मेरी तरफ़ मुड़ कर बोले-’आठ आने जास्ती लगा दूंगा।यह साहब तो अपने मुहल्ले में रहता है इस वास्ते’। व्यंग्य श्यंग्य का कोई मार्किट नहीं साहब !’

मैं गुस्से में उठा और वापस चल दिया घर की ओर।अब कहीं नहीं जाना। निश्चय कर चुका था कि मिश्रा ने अचानक स्कूटर एक रिक्शा वाले के सामने रोक दिया। मैं फिर चौंका। तो क्या मिश्रा अब मुझे स्कूटर से उतार कर रिक्शे से रवाना करेगा ?

मिश्रा ने तुरन्त रिक्शेवाले के कंधे पर हाथ रख दिया अपनापन जताने के लिए।कुछ इधर-उधर की अनौपचारिक वार्ता के बाद ज्ञात हुआ कि यह भी एक पहुँचा हुआ समीक्षक है। उसकी मान्यता है या उसे यह भ्रम है कि रिक्शे के तीनों पहिए साहित्य की विधायें हैं-कविता ,कहानी,उपन्यास-जिन्हें वह गति देता है। अगर किसी ने गति पकड़ी तो ’आलोचना’ का ’ब्रेक’ भी लगा देता है।

मिश्रा ने पूछा-’अरे वो किताब पढ़ी?

कौन सी?

अरे वही?

अरे वो? वो तो फ़ालतू थी साहब।

क्यों?

’क्यों कि भीतर कोई फोटू ही नहीं था .बस ’कवर’ का फोटू जानदार था साहब।मगर ’टाइटिल’ बण्डल। अब आप ही बताइए साहब -"शरणम श्रीमती जी’-यह भी कोई टाइटिल है? लेखक को दीदी के ’शरणम’ की नहीं "चरणम’ की ज़रूरत है बिल्कुल ’भिरगू’ मुनि की तरह। उधर बस्ती वाला बोलता है कि दीदी अपनी तरफ़ की है।

बाद में ज्ञात हुआ कि उक्त रिक्शावाला ,अपने ही ससुराल क्षेत्र का था। भृगु क्षेत्र ’बलिया’ का

तत्पश्चात ,सारी समीक्षा वहीं की वहीं रख आए। लौट कर बुद्धू..नहीं नहीं ’घों’..घों’ घर को आये।

अस्तु

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-आनन्द.पाठक

09413395592

अभ्यास के लिए प्रश्न:-

प्रश्न : इस व्यंग्य से क्या शिक्षा मिलती है उर्फ़ moral of the story kyaa hai"

उ0 : इस व्यंग्य से यही शिक्षा मिलती है कि

(1) नए लेखकों को व्यंग्य नहीं लिखना चाहिए

(2) यदि लिख भी दिया तो उसे छपवाने की नहीं सोचना चाहिए

(3) यदि छपवा भी दिया तो उसकी समीक्षा का नहीं सोचना चाहिए

(4) यदि समीक्षा का सोच लिया तो प्रकाशक...समीक्षक...मिश्रा जी जैसे लोगो से बचना चाहिए

(5) फिर भी न बच सके तो ऐसे लोगों को expose करने के लिए ’व्यंग्य’ लिखना चाहिए





शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

धारावाहिक व्यंग्य : ...छपाना एक पुस्तक का ..(भाग-5)

[पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि मिश्रा जी ने कैसे मेरी किताब समीक्षा के लिए एक ’हलवाई ’जी को दे आए थे और कैसे उस हलवाई जी ने अपने मिष्ठान पाक शैली में अपनी समीक्षा प्रस्तुत की। अब आगे पढ़िए.......]




....छपाना एक पुस्तक का ...(भाग-5)



चलते चलते मिश्रा जी ने एक सिनेमा हाल के सामने स्कूटर खड़ा किया।मैने आशंका व आक्रोशवश प्रश्न किया -" तो क्या अब यह टिकट की खिड़की वाला बतायेगा कि ’व्यंग्य संग्रह ’ बाक्स आफ़िस पे हिट हुआ कि नहीं ?

"अरे नही यार ! " मिश्रा जी ने अनौपचारिक रूप से कह -" यह वह चेहरा है जो ’पब्लिक डिमाण्ड’ के हर एपिसोड में दिखाई देता है ।यह वह चेहरा है जो हर फ़िल्म,हर कहानी ,हर गाने पर अपनी बेबाक राय देता है ,स्पष्ट टिप्पणी करता है । यही है वो चेहरा जो माधुरी दीक्षित को माधुरी दीक्षित बनाता है ।नम्बर टेन के गाने को नम्बर वन पे लाता है ।तुम हिन्दी के लेखक हो यह सब आधुनिक बातें क्या समझोगे । तुम रह गए ’घों’ के ’घों’.....

"खबरदार मिश्रा ! तुम क्या समझते हि कि हमें ’घों’ का अर्थ नहीं मालूम ?"

मिश्रा जी सकपका गए। फिर उन्होने ने एक ’ब्लैक ’टिकट बेचने वाले को बुलाया

"सलाम स्साब ! कितना टिकट दूं साब ? दो का चार दो का चार"

’अरे नहीं मुन्ना भाई ! इधर तुम से कुछ पूछने को आया।’

’साब! धन्धे का टैम है । एक तो फिलिम सड़ेला है ऊपर से धन्धा ठण्डा चल रहा है । फ़ोकट में पूछना है तो बाद में आना साब

बाद में क्या आता। विचार जानना था ,सोचा प्रतीक्षा करना ही श्रेयस्कर है। वैसे भी तो बड़े बड़े समीक्षक प्रतीक्षा ही तो करवाते हैं अपने अध्ययन कक्ष में । फ़ोन करो तो पता चलता है कि साहब बाथरूम में है। लगता है कि बाथरूम में ही बैठ कर समीक्षा लिखते हैं ,तभी तो ऐसी गन्ध आती है।

मैं विचलित हो रहा था } इस मिश्रा के बच्चे ने कहां लाकर फँसा दिया। समीक्षा न होती तो क्या बिगड़ जाता ? व्यर्थ में रक्त जला रहे हैं। ख़ैर , मुन्ना भाई धन्धा ख़त्म कर ,पुलिस का अंशदान कर निवृत हो कर आया।

"पूछो साब.क्या पूछना माँगता?"

’अरे ,वो किताब पढ़ी ?’

’कौन सी साब?’

अरे ! वही ,जो तुमको दे गया था’

’पढ़ी साब’-मुन्ना के चेहरे पे मुस्कान .आंखों में चमक ,कथन में आत्म विश्वास था। मैने भी उच्छवास छोड़ ,चैन की सांस ली। सरकार के प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम के महत्व का पता आज चला।सार्थक हो गई मेरी रचना ,सफल हो गया मेरा परिश्रम।

" कैसा लगा"-मिश्रा ने जिज्ञासा प्रगट की।

"धांसू साब,क्या जोरदार लिखा है ।क़सम साब ,मज़ा आ गया रात ’

’रात?’किधर पढ़ा?-मिश्रा चौंका

’उदर को साब ,खोली में पढ़ा’

’उदर काई कूं पढ़ा? इदर पढ़ने का नहीं क्या?-मिश्रा ने भाषा सामंजस्य स्थापित किया.विचारों के सहज आदान-प्रदान के लिए।

’इदर को साब ? फुटपाथ पे?इदर पढ़ेगा तो पुलिस जास्ती मारता’

"काइ कू मारता?’

’बोलता है ऐसी किताबें पढ़ेगा तो एक महीने को भीतर कर देगा’- मुन्ना ने अपनी स्थिति स्पष्ट की।

मैं दंग रह गया।मेरी किताब पढ़ने से पुलिस मना करती है?व्यंग्य लिखना कोई अपराध है?यह तो दर्पण है। आप का चेहरा विकृति है तो मत देखिए ,मगर दूसरों को पढ़ने से मना क्यों करते हो? यहां लोक तन्त्र है।अभिव्यक्ति की आज़ादी है। लिखने की आज़ादी,पढ़ने की आज़ादी।यह अन्याय है।मैं इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाऊंगा। मेरा संग्रह कोई ’सैतानिक वर्सेज’ नहीं ,कोई ’लज्जा’ नहीं कि लोग छुप-छुप कर रात के अन्धेरे में पढ़ें। हर विद्रोही कवि की तरह मैं उबल रहा था कि मिश्रा ने पूछा -

" भाई मुन्ना ! तुम कौन सी किताब की बात कर रहे हो?’

’वही साब ,जिसे बड़ा बड़ा साब लोग रात अकेले बेड रूम में पढ़ता है। हम छोटा लोग उदर खोली में पढ़ता । ऐसी किताबें मिलती कहाँ है यह तो मालूम, परन्तु छपती कहां से है मालूम नहीं ,साब।"

"मैने मिश्रा से कहा,"यार मिश्रा ,लगता है यह किसी ’पार्णग्रही’ किताब की बात कर रहा है ...राम! राम! राम!

"पार्णग्रही’ नहीं ’पार्नग्रफ़ी’ किताब की बात कर रहा है"

’हाँ,हाँ वही"-मैने स्पष्ट किया

अचानक वार्ता क्रम में मुन्ना भाई चहक उठा-’बरोबर पकड़ा साब। वही किताब। बाई गाड ,बड़ा मज़ा देती है’

अरे ! वो जो मैने दी थी’-मिश्रा ने स्पष्ट किया

’अरे वो? बण्डल साब। वही तो बेंच कर खरीदी थी। आठ आना मिला था। एक बात कहूं साब ,व्यंग्य-श्यंग कोई नहीं पढ़ता ,खाली आलमारी में सज़ा कर रखता है बड़ा साब लोग।

मैं व्यंग्य के भविष्य की चिन्ता माथे उठाए चला आया।

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क्रमश:

(....श्शी.... श्शी......व्यंग्य अभी जारी है.......)



-आनन्द.पाठक-

09413395592



शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

धारावाहिक व्यंग्य : ...छपाना एक पुस्तक का ..(भाग-4)

[ पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि समीक्षकों ने कैसे कैसे मेरी किताब "व्यंग्य-संग्रह’ की समीक्षा की और मेरे जैसे उभरते सितारे का कैसे सितार बजाया...वो तो भला हो ’मिश्रा’ जी का कि ’प्रगट भे हनुमान" शैली में कुछ मदद की.....अब आगे पढ़िए...)




....छपाना एक पुस्तक का....(भाग-4)



समस्त ’फूल और पत्थर’ या ’फूल और काँटे’ के बावज़ूद मैं अब भी 2कम 200 प्रतियों के प्रति चिन्तित था।इसी दुविधा में पड़ा हनुमत स्मरण किया कि मिश्रा जी आ टपके। पाठक गण मिश्रा जी से अबतक परिचित हो गए होंगे ,जो वंचित रह गए हैं बे कृपया ’विज्ञापनी शादी’ ’रावण नहीं मरता’ ’सखेद सधन्यवाद’ आदि कथाओं का सन्दर्भ लें जिसमें किसी में वो मेरे लिए ’संजीवनी (ग्लायकोडीन) ,किसी में खेमा,किसी में नि:शुल्क प्रतियों की व्यवस्था करते हैं । मैं उनका तो नहीं परन्तु उनकी कविताओं का प्रथम और अन्तिम श्रोता अवश्य हूँ। यह पद व सम्मान प्राप्त करने कि लिए एक सरकारी विभाग में कठिन प्रशिक्षण लेना पड़ा -’कान खुला रख कर भी कुछ न सुनना"

मैने उन्हें अपनी चिन्ता से अवगत कराया। पहले मुस्कराए ,फिर मुँह बाए ,तत्पश्चात पान की पीक थूकते हुए बोले -"अरे! वो प्रतियां विक्रय के लिए होती भी नहीं, उनका वितरण ही श्रेयस्कर होता है । इससे नि:शुल्क प्रचार व प्रसार होता है अन्यथा टी0वी0 पर विज्ञापन देते फिरोगे ’--आ गया ..आ गया ...का नवीनतम तमतमाता ..धनधनाता..मारकाट मचाता व्यंग्य संग्रह...। और कोई प्रायोजक भी न मिलेगा।

"मगर यार ! ऎसी प्रतियां 50 से ऊपर नहीं बैठ रही है \

"लाओ मैं बैठा देता हूं । इसी लिए तो मैं कहता हूं रह गए तुम ’घों’ के "घों"।

"क्या मतलब ?"

’शब्द कोश में देख लेना।

मिश्रा जी समस्त प्रतियां लेकर अन्तर्ध्यान हो गए और मैं शब्दकोश लेकर सावधान हो गया। क्या अर्थ हो सकता है इस अर्ध-शब्द "घों’ का? देखा घोंचू ,घो्ड़ा,घोंघा ,घोंघा बसन्त,घोंघी (लतीफ़ घोंघी नहीं)। घों कुछ भी हो सकता है । मिश्रा जी के इस अर्ध-सम्मान के लिए अर्ध नत मस्तक हुआ।कुछ दिनों पश्चात मिश्रा जी प्रसन्नचित्त मुद्रा में पधारे और आते ही बोले-

’यार चलो ! उठो ,जनता के विचार लेते आएं’

क्या"?-मैने जानना चाहा

’अरे क्या क्या ?तुम्हारी सारी प्रतियां वितरित कर आया समाज के विभिन्न वर्गों में ,ज़मीन से जुड़े लोगों के मध्य। देशी ज़मीन के देशी लोगों मे।"

"क्यों’?

"क्योंकि ये लोग निस्पृह और स्पष्ट विचार रखते हैं।ये पूर्वाग्रह ग्रसित नहीं होते।ये शब्द चबा चबा कर नहीं बोलते। ये निर्मल और निश्छल होते हैं। सहमति और असहमति इनके दिल प्रदेश से निकलती है।"

"अच्छा ! मन हर्षित हुआ। चेहरे पर एक चमक उभर आई। मिश्रा ने एक सत्कार्य किया। देखते हैं यह ’स्वयंभू" क्या लिखते हैं? लोकतन्त्र है जनता की आवाज़ ही जनार्दन की आवाज़ है।उन समीक्षकों का क्या जो कमरे बन्द कर लिखते हैं और दिमाग कि खिड़कियां भी नहीं खोलते।

मैं झट तैयार हो ,मिश्रा के स्कूटर पर रथारुढ हो चल पड़ा अर्जुन की तरह।

पूरे मार्ग सोचता रहा कि मिश्रा ने अवश्य यह किताब किसी महाविद्यालय ,किसी विश्व-विद्यालय के प्राध्यापक को दिया होगा मेरा व्यंग्य-संग्रह।ये लोग भी तो ’सूर-सूर तुलसी शशि" पढ़ते पढ़ाते रहते हैं ।इनके अपने सन्तुष्ट और सौष्ठव विचार होते हैं। कुछ नव साहित्य पर चर्चा होगी,नए आयाम नए दृष्टिकोण पर वार्ता होगी कि मिश्रा ने अचानक एक हलवाई की दुकान के सामने स्कूटर रोक कर खड़ा किया। मैने समझा कि भारतीय संस्कृति के अनुरूप मिष्ठान वग़ैरह लेकर चलेगा ,समीक्षा मीठी होगी...कि मिश्रा ने दुकानदार से अनौपचारिक प्रश्न किया-

"कहो भाई ! कैसा चल रहा है?’

