रविवार, 21 जुलाई 2013

व्यंग्य: एक गीत का पोस्टमार्टम...[क़िस्त-2]

गतांक से आगे.... [...पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि किस तरह युवाओं की आग्रह पर सरकार ने ’बम्बईया फ़िलिम’ को एक ऎच्छिक विषय के तौर पर अनुमति दे दी और कैसे हमारे शिक्षकों ने उस विषय पर पढ़ाना शुरु कर दिया ...कैसे ’गेस-पेपर’ छापे जाने लगे..कैसे हमारे शिक्षाविदों ने कोर्स में घुसने के लिए ’जुगत’ भिड़ाने लगे और कैसे ’सर’ इम्पार्टेन्ट क्वेश्चन’ बता बता कर परीक्षा की तैयारी कराने लगे.....। अब आगे पढिए.....] परीक्षा की घड़ी आ गई । सर ने समझाया था कि परीक्षा -कक्ष में घबड़ाना नहीं ,अपने इष्ट हीरो-हिरोईन को स्मरण करना ,अवश्य मदद करेंगे। कई निर्देशको व फ़ाईनेन्सरों का करते हैं। लिखना ,धुंआधार लिखना ,मगर लिखना ज़रूर।मूलोनास्ति कुतो शाखा ??लिखोगे नहीं तो नम्बर कहां से मिलेगा?कुछ कुछ परीक्षक तो मात्र पन्ने गिन कर अंक प्रदान करते हैं। प्रश्न-पत्र मिला तो आंखों के सामने अँधेरा छा गया।प्रथम प्रश्न था-अरे! यह क्या प्रश्न है? यह तो पाठ्यक्रम के बाहर का प्रश्न है।हम इसका बहिष्कार करेंगे?कहाँ तो हम प्रात: स्मरणीया ’प्रीटि ज़िन्टा’ जी का जीवन परिचय रट कर आये थे -क्या खातीं है...क्या पहनती हैं.कैसे चलती हैं...उन्हें क्या क्या पसन्द है....आजकल उनका किससे टांका..उस फ़िल्म की शूटिंग बीच में छोड़ कर क्यों चली गईं थी...फिर निर्माता ने एड्वान्स दिया तो कैसे मान गईं...। मगर इस खूँसट पेपर-सेटर साले को इतनी अच्छी अच्छी सुमुखी जिन्स धारिणी अभिनेत्रियों को छोड़ कर गिनती रटने की क्या ज़रूरत थी।अरे! यही गिनती पहाड़ा रटना होता तो हम ’मैथ’ विषय न ले लिए होते। साइन्टिस्ट इंजीनियर न बने होते! हाल में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा है।लगता है फ़िल्में तो सभी ने देखी होंगी मगर उस फ़िल्म के साहित्यिक ,सामाजिक ,राजनैतिक,आर्थिक तकनीकि पहलुओं पर ध्यान न दिया होगा।मात्र हीरो-हिरोईन के लटके-झटके में या फिर हीरो-विलेन के ढिशुंग-ढिशुंग में ही 3-घण्टे गँवा दिए।अब इस परीक्षा में गंवाने पड़ेंगे। मेरा चिट-भंडार किसी ठंडे बारूद की तरह निष्क्रिय हो गया ।लगता है अब पास वाले मित्र या परीक्षार्थी से मदद याचना करनी पड़ेगी। -"अरे बंटी ! यह कौन सा प्रश्न है यार !।एक-दो-तीन-चार? -"आगे चार-पाँच-छह सात भी लिखा है क्या" -अरे हां !हाँ ! तू जानता है क्या? -उसके आगे 9-2-11 भी लिखा है क्या? अरे! यार ,यह तो गाना है ’फ़िलिम’ का ।क्या राप्चिक गाना था ..मस्त...मज़ा आ गया था फ़िलिम देख कर..क्या मस्त हिरोईन थी....वाऊ.."-बंटी जी खड़े हो गये नाचने के लिए। आवेश के क्षणों में भूल गये यह सड़क नहीं ,परीक्षा-कक्ष है।यह तो अच्छा हुआ कि उन्होने एक-दो ठुमका नहीं लगाया अन्यथा पूरा परीक्षा-कक्ष ही ठुमका लगाने लगता। "अरे ! वो गाना !..." अब मेरे हॄदय में भी विश्वास का संचार होने लगा। हम भी कहें कि फ़िल्मी-कोर्स की परीक्षा में यह गणित का प्रश्न-पत्र कहाँ से आ गया?? "साइलेन्स प्लीज़-कृपया शान्त रहें"- कक्ष-निरीक्षक नें ऊँघते-उँघते हुए वहीं से आवाज़ लगाई।कक्ष में फिर एक ्बार सन्नाटा फ़ैल गया और मैं उत्तर लिखने में व्यस्त हो गया। प्रथमत: मैं चक्षु बन्द कर ध्यान-योग मुद्रा में उस फ़िल्म का ’डान्स-स्वीकेन्स’ याद करने लगा। गुरू जी ने कहा था -वत्स !संकट की घड़ी में घबड़ाना नहीं ....अपने इष्ट हीरो-हिरोईनों का स्मरण करना- अनिल कपूर ...माधुरी दीक्षित.जी...फिर वह गाना...फिर नाचना ---फिर गाना...फिर छेड़-छाड़--फिर...फिर...सब कुछ आंखों के सामने एक एक कर के दृश्य आने लगे किसी चल् चित्र की तरह..। 1 -2 -3 -4- 5- 6 -7- 8 -9 -10 --11 -12 -13 [एक दो तीन चार पाँच छै सात आठ नौ दस ग्यारा बारा तेरा तेरा करूँ गिन गिन के मैं इन्तज़ार ,आजा सनम आई बहार] पर्दे पर यह गीत कई बार देख चुका हूँ मगर आज तक मैं यही समझता था कि श्रीमान हीरों जी सुश्री हिरोईन जी को गणित सिखा रहा है -नाच गा कर। काश ! कि हमारे ज़माने में गुरु जी या मैडम जी ने मुझे भी ऐसे से ही गणित पढ़ाई होती तो ’मैथ’ में मैं 3 बार फ़ेल न हुआ होता और आज यह कलम घिसाई न कर रहा होता। परन्तु आज यह महसूस हुआ कि इस महान गीत की आत्मा को न समझ सका। इसके साहित्यिक या सामाजिक ,[संभवत: आर्थिक भी] पहलू न पहचान सका।छोटा आदमी हूँ बड़ा कुछ सोच न सका।महान गीतकारों की रचनायें महान होती हैं ।उनको समझने के लिए उर्वरा मस्तिष्क होना चाहिए ।यही कारण है कि जब महान कवि काव्य-पाठ करते हैं तो श्रोता गण ’हूट’ कर देते हैं लेकिन जब मस्तराम आवारा ’मस्त’ जी अपनी कविता सुनाते है तो श्रोता तालियां बजाते हैं ।वैसे तालियां मेरे भी कविता पाठ पर भी नहीं बजती। ऊपर वाले गाने की व्याख्या सुन कर मेरा दिव्य-ज्ञान जग गया। मेरे अन्तर्नेत्र खुल गये।सर जी इस गाने के ’यथार्थवाद ’ में ही उलझ कर रह गये ।’रहस्यवाद’ नहीं पकड़ा ,मैने पकड़ लिया। इस गीत के माध्यम से कवि कहना चाहता है.... ’हे मूढ़ श्रोता ! मन्दबुद्धि !’एक’ का अर्थ भगवान से है । भगवान 1-है तुम उसे अल्लाह कहो ..राम कहो..यीशु कहो..-सब एक हैं।यहाँ ’एक’ शब्द का प्रयोग सर्वधर्म समभाव व धार्मिक सहिष्णुता के रूप में किया गया है-सबका मालिक एक है।यह एक असम्प्रदायिक परिभाषा है।यही अद्वैतवाद है।परन्तु कवि ने इसका प्रयोग ’फिल्म’ में हीरोईन महोदया के लिए किया है -हे सुमुखी !