शनिवार, 1 दिसंबर 2012

धारावाहिक व्यंग्य : -..छपाना एक पुस्तक का ...(भाग 3)

[पिछले अंक में आप ने पढ़ा- कि कैसे कैसे मैं अपनी किताब की 200 प्रतियों को यहाँ-वहाँ ’काल-पात्र’ में द्फ़नाने का सोच रहा था ,मगर कुछ बात बनी नहीं ...फिर सोचा कि इस पुस्तक की समीक्षा ही कि स्वनामधन्य पुरुष से करा लेते हैं शायद कुछ काम बन जाये और हिन्दी जगत को एक सितारा मिल जाय...मगर समीक्षकों ने मेरा कैसा ’सितार’ बजाया...अब आगे पढ़ें..........]




-...छपाना एक पुस्तक का.....(भाग-3)



अर्थात, समीक्षक लेखक के तन (मन?) का नाप अलेकर एक समीक्षा सिल देता है और पहना देता है उसके ’व्यक्तित्व, व ’कृतित्व’ को.।कुछ समीक्षक तो इतनी कसी समीक्षा सिलते हैं कि वो समीक्षा ’शर्ट’ न होकर ’चोली’ हो जाती है जिसे लेखक न पहन पाता है ,न छोड़ पाता है।एक-दो समीक्षक तो इतनी ढीली-ढाली समीक्षा करते हैं कि समीक्षा समीक्षा न हो ’भगवा’ हो जाती है और प्रकृति का ’रोमान्टिक कवि भी बाबा,त्रिशूलधारी कमण्डलधारी नज़र आता है।कुछ कुछ समीक्षक के यहां तो यह नाप-माप उनके अधीनस्थ छात्र लेते हैं ,भाई साहब तो मात्र ’कटिंग’ करते हैं।इन्हीं सब झंझटों से मुक्त होकर ,कुछ समीक्षक आजीवन ’घाघरा’ ही सिलते हैं -न नाप की चिन्ता ,न माप की।सबसे मुक्त ,सर्वमान्य, सार्वजनीन।कुछ बन्धुगण तो इस व्यापार में रेडिमेड की दुकान ही खोल दी है ,आप लेखक का ’साईज़’ और उम्र बताइए ,समीक्षा ले जाइए।’एक्स्ट्रा लार्ज’ की दर अलग।



कुछ समीक्षकों की अपनी अलग शैली होती है।कुछ लोग तो करुण रस में ही समीक्षा करते हैं-बेचारा लेखक,बेचारा कवि।----दया आती है बेचारे पर।एक भाई साहब तो धूपी चश्मा पहन कर ही समीक्षा लिखते हैं। समर्थ लेखकों की चकाचौंध रोशनी आँखों में चुभती है अत: चढ़ा लेते हैं अपनी सुरक्षा हेतु।बाद में ज्ञात हुआ कि सारी समीक्षा ’एक- दृष्टि’ से ही करते हैं.कुछ लोग तो यह रंगीन चश्मा वात्सल्य भाव से अपने ’आश्रम’ के शोध छात्रों को दे देतें हैं -वत्स ! तू भी लिख दे दो-चार विन्दु।फिर उस शोध छात्र को लेखक का सारा व्यक्तित्व व कृतित्व हरा ही हरा नज़र आता है। कहते हैं धूपी चश्में में ’पावर’ नहीं होता अत:कोई भी पहन सकता है ,समीक्षा लिख सकता है।



अन्धों ने हाथी देखा।किसी ने पांव टटोले .किसी ने पूँछ ,किसी ने कर्ण स्पर्श किया ,किसी ने सूँड़।किसी ने ’स्तुति-गान’ किया ,किसी ने ’स्वस्ति-वाचन’ और सभी ने अपनी अपनी मेधा शक्ति से हाथी की विस्तृत समीक्षा कर दी।एक सज्जन ने समीक्षा करते हुए लिखा--’लेखक पर वामपन्थी विचारधारा का स्पष्ट प्रभाव परिलक्षित होता है ।’ वह और उसका जुलूस’ ’कटोरा बुधना का’,’कुत्ता बड़े साहब का’ ’हरहुआ और टी0वी0’ में निर्विवाद रुप से यह तथ्य स्थापित किया जा सकता है कि लेखक के हृदय में ’सर्वहारा वर्ग’ के प्रति असीम प्यार है और ’पूँजीवाद" व्यवस्था के प्रति विद्रोह। एक लेख (एम0जी0 रोड) में तो उन्होने ’लेनिन; मार्क्स’ जैसे शब्दों का प्रयोग भी किया है।