"सलाम स्साब ,1-किलो तौल दूं ?"

"अरे भाई ! आज मि्ष्ठान लेने नहीं ,विचार लेने आया हूं। आप ने वो किताब पढ़ी ?"

"कौन सी स्साब ?"

"अरे वही जो विगत सप्ताह दे गया था?

"अरे वो ! क्या करें स्साब ! धन्धा बड़ा मन्दा चल रहा है "

"यार मैं धन्धे की नहीं मै उस किताब...."

"व्यंग्य के धन्धे में कोई लाभ नहीं है स्साब !न लिखने में ,न प्रकाशन में। और उस किताब में तो स्साब ! पाक ही कच्चा रह गया था ,एक-रसता नहीं थी तार नहीं बन पाया था....।’

मैं आश्चर्य चकित रह गया। तो क्या मिश्रा ने एक प्रति इस हलवाई को सौंप दी थी ?किसी प्राध्यापक को देना उचित नहीं समझा? फिर भी मैं सज्जनता वश चुप था कि हलवाई ने पुन: कहा-

" स्साब ! जिस व्यंग्य का पाक कच्चा रहेगा ,तार नहीं बनेगा वह समाज को नहीं बाँध पाएगा ..अपितु कुछ दिनों बाद वही व्यंग्य एक सड़ान्ध गन्ध देगा.."

मैं हलवाई जी की इस विलक्षण समीक्षा प्रतिभा पर अचम्भित रह गया।हो न हो पूर्व जन्म में यह अवश्य ही कोई व्यंग्य लेखक रहा होगा और किसी दुर्वासा समीक्षक के श्राप से इस जन्म में हलवाई बन गया है

"तो कैसे बिकेगी यह किताब ?"-मिश्रा चिन्ता में डूब गया

"चिन्ता की कोई बात नहीं ,स्साब ! -हलवाई ने ढाढस बँधाते हुए कहा -"जब ऐसी मिठाईयां खराब हो जाती हैं तो हम लोग किसी मेले-ठेले में ,किसी सरकारी ’कैन्टीन’ में ठेल देते हैं।आप भी किसी सरकारी लाइब्रेरी या पुस्तक मेले में ठेल दीजिए स्साब ।सुना है कि कलकत्ता में तो लाईन लगा कर पुस्तक खरीदते हैं लोग।

मैं हलवाई जी की इस व्यापार-प्रतिभा पर नत मस्तक हो कर चल दिया ।

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क्रमश:

(....श्शी.... श्शी......व्यंग्य अभी जारी है.......)





शनिवार, 1 दिसंबर 2012

धारावाहिक व्यंग्य : -..छपाना एक पुस्तक का ...(भाग 3)

[पिछले अंक में आप ने पढ़ा- कि कैसे कैसे मैं अपनी किताब की 200 प्रतियों को यहाँ-वहाँ ’काल-पात्र’ में द्फ़नाने का सोच रहा था ,मगर कुछ बात बनी नहीं ...फिर सोचा कि इस पुस्तक की समीक्षा ही कि स्वनामधन्य पुरुष से करा लेते हैं शायद कुछ काम बन जाये और हिन्दी जगत को एक सितारा मिल जाय...मगर समीक्षकों ने मेरा कैसा ’सितार’ बजाया...अब आगे पढ़ें..........]