चैन हारिणी! तुम चांद की तरह ’एक’ हो जिसके इर्द-गिर्द हीरो-डाइरेक्टर प्रोड्यूसर तथा मेरे जैसे लगुये-भगुये कीड़े-मकोड़े ’फ़ैन’ निश दिन चक्कर काटते रहते हैं। और ’दो" शब्द का प्रयोग? यहाँ पर इस शब्द का प्रयोग दो रूप में क्या गया है।आप इसे ’द्वैतवाद’ के रूप में भी समझ सकते हैं।जैसे बिना ’द्वैतवाद’ का जीवन दर्शन पूर्ण नहीं हो सकता वैसे ही बिना २-पात्रों -हीरो और हीरोईन के बिना कोई फ़िल्म पूर्ण नहीं हो सकती। ’अद्वैत वाद ’ से मात्र ’समान्तर सिनेमा’ ही बन सकता है जो फ़िल्म के ’मोक्ष’[फ़्लाप] की गारन्टी है। हिन्दी मास में २-पक्ष होते हैं-शुक्ल पक्ष एवं कॄष्ण पक्ष । कवि कहना चाहता है हे सुमुखी ! हे हीरोईन कूल्हा-मटकावनी मल्लिका -तुम्हारी केश राशि कॄष्ण पक्ष की तरह काले और मुख शुक्ल पक्ष की तरह गौर वर्ण अर्थात गोरा है ।अत: हे...... और तीन ? तीन शब्द का प्रयोग कवि ने बहुत सोच विचार कर किया है। वह एक रहस्य है.। यह भगवान ’शंकर’ के त्रि-नेत्र की तरफ़ इंगित करता है कि जब हीरो शान्त भाव से ,हीरोईन के ध्यान में ध्यानस्थ रहता है तो सर्वत्र शान्ति बनी रहती है।ऐसा प्राय: फ़िल्म के ’इन्टर्वल’[मध्यान्तर] तक रहता है तत्पश्चात जब हीरो अपना ’त्रिनेत्र’ खोलता है तो मुहल्ले के सारे गुण्डे-मवाली-टपोरी और कभी कभी हीरोईन का बाप भी भस्म हो जाता है।सारी बुराईयां खत्म हो जाती है। ’विलेन’ जेल चला जाता है और फिर सर्वत्र ओम शान्ति ओम छा जाती है और चार? महीने में चार हफ़्ते होते हैं।यहाँ पर यह ’चार’ -विलेन जी के ’हफ़्ता’ वसूलने को इंगित करता है।यही लक्षणा है ,यही व्यंजना है।यही इस कविता का सौन्दर्य भी है । ’पाँच’ के बारे में आप को क्या बताना ! तुलसी दास जी पहले ही बता गये हैं क्षिति जल पावक गगन समीरा पंच तत्व मिल बना शरीरा हीरो कहता है -हे विलेन की विधवा ! तू शोक न कर। मैने उसको गोली मार कर ’पंचतत्व में विलीन कर दिया है ।मेरे हाथों उसका मोक्ष हो गया है। परिक्षक भ्रम में न रहें। यहाँ पर इस शब्द का प्रयोग इस सन्दर्भ में नहीं किया है । एक कवि ,एक गीतकार जब फ़िल्मी गीत लिखता है तो बहुत कुछ देखना पड़ता है उसे -सिवा अपनी कल्पनाशीलता के- सिचुएशन देखना पड़ता है -हीरो का ध्यान रखना पड़ता है हीरोईन का ख्याल रखना पड़ता है । मल्लिका शेरावत से निरुपाराय जी के गीत तो नहीं गवा सकते न।फिर डाइरेक्टर -प्रोड्युसर जी का भी ,अपने पेमेन्ट की संभावनाओं का भी ध्यान रखना पड़ता है-सिवा अपने गीत के भाव के। गीत का भाव क्या? जैसा पैसा वैसा भाव।यहां पर गीतकार ’पाँच’ शब्द के प्रयोग कर यह संकेत देना चाहता है कि हे प्रोड्युसर भईया ! अगर यह गाना ’हिट’ हो गया तो तेरी ’पाँचों’-ऊगलियाँ घी में होगी।न शोचयन्ति अर्हसि’- और छ:? [व्यंग्य जारी है......] आनन्द.पाठक 09413395592

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