एक सज्जन ने इस मत का खण्डन करते हुए लिखा ---" यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता कि लेखक ’कम्यूनिज़्म’ से लेश मात्र भी प्रभावित है।वास्तविकता त्त यह है कि उस में देश-भक्ति कूट-कूट कर भरी है ,पाठक कृपया सन्दर्भ लें ’प्रधानमन्त्री और जन्म दिन,रघ्घू हटाओ देश बचाओ ,गुबार देखते रहे.।



एक नान सेकुलर समीक्षक ने लिखा-.." लेखक हिन्दुत्व और हिन्दू पौराणिक कथाओं के प्रति पूर्वाग्रह ग्रसित है ।कट्टर पन्थी,पुराणपन्थी ,पोंगा पन्थी ,साम्प्रदायिक लगता हुआ प्रतीत होता है ।पौराणिक कथाएं चुरा चुरा कर व्यंग्य करता है।"सुदामा फिर अइहौ" सावित्री लौट आई,"गुरु-दक्षिणा आदि का सन्दर्भ लिया जा सकता है।"नेता जी और पंच-तन्त्र "जैसी कहानियाँ भी खींच-खाँच कर इस श्रेणी में रखा जा सकता है। मैं पूछता हूँ कि क्या लेखक को सम्पूर्ण अदीब में एक भी कोई ऐसा प्रतीक ,प्रतिबिम्ब या कथा वस्तु नहीं मिला कि उसे अपने व्यंग्य का आधार बना सके?अत: यह मत स्पष्ट रूप से स्थापित किया जा सकता हैकि लेखक कहीं न कहीं साम्प्रदायिक हो उठा है \अत: "सेक्यूलर" है



और अन्त में,अपना सार-तत्व इन पंक्तियों में निचोड़ कर रख दिया

न तू ज़मीं के लिए ,है न आस्मां के लिए

तेरा "व्यंग्य" है महज़ ख़ामख्वाह के लिए

और मैं श्रद्धानत हो गया।

यदि किसी ने मेरे कृतित्व की सम्यक समीक्षा की तो वह थे आचार्य पण्डित रमणीक लाल जी। लिखा-"लेखक के ऊपर एक पत्नीवाद का प्रभाव है।उनकी कथाऒ ,लेखों यथा -’शरणम श्रीमती जी" " एक भाषण मेरा भी ""श्रीमती जी की काव्य-चेतना" "(अपवाद-विज्ञापनी शादी )" समर्पित है..." में कहीं भी किसी अन्य पत्नी या उप-पत्नी की चर्चा प्रत्यक्षत: नहीं आई है। यह अछूता तथ्य निर्विवाद रूप से मण्डित किया जा सकता हैकि लेखक -"पत्नी को परमेश्वर मानो"- का मध्यम पुरुष है ।प्रथम और उत्तम पुरुष श्रद्धेय श्री गोपाल प्रसाद व्यास जी हैं।लेखक की व्यंग्य लेखन निर्भयता एवं निष्पक्षता इस बात से भी प्रगट होती है कि वह किसी अस्त्र-शस्त्र (अपवाद-बेलन) से नहीं डरता।सन्दर्भ तदैव-(एक भाषण मेरा भी)।अत: लेखक एक पत्नीवाद का प्रबल समर्थक ,पोषक व पक्षधर है।



मैं मन ही मन रसिक लाल जी के प्रति कृतज्ञ हुआ कि उन्होंने "एक पत्नीवाद" ही लिखा ।’बहु-पत्नीवाद’ लिखते तो यह बन्दा खाक़सार न घर का होता न घाट का।अपितु किसी पत्नी-पीडित शरणार्थी शिविर में जूता सिलाई कर रहा होता।

एक वयोवृद्ध समीक्षक ने मेरे अन्दर समस्त वाद का प्रभाव देखते हुए लिखा कि लेखक आल इन वन (All in one) है गुड फ़ार नन(Good for none) है। ..................

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(नोट : कटोरा बुधना का’,’कुत्ता बड़े साहब का’ ’हरहुआ और टी0वी0’ ............यह सब मेरे व्यंग्य आलेख है जो मेरे व्यंग्य संग्रह " शरणम श्रीमती जी" में संकलित है और जिसकी मैने समीक्षा करवाई }

--आनन्द.पाठक-
09413395592



1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
दो दिनों से नेट नहीं चल रहा था। इसलिए कहीं कमेंट करने भी नहीं जा सका। आज नेट की स्पीड ठीक आ गई और रविवार के लिए चर्चा भी शैड्यूल हो गई।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (2-12-2012) के चर्चा मंच-1060 (प्रथा की व्यथा) पर भी होगी!
सूचनार्थ...!