-...छपाना एक पुस्तक का.....(भाग-3)



अर्थात, समीक्षक लेखक के तन (मन?) का नाप अलेकर एक समीक्षा सिल देता है और पहना देता है उसके ’व्यक्तित्व, व ’कृतित्व’ को.।कुछ समीक्षक तो इतनी कसी समीक्षा सिलते हैं कि वो समीक्षा ’शर्ट’ न होकर ’चोली’ हो जाती है जिसे लेखक न पहन पाता है ,न छोड़ पाता है।एक-दो समीक्षक तो इतनी ढीली-ढाली समीक्षा करते हैं कि समीक्षा समीक्षा न हो ’भगवा’ हो जाती है और प्रकृति का ’रोमान्टिक कवि भी बाबा,त्रिशूलधारी कमण्डलधारी नज़र आता है।कुछ कुछ समीक्षक के यहां तो यह नाप-माप उनके अधीनस्थ छात्र लेते हैं ,भाई साहब तो मात्र ’कटिंग’ करते हैं।इन्हीं सब झंझटों से मुक्त होकर ,कुछ समीक्षक आजीवन ’घाघरा’ ही सिलते हैं -न नाप की चिन्ता ,न माप की।सबसे मुक्त ,सर्वमान्य, सार्वजनीन।कुछ बन्धुगण तो इस व्यापार में रेडिमेड की दुकान ही खोल दी है ,आप लेखक का ’साईज़’ और उम्र बताइए ,समीक्षा ले जाइए।’एक्स्ट्रा लार्ज’ की दर अलग।



कुछ समीक्षकों की अपनी अलग शैली होती है।कुछ लोग तो करुण रस में ही समीक्षा करते हैं-बेचारा लेखक,बेचारा कवि।----दया आती है बेचारे पर।एक भाई साहब तो धूपी चश्मा पहन कर ही समीक्षा लिखते हैं। समर्थ लेखकों की चकाचौंध रोशनी आँखों में चुभती है अत: चढ़ा लेते हैं अपनी सुरक्षा हेतु।बाद में ज्ञात हुआ कि सारी समीक्षा ’एक- दृष्टि’ से ही करते हैं.कुछ लोग तो यह रंगीन चश्मा वात्सल्य भाव से अपने ’आश्रम’ के शोध छात्रों को दे देतें हैं -वत्स ! तू भी लिख दे दो-चार विन्दु।फिर उस शोध छात्र को लेखक का सारा व्यक्तित्व व कृतित्व हरा ही हरा नज़र आता है। कहते हैं धूपी चश्में में ’पावर’ नहीं होता अत:कोई भी पहन सकता है ,समीक्षा लिख सकता है।



अन्धों ने हाथी देखा।किसी ने पांव टटोले .किसी ने पूँछ ,किसी ने कर्ण स्पर्श किया ,किसी ने सूँड़।किसी ने ’स्तुति-गान’ किया ,किसी ने ’स्वस्ति-वाचन’ और सभी ने अपनी अपनी मेधा शक्ति से हाथी की विस्तृत समीक्षा कर दी।एक सज्जन ने समीक्षा करते हुए लिखा--’लेखक पर वामपन्थी विचारधारा का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है ।’ वह और उसका जुलूस’ ’कटोरा बुधना का’,’कुत्ता बड़े साहब का’ ’हरहुआ और टी0वी0’ में निर्विवाद रुप से यह तथ्य स्थापित किया जा सकता है कि लेखक के हृदय में ’सर्वहारा वर्ग’ के प्रति असीम प्यार है और ’पूँजीवाद" व्यवस्था के प्रति विद्रोह। एक लेख (एम0जी0 रोड) में तो उन्होने ’लेनिन; मार्क्स’ जैसे शब्दों का प्रयोग भी किया है।

एक सज्जन ने इस मत का खण्डन करते हुए लिखा ---" यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता कि लेखक ’कम्यूनिज़्म’ से लेश मात्र भी प्रभावित है।वास्तविकता त्त यह है कि उस में देश-भक्ति कूट-कूट कर भरी है ,पाठक कृपया सन्दर्भ लें ’प्रधानमन्त्री और जन्म दिन,रघ्घू हटाओ देश बचाओ ,गुबार देखते रहे.।



