गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

एक व्यंग्य : ....सखेद सधन्यवाद .....(भाग 1/2)

सखेद सधन्यवाद.....




इधर विगत कुछ दिनों से जब मेरी रचनाये ’सखेद सधन्यवाद’ वापस आने लगीं तो मुझे हिन्दी की ’दशा’ व ’दिशा’ दोनों की चिन्ता होने लगी। अब यह देश नहीं चलेगा। रोक देंगे हिन्दी के विकास रथ को ये सम्पादक गण।ले डूबेंगे हिन्दी को ये सब। जितने उत्साह और तत्परता से मैं अपनी रचना प्रकाशनार्थ भेंजता था उसके दूने उत्साह से ये सम्पादक गण उसे ’सखेद सधन्यवाद’ कर देते थे।कहते हैं कुछ युवा सम्पादक तो अपनी प्रेमिका के प्रणय पत्र भी ’सखेद सधन्यवाद’ कर देते हैं और प्रौढ़ सम्पादक की प्रौढ़ पत्नियां तो ’सखेद सधन्यवाद’ मायके में ही पड़ी पड़ी अपने कर्म का रोना रोती रहती हैं।



वैसे रचनायें तो बहुतों की लौटती है मगर स्पष्टत: प्रगट नहीं करते।यदि किसी ने पूछ लिया तो कहते फिरते हैं -’भईये ! मैं छपास में विश्वास नहीं करता ,मैं तो बाबा तुलसी दास की तरह ’स्वान्त: सुखाय" बहुजन हिताय लिखता हूं।यदि मेरी रचना से इस असार संसार का एक भी प्राणी प्रभावित हो जाय तो अपनी रचना की सार्थकता समझूँगा ।यही मेरा पुरस्कार है यही मेरा सुख।’ यह बात अन्य है कि यह हितकारी कार्य अब तक नहीं हुआ है।पत्रिका कार्यालयों के चक्कर तो सम्पादकों की आरती उतारने जाते हैं।अगर भूले-भटके ’फ़िलर मैटिरीयल’ के तौर पर यदा-कदा कोई रचना छप भी गई तो अति श्रद्धाविनत हो कहते हैं-’क्या करें ।यह पत्रिका वाले मानते ही नहीं थे ,बहुत आग्रह किया तो देना ही पड़ा।

फिर रचना की छपी प्रतियां बन्दरिया की तरह सीने से चिपकाये ,गोष्ठी गोष्ठी घूमते रहते हैं।

मैं उन लोगों में से नहीं हूं।’स्वीकारोक्ति’ में विश्वास करता हूं।जब कोई रचना वापस आ जाती है तो भगवान से अविलम्ब प्रार्थना करता हूँ -’हे भगवान ! दया निधान ! इन सम्पादकों को क्षमा कर । इन्हें यह नहीं मालूम कि ये क्या कर रहे हैं और हमें यह नहीं मालूम कि हम क्या लिख रहे हैं।



सत्य तो यह है कि मेरी कोई रचना आज तक छपी ही नहीं। ’सखेद सधन्यवाद’ की इतनी पर्चियां एकत्र हो गईं है मेरे पास कि इण्डिया गेट पर बैठ कर आराम से झाल-मूड़ी बेंच सकता हूँ। वैसे भी बहुत से लेखक यही करते हैं ज़रा बड़े स्तर पर।अपने अपने स्तर का प्रश्न है।

" मिश्रा ! अब यह देश नहीं चलेगा , हिन्दी भी नहीं चलेगी "- मैने लौटी हुई समस्त रचनाओं की पीड़ा समग्र रूप में उड़ेल दी

"क्या फिर कोई तुम्हारी ’अमर रचना’ वापस लौट आई"?

"तुम्हें कैसे ज्ञात हुआ?’- मैने आश्चर्य चकित होकर पूछा

’विगत 5-वर्षों से तुम यही रोना रो रहे हो। सच तो यह है बन्धु ! भारतेन्दु काल से लेकर ’इन्दु काल (कवि या कवयित्री यदि कोई हों) तक यह हिन्दी ऐसी ही चल रही है।सतत सलिला है ,पावन है। सतत प्रवाहिनी गंगा है कैसे मर सकती है?।’

मिश्रा जी अपने इस डायलाग पर संवेदनशील और भावुक हो जाया करते हैं और हिन्दी प्रेम के प्रति आँसू के दो-चार बूँद छलछला दिया करते हैं।

" परन्तु गंगा में प्रदूषण फैल तो रहा है न !’- मैने समझाना चाहा

’ज़्यादा कचरा तो यह बनारस वाले डालते हैं’- उन्होने मेरी तरफ़ एक व्यंग्य व कुटिल मुस्कान डालते हुए कहा

’और इलाहाबाद वाले क्या कम प्रदूषित करते हैं" मैने भी समान स्तर के व्यंग्यबोध से उत्तर दिया

’देखिए जनाब ! मैं कहे देता हूं ,मेरे शहर को गाली मत दीजिए"

’तो आप ने मेरे शहर की कौन सी आरती उतारी है?’

’आप ने इलाहाबाद को पढ़ा है?बिना पढ़े आप कैसे कह सकते हैं कि कचरा इलाहाबाद वाले डालते हैं?

"क्यों नहीं कह सकता? जिस ज्ञान से आप यह बनारस वालों को कह सकते हैं’

"तुम्हारी इसी संकीर्ण मानसिकता से तुम्हारी रचना वापस आ जाती है । अरे मैं तो कहता हूँ कि वो सम्पादक भले हैं कि ऐसा कचरा लौटा देते हैं वरना तो तुम्हारा लेखन तो लौटाने योग्य भी नहीं है’

मैं हिटलर की तरह फ़ुंफ़कारने वाला ही था,फेफड़े में श्वास भरने ही वाला था कि मिश्रा ने मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया ।वही सखेद सधन्यवाद वाली नस।मैं हिटलर से बुद्ध बन गया।कहा-

" मिश्रा ! हिन्दी का भट्टा कचरे से नहीं बैठता । बैठता है हमारी तुम्हारी लड़ाई से ’-मिश्रा जी ठण्डे पड़ गए । हिन्दी के साहित्यकार थे ।



[क्रमश: .....व्यंग्य अभी जारी है]

-आनन्द.पाठक
09413395592

कोई टिप्पणी नहीं: