गुरुवार, 3 जनवरी 2013

एक व्यंग्य : सखेद सधन्यवाद....[भाग 2/2]



[पिछले भाग में आप ने पढ़ा कि किस तरह हिन्दी के हित और हिन्दी की चिन्ता के प्रति हम और मिश्रा जी श्वान-युद्ध कर रहे थे और हिन्दी के उद्धार के लिए अपनी प्रतिबद्धता ज़ाहिर कर रहे थे । वो हमारे ऊपर चढ़ ही बैठते अगर हम सही समय पर उनसे यह न कहते ----"" मिश्रा ! हिन्दी का भट्टा कचरे से नहीं बैठता । बैठता है हमारी तुम्हारी लड़ाई से ’-मिश्रा जी ठण्डे पड़ गए । हिन्दी के साहित्यकार थे ।

एक बात और

जो पाठक पिछला अंश किसी कारणवश न पढ़ पायें हों तो वह उसे यहाँ पढ़ सकते हैं

www.akpathak317.blogspot.com



अब आगे पढ़िए........]



"मगर मिश्रा ! इस में तो हमें सम्पादकों का कोई बड़ा षड़यन्त्र लगता है । विदेशी मीडिया का भी हाथ हो सकता है। हो सकता है कि किसी पड़ोसी देश की राजनीतिक साज़िश हो कि हिन्दी को पनपने ही न दो और आनन्द पाठक की सारी रचनायें सखेद सधन्यवाद वापस करते रहो।हमें इस के विरुद्ध एक सशक्त आन्दोलन चलाना चाहिए।एक बड़ा संघर्ष छेड़ना चाहिए।एक क्रान्ति करनी होगी।"

’मगर हिन्दी में तो संघर्ष तो खेमा से चलता है । बड़े संघर्ष के लिए बड़ा खेमा।बारह खंभें -चौसठ खूंटा।

’अरे !है न ! जुम्मन मियां से कह कर एक बड़ा खेमा लगवा देंगे’

"और योद्धा ?"

"है न ! हम तुम और वो"

"वो कौन?-मिश्रा ने सशंकित दृष्टि से देखा

"वो ,अरे वो नुक्कड़ का पाण्डेय पान वाला । जब तक पान लगाता है मेरी कविता बड़े चाव से सुनता है ।और जानते हो? असली योद्धा तो 2-4 ही होते हैं अन्य तो बस ’कमेन्ट्री पास करते हैं-मैने मिश्रा जी की जिज्ञासा शान्त की ।

आन्दोलन छेड़ने के लिए मैने मानसिक धरातल तैयार कर लिया।कुछ अग्नि-शिखा से शब्द ,कुछ विष सिक्त वाक्य रट लिया । आन्दोलन की प्रारम्भ स्थानीय स्तर से हो तो उत्तम। दुर्वासा बन कर एक स्थानीय सम्पादक के कार्यालय में घुस गया और फुँफकारते हुए कहा-

"आप लोगो ने सत्यानाश कर दिया है हिन्दी का"

"आप जैसे कितने कुकुरमुत्ते उग आये हैं आजकल ’-उक्त सम्पादक भी दूसरा दुर्वासा निकला

"देखिए आप कुत्तों को गाली मत दीजिए"-मैने कुत्तों के प्रति समर्थन जताते हुए कहा

"क्यों न दूं? यहाँ जो भी आता है अपने को प्रेमचन्द बताता है ।चैन से सोने भी नहीं देते उस महान आत्मा को"।

"आप ने मेरी रचनायें पढ़ी हैं?"

"पढ़ी है !अरे ,मैं पूछता हूं कि हिन्दी में ’वात्सायन (कामसूत्र वाले) से आगे भी कुछ लिखा गया है कि नहीं?"

"जब तक आप अतीत से जुड़ेगे नहीं...जब तक आप ’काम’ से जुड़ेंगे नहीं....

इससे पूर्व कि मैं अपनी बातें खत्म करता ,दो लोगो ने मुझे सशरीर उठा ’सखेद सधन्यवाद’ कर दिया

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मिश्रा जी सुबह सुबह आ गये।

’मिश्रा !जानते हो? कल मैं एक सम्पादक से मिला था।खूब खरी खोटी सुनाई।और मैने कहा कि आप लोगों ने हिन्दी का सत्यानाश कर रखा है।

"अच्छा’-मिश्रा जी उत्सुक हो सुनने लगे-’ तो क्या कहा उसने?’

’यही तो रोना है। कहा तो उसने कुछ नहीं ,सखेद सधन्यवाद वापस कर दिया अपने कक्ष से’



अभी युद्ध वर्णन चल ही रहा था कि डाकिए ने आकर एक लिफ़ाफ़ा थमाया ।खोला तो देखा ,रचना प्राप्ति व प्रकाशन स्वीकृति पत्र था। मैं मन ही मन नतमस्तक हुआ उस सम्पादक के प्रति।उसके हिन्दी प्रेम के प्रति।अरे क्या हुआ जो उसकी पत्रिका वर्ष में एक बार छपती है।छपती तो है।ग्रामीण पृष्ठभूमि की ,गांव की सोंधी मिट्टी से जुड़ी जहां भारत की आत्मा आज भी बसती है।

" देखा मिश्रा ! मैं कहता था न ,अभी भी कुछ सुधी सम्पादक गण हैं।

"और वो खेमा ?" वह आन्दोलन?

"छोड़ो यार ! बाद में देखेंगे।अभी मुझे अगली रचना भेजनी है"



और मैं अपनी कलम में स्याही भरने लगा ।



अस्तु


-आनन्द.पाठक-

09413395592



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