एक नान सेकुलर समीक्षक ने लिखा-.." लेखक हिन्दुत्व और हिन्दू पौराणिक कथाओं के प्रति पूर्वाग्रह ग्रसित है ।कट्टर पन्थी,पुराणपन्थी ,पोंगा पन्थी ,साम्प्रदायिक लगता हुआ प्रतीत होता है ।पौराणिक कथाएं चुरा चुरा कर व्यंग्य करता है।"सुदामा फिर अइहौ" सावित्री लौट आई,"गुरु-दक्षिणा आदि का सन्दर्भ लिया जा सकता है।"नेता जी और पंच-तन्त्र "जैसी कहानियाँ भी खींच-खाँच कर इस श्रेणी में रखा जा सकता है। मैं पूछता हूँ कि क्या लेखक को सम्पूर्ण अदीब में एक भी कोई ऐसा प्रतीक ,प्रतिबिम्ब या कथा वस्तु नहीं मिला कि उसे अपने व्यंग्य का आधार बना सके?अत: यह मत स्पष्ट रूप से स्थापित किया जा सकता हैकि लेखक कहीं न कहीं साम्प्रदायिक हो उठा है \अत: "सेक्यूलर" है



और अन्त में,अपना सार-तत्व इन पंक्तियों में निचोड़ कर रख दिया

न तू ज़मीं के लिए ,है न आस्मां के लिए

तेरा "व्यंग्य" है महज़ ख़ामख्वाह के लिए

और मैं श्रद्धानत हो गया।

यदि किसी ने मेरे कृतित्व की सम्यक समीक्षा की तो वह थे आचार्य पण्डित रमणीक लाल जी। लिखा-"लेखक के ऊपर एक पत्नीवाद का प्रभाव है।उनकी कथाऒ ,लेखों यथा -’शरणम श्रीमती जी" " एक भाषण मेरा भी ""श्रीमती जी की काव्य-चेतना" "(अपवाद-विज्ञापनी शादी )" समर्पित है..." में कहीं भी किसी अन्य पत्नी या उप-पत्नी की चर्चा प्रत्यक्षत: नहीं आई है। यह अछूता तथ्य निर्विवाद रूप से मण्डित किया जा सकता हैकि लेखक -"पत्नी को परमेश्वर मानो"- का मध्यम पुरुष है ।प्रथम और उत्तम पुरुष श्रद्धेय श्री गोपाल प्रसाद व्यास जी हैं।लेखक की व्यंग्य लेखन निर्भयता एवं निष्पक्षता इस बात से भी प्रगट होती है कि वह किसी अस्त्र-शस्त्र (अपवाद-बेलन) से नहीं डरता।सन्दर्भ तदैव-(एक भाषण मेरा भी)।अत: लेखक एक पत्नीवाद का प्रबल समर्थक ,पोषक व पक्षधर है।



मैं मन ही मन रसिक लाल जी के प्रति कृतज्ञ हुआ कि उन्होंने "एक पत्नीवाद" ही लिखा ।’बहु-पत्नीवाद’ लिखते तो यह बन्दा खाक़सार न घर का होता न घाट का।अपितु किसी पत्नी-पीडित शरणार्थी शिविर में जूता सिलाई कर रहा होता।

एक वयोवृद्ध समीक्षक ने मेरे अन्दर समस्त वाद का प्रभाव देखते हुए लिखा कि लेखक आल इन वन (All in one) है गुड फ़ार नन(Good for none) है। ..................

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(नोट : कटोरा बुधना का’,’कुत्ता बड़े साहब का’ ’हरहुआ और टी0वी0’ ............यह सब मेरे व्यंग्य आलेख है जो मेरे व्यंग्य संग्रह " शरणम श्रीमती जी" में संकलित है और जिसकी मैने समीक्षा करवाई }

--आनन्द.पाठक-
09413395592