शुक्रवार, 7 दिसंबर 2012

धारावाहिक व्यंग्य : ...छपाना एक पुस्तक का ..(भाग-4)

[ पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि समीक्षकों ने कैसे कैसे मेरी किताब "व्यंग्य-संग्रह’ की समीक्षा की और मेरे जैसे उभरते सितारे का कैसे सितार बजाया...वो तो भला हो ’मिश्रा’ जी का कि ’प्रगट भे हनुमान" शैली में कुछ मदद की.....अब आगे पढ़िए...)




....छपाना एक पुस्तक का....(भाग-4)



समस्त ’फूल और पत्थर’ या ’फूल और काँटे’ के बावज़ूद मैं अब भी 2कम 200 प्रतियों के प्रति चिन्तित था।इसी दुविधा में पड़ा हनुमत स्मरण किया कि मिश्रा जी आ टपके। पाठक गण मिश्रा जी से अबतक परिचित हो गए होंगे ,जो वंचित रह गए हैं बे कृपया ’विज्ञापनी शादी’ ’रावण नहीं मरता’ ’सखेद सधन्यवाद’ आदि कथाओं का सन्दर्भ लें जिसमें किसी में वो मेरे लिए ’संजीवनी (ग्लायकोडीन) ,किसी में खेमा,किसी में नि:शुल्क प्रतियों की व्यवस्था करते हैं । मैं उनका तो नहीं परन्तु उनकी कविताओं का प्रथम और अन्तिम श्रोता अवश्य हूँ। यह पद व सम्मान प्राप्त करने कि लिए एक सरकारी विभाग में कठिन प्रशिक्षण लेना पड़ा -’कान खुला रख कर भी कुछ न सुनना"

मैने उन्हें अपनी चिन्ता से अवगत कराया। पहले मुस्कराए ,फिर मुँह बाए ,तत्पश्चात पान की पीक थूकते हुए बोले -"अरे! वो प्रतियां विक्रय के लिए होती भी नहीं, उनका वितरण ही श्रेयस्कर होता है । इससे नि:शुल्क प्रचार व प्रसार होता है अन्यथा टी0वी0 पर विज्ञापन देते फिरोगे ’--आ गया ..आ गया ...का नवीनतम तमतमाता ..धनधनाता..मारकाट मचाता व्यंग्य संग्रह...। और कोई प्रायोजक भी न मिलेगा।

"मगर यार ! ऎसी प्रतियां 50 से ऊपर नहीं बैठ रही है \

"लाओ मैं बैठा देता हूं । इसी लिए तो मैं कहता हूं रह गए तुम ’घों’ के "घों"।

"क्या मतलब ?"

’शब्द कोश में देख लेना।

मिश्रा जी समस्त प्रतियां लेकर अन्तर्ध्यान हो गए और मैं शब्दकोश लेकर सावधान हो गया। क्या अर्थ हो सकता है इस अर्ध-शब्द "घों’ का? देखा घोंचू ,घो्ड़ा,घोंघा ,घोंघा बसन्त,घोंघी (लतीफ़ घोंघी नहीं)। घों कुछ भी हो सकता है । मिश्रा जी के इस अर्ध-सम्मान के लिए अर्ध नत मस्तक हुआ।कुछ दिनों पश्चात मिश्रा जी प्रसन्नचित्त मुद्रा में पधारे और आते ही बोले-

’यार चलो ! उठो ,जनता के विचार लेते आएं’

क्या"?-मैने जानना चाहा

’अरे क्या क्या ?तुम्हारी सारी प्रतियां वितरित कर आया समाज के विभिन्न वर्गों में ,ज़मीन से जुड़े लोगों के मध्य। देशी ज़मीन के देशी लोगों मे।"

"क्यों’?

"क्योंकि ये लोग निस्पृह और स्पष्ट विचार रखते हैं।ये पूर्वाग्रह ग्रसित नहीं होते।ये शब्द चबा चबा कर नहीं बोलते। ये निर्मल और निश्छल होते हैं। सहमति और असहमति इनके दिल प्रदेश से निकलती है।"

"अच्छा ! मन हर्षित हुआ। चेहरे पर एक चमक उभर आई। मिश्रा ने एक सत्कार्य किया। देखते हैं यह ’स्वयंभू" क्या लिखते हैं? लोकतन्त्र है जनता की आवाज़ ही जनार्दन की आवाज़ है।उन समीक्षकों का क्या जो कमरे बन्द कर लिखते हैं और दिमाग कि खिड़कियां भी नहीं खोलते।

मैं झट तैयार हो ,मिश्रा के स्कूटर पर रथारुढ हो चल पड़ा अर्जुन की तरह।

पूरे मार्ग सोचता रहा कि मिश्रा ने अवश्य यह किताब किसी महाविद्यालय ,किसी विश्व-विद्यालय के प्राध्यापक को दिया होगा मेरा व्यंग्य-संग्रह।ये लोग भी तो ’सूर-सूर तुलसी शशि" पढ़ते पढ़ाते रहते हैं ।इनके अपने सन्तुष्ट और सौष्ठव विचार होते हैं। कुछ नव साहित्य पर चर्चा होगी,नए आयाम नए दृष्टिकोण पर वार्ता होगी कि मिश्रा ने अचानक एक हलवाई की दुकान के सामने स्कूटर रोक कर खड़ा किया। मैने समझा कि भारतीय संस्कृति के अनुरूप मिष्ठान वग़ैरह लेकर चलेगा ,समीक्षा मीठी होगी...कि मिश्रा ने दुकानदार से अनौपचारिक प्रश्न किया-

"कहो भाई ! कैसा चल रहा है?’

"सलाम स्साब ,1-किलो तौल दूं ?"

"अरे भाई ! आज मि्ष्ठान लेने नहीं ,विचार लेने आया हूं। आप ने वो किताब पढ़ी ?"

"कौन सी स्साब ?"

"अरे वही जो विगत सप्ताह दे गया था?

"अरे वो ! क्या करें स्साब ! धन्धा बड़ा मन्दा चल रहा है "

"यार मैं धन्धे की नहीं मै उस किताब...."

"व्यंग्य के धन्धे में कोई लाभ नहीं है स्साब !न लिखने में ,न प्रकाशन में। और उस किताब में तो स्साब ! पाक ही कच्चा रह गया था ,एक-रसता नहीं थी तार नहीं बन पाया था....।’

मैं आश्चर्य चकित रह गया। तो क्या मिश्रा ने एक प्रति इस हलवाई को सौंप दी थी ?किसी प्राध्यापक को देना उचित नहीं समझा? फिर भी मैं सज्जनता वश चुप था कि हलवाई ने पुन: कहा-

" स्साब ! जिस व्यंग्य का पाक कच्चा रहेगा ,तार नहीं बनेगा वह समाज को नहीं बाँध पाएगा ..अपितु कुछ दिनों बाद वही व्यंग्य एक सड़ान्ध गन्ध देगा.."

मैं हलवाई जी की इस विलक्षण समीक्षा प्रतिभा पर अचम्भित रह गया।हो न हो पूर्व जन्म में यह अवश्य ही कोई व्यंग्य लेखक रहा होगा और किसी दुर्वासा समीक्षक के श्राप से इस जन्म में हलवाई बन गया है

"तो कैसे बिकेगी यह किताब ?"-मिश्रा चिन्ता में डूब गया

"चिन्ता की कोई बात नहीं ,स्साब ! -हलवाई ने ढाढस बँधाते हुए कहा -"जब ऐसी मिठाईयां खराब हो जाती हैं तो हम लोग किसी मेले-ठेले में ,किसी सरकारी ’कैन्टीन’ में ठेल देते हैं।आप भी किसी सरकारी लाइब्रेरी या पुस्तक मेले में ठेल दीजिए स्साब ।सुना है कि कलकत्ता में तो लाईन लगा कर पुस्तक खरीदते हैं लोग।

मैं हलवाई जी की इस व्यापार-प्रतिभा पर नत मस्तक हो कर चल दिया ।

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क्रमश:

(....श्शी.... श्शी......व्यंग्य अभी जारी है.......)





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