शुक्रवार, 14 दिसंबर 2012

धारावाहिक व्यंग्य : ...छपाना एक पुस्तक का ..(भाग-5)

[पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि मिश्रा जी ने कैसे मेरी किताब समीक्षा के लिए एक ’हलवाई ’जी को दे आए थे और कैसे उस हलवाई जी ने अपने मिष्ठान पाक शैली में अपनी समीक्षा प्रस्तुत की। अब आगे पढ़िए.......]




....छपाना एक पुस्तक का ...(भाग-5)



चलते चलते मिश्रा जी ने एक सिनेमा हाल के सामने स्कूटर खड़ा किया।मैने आशंका व आक्रोशवश प्रश्न किया -" तो क्या अब यह टिकट की खिड़की वाला बतायेगा कि ’व्यंग्य संग्रह ’ बाक्स आफ़िस पे हिट हुआ कि नहीं ?

"अरे नही यार ! " मिश्रा जी ने अनौपचारिक रूप से कह -" यह वह चेहरा है जो ’पब्लिक डिमाण्ड’ के हर एपिसोड में दिखाई देता है ।यह वह चेहरा है जो हर फ़िल्म,हर कहानी ,हर गाने पर अपनी बेबाक राय देता है ,स्पष्ट टिप्पणी करता है । यही है वो चेहरा जो माधुरी दीक्षित को माधुरी दीक्षित बनाता है ।नम्बर टेन के गाने को नम्बर वन पे लाता है ।तुम हिन्दी के लेखक हो यह सब आधुनिक बातें क्या समझोगे । तुम रह गए ’घों’ के ’घों’.....

"खबरदार मिश्रा ! तुम क्या समझते हि कि हमें ’घों’ का अर्थ नहीं मालूम ?"

मिश्रा जी सकपका गए। फिर उन्होने ने एक ’ब्लैक ’टिकट बेचने वाले को बुलाया

"सलाम स्साब ! कितना टिकट दूं साब ? दो का चार दो का चार"

’अरे नहीं मुन्ना भाई ! इधर तुम से कुछ पूछने को आया।’

’साब! धन्धे का टैम है । एक तो फिलिम सड़ेला है ऊपर से धन्धा ठण्डा चल रहा है । फ़ोकट में पूछना है तो बाद में आना साब

बाद में क्या आता। विचार जानना था ,सोचा प्रतीक्षा करना ही श्रेयस्कर है। वैसे भी तो बड़े बड़े समीक्षक प्रतीक्षा ही तो करवाते हैं अपने अध्ययन कक्ष में । फ़ोन करो तो पता चलता है कि साहब बाथरूम में है। लगता है कि बाथरूम में ही बैठ कर समीक्षा लिखते हैं ,तभी तो ऐसी गन्ध आती है।

मैं विचलित हो रहा था } इस मिश्रा के बच्चे ने कहां लाकर फँसा दिया। समीक्षा न होती तो क्या बिगड़ जाता ? व्यर्थ में रक्त जला रहे हैं। ख़ैर , मुन्ना भाई धन्धा ख़त्म कर ,पुलिस का अंशदान कर निवृत हो कर आया।

"पूछो साब.क्या पूछना माँगता?"

’अरे ,वो किताब पढ़ी ?’

’कौन सी साब?’

अरे ! वही ,जो तुमको दे गया था’

’पढ़ी साब’-मुन्ना के चेहरे पे मुस्कान .आंखों में चमक ,कथन में आत्म विश्वास था। मैने भी उच्छवास छोड़ ,चैन की सांस ली। सरकार के प्रौढ़ शिक्षा कार्यक्रम के महत्व का पता आज चला।सार्थक हो गई मेरी रचना ,सफल हो गया मेरा परिश्रम।

" कैसा लगा"-मिश्रा ने जिज्ञासा प्रगट की।

"धांसू साब,क्या जोरदार लिखा है ।क़सम साब ,मज़ा आ गया रात ’

’रात?’किधर पढ़ा?-मिश्रा चौंका

’उदर को साब ,खोली में पढ़ा’

’उदर काई कूं पढ़ा? इदर पढ़ने का नहीं क्या?-मिश्रा ने भाषा सामंजस्य स्थापित किया.विचारों के सहज आदान-प्रदान के लिए।

’इदर को साब ? फुटपाथ पे?इदर पढ़ेगा तो पुलिस जास्ती मारता’

"काइ कू मारता?’

’बोलता है ऐसी किताबें पढ़ेगा तो एक महीने को भीतर कर देगा’- मुन्ना ने अपनी स्थिति स्पष्ट की।

मैं दंग रह गया।मेरी किताब पढ़ने से पुलिस मना करती है?व्यंग्य लिखना कोई अपराध है?यह तो दर्पण है। आप का चेहरा विकृति है तो मत देखिए ,मगर दूसरों को पढ़ने से मना क्यों करते हो? यहां लोक तन्त्र है।अभिव्यक्ति की आज़ादी है। लिखने की आज़ादी,पढ़ने की आज़ादी।यह अन्याय है।मैं इस अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाऊंगा। मेरा संग्रह कोई ’सैतानिक वर्सेज’ नहीं ,कोई ’लज्जा’ नहीं कि लोग छुप-छुप कर रात के अन्धेरे में पढ़ें। हर विद्रोही कवि की तरह मैं उबल रहा था कि मिश्रा ने पूछा -

" भाई मुन्ना ! तुम कौन सी किताब की बात कर रहे हो?’

’वही साब ,जिसे बड़ा बड़ा साब लोग रात अकेले बेड रूम में पढ़ता है। हम छोटा लोग उदर खोली में पढ़ता । ऐसी किताबें मिलती कहाँ है यह तो मालूम, परन्तु छपती कहां से है मालूम नहीं ,साब।"

"मैने मिश्रा से कहा,"यार मिश्रा ,लगता है यह किसी ’पार्णग्रही’ किताब की बात कर रहा है ...राम! राम! राम!

"पार्णग्रही’ नहीं ’पार्नग्रफ़ी’ किताब की बात कर रहा है"

’हाँ,हाँ वही"-मैने स्पष्ट किया

अचानक वार्ता क्रम में मुन्ना भाई चहक उठा-’बरोबर पकड़ा साब। वही किताब। बाई गाड ,बड़ा मज़ा देती है’

अरे ! वो जो मैने दी थी’-मिश्रा ने स्पष्ट किया

’अरे वो? बण्डल साब। वही तो बेंच कर खरीदी थी। आठ आना मिला था। एक बात कहूं साब ,व्यंग्य-श्यंग कोई नहीं पढ़ता ,खाली आलमारी में सज़ा कर रखता है बड़ा साब लोग।

मैं व्यंग्य के भविष्य की चिन्ता माथे उठाए चला आया।

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क्रमश:

(....श्शी.... श्शी......व्यंग्य अभी जारी है.......)



-आनन्द.पाठक-

09413395592



1 टिप्पणी:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

मित्रों!
13 दिसम्बर से 16 दिसम्बर तक देहरादून में प्रवास पर हूँ!
इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (16-12-2012) के चर्चा मंच (भारत बहुत महान) पर भी होगी!
सूचनार्थ!