शुक्रवार, 21 दिसंबर 2012

धारावाहिक व्यंग्य :...छपाना एक पुस्तक का..(भाग 6 और अन्तिम कड़ी)




[मित्रो ! पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि मिश्रा जी ने किन किन लोगों से मेरी किताब की समीक्षा करवाई । पिछली बार मुन्ना भाई सिनेमा का ’ब्लैक टिकट" बेचने वाले ने मेरे व्यंग्य-संग्रह पर कैसे अपने स्वस्थ विचार रखे थे कि अब ,,,........]



          मैने निश्चय कर लिया कि अब कहीं नहीं जाऊँगा । लिखना पढ़ना सब व्यर्थ।मिश्रा जी ने ढाढस बधाँया।दर्शन बताया ,समीक्षा का रहस्य समझाया।फिर भी...’आशा बलवती राजन’।अनमने मन से ,मिश्रा जी के साथ चल पड़ा। कदाचित कोई सुयोग्य समीक्षक मिल ही जाय कि अचानक मिश्रा ने स्कूटर खड़ा किया।

"सलाम साहब"- स्कूटर रुकते ही रहमान मियां ने कहा

रहमान मियां रद्दी बेंचने और ख़रीदने का काम करते थे।कबाड़ी थे। संग्रह की एक प्रति सम्भवत: मिश्रा जी उन्हें भी दे आए थे।

’किताब पढ़ी"?

’कौन सी साहब?’अच्छा वो ? बण्डल है साहब ,पेपर सड़ीला है ।इसका तो ठोंगा भी नहीं बनता। आप कहेगा तो तीन रुपया किलो लगा दूंगा।

’यार रद्दी का भाव नहीं ,व्यंग्य का भाव पूछ रहा हूं’

’व्यंग्य श्यंग्य सब बरोबर । फ़िल्मी मैगज़ीन चार रुपए किलो चल रहा है। साहब लोग ठोंगे में भूँजा खाता है और फ़ोकट में हीरोइन का फ़ोटू भी देखता है।’

’यार मिश्रा ! ’-मैने कहा-’व्यंग्य का भाव अब किलो में ?तीन रूपया?’

’तुम कहेगा साहब’-रहमान मियां मेरी तरफ़ मुड़ कर बोले-’आठ आने जास्ती लगा दूंगा।यह साहब तो अपने मुहल्ले में रहता है इस वास्ते’। व्यंग्य श्यंग्य का कोई मार्किट नहीं साहब !’

मैं गुस्से में उठा और वापस चल दिया घर की ओर।अब कहीं नहीं जाना। निश्चय कर चुका था कि मिश्रा ने अचानक स्कूटर एक रिक्शा वाले के सामने रोक दिया। मैं फिर चौंका। तो क्या मिश्रा अब मुझे स्कूटर से उतार कर रिक्शे से रवाना करेगा ?

मिश्रा ने तुरन्त रिक्शेवाले के कंधे पर हाथ रख दिया अपनापन जताने के लिए।कुछ इधर-उधर की अनौपचारिक वार्ता के बाद ज्ञात हुआ कि यह भी एक पहुँचा हुआ समीक्षक है। उसकी मान्यता है या उसे यह भ्रम है कि रिक्शे के तीनों पहिए साहित्य की विधायें हैं-कविता ,कहानी,उपन्यास-जिन्हें वह गति देता है। अगर किसी ने गति पकड़ी तो ’आलोचना’ का ’ब्रेक’ भी लगा देता है।

मिश्रा ने पूछा-’अरे वो किताब पढ़ी?

कौन सी?

अरे वही?

अरे वो? वो तो फ़ालतू थी साहब।

क्यों?

’क्यों कि भीतर कोई फोटू ही नहीं था .बस ’कवर’ का फोटू जानदार था साहब।मगर ’टाइटिल’ बण्डल। अब आप ही बताइए साहब -"शरणम श्रीमती जी’-यह भी कोई टाइटिल है? लेखक को दीदी के ’शरणम’ की नहीं "चरणम’ की ज़रूरत है बिल्कुल ’भिरगू’ मुनि की तरह। उधर बस्ती वाला बोलता है कि दीदी अपनी तरफ़ की है।

बाद में ज्ञात हुआ कि उक्त रिक्शावाला ,अपने ही ससुराल क्षेत्र का था। भृगु क्षेत्र ’बलिया’ का

तत्पश्चात ,सारी समीक्षा वहीं की वहीं रख आए। लौट कर बुद्धू..नहीं नहीं ’घों’..घों’ घर को आये।

अस्तु

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-आनन्द.पाठक

09413395592

अभ्यास के लिए प्रश्न:-

प्रश्न : इस व्यंग्य से क्या शिक्षा मिलती है उर्फ़ moral of the story kyaa hai"

उ0 : इस व्यंग्य से यही शिक्षा मिलती है कि

(1) नए लेखकों को व्यंग्य नहीं लिखना चाहिए

(2) यदि लिख भी दिया तो उसे छपवाने की नहीं सोचना चाहिए

(3) यदि छपवा भी दिया तो उसकी समीक्षा का नहीं सोचना चाहिए

(4) यदि समीक्षा का सोच लिया तो प्रकाशक...समीक्षक...मिश्रा जी जैसे लोगो से बचना चाहिए

(5) फिर भी न बच सके तो ऐसे लोगों को expose करने के लिए ’व्यंग्य’ लिखना चाहिए





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