रविवार, 14 जुलाई 2013

एक व्यंग्य: पोस्टमार्टम एक गीत का...[क़िस्त १]

[और वो गीत है १....२...३...४..५..६..७...८..९..१०..११..१२..बारा तेरा] जब से ’शोले’ फ़िल्म ’न भूतो ,न भविष्यति’ पद को प्राप्त हुई है तब से कई फ़िल्मकार इस पद पर पुनर्स्थापना हेतु निरन्तर प्रयासरत हैं। जिसे देखो वही ’शोले’ फ़िल्म का ’रिमेक’ बना रहा है । ्तेलगु से लेकर हिन्दी तक ,मलयालम से लेकर भोजपुरी तक।हर कोई चाहता है कि उसे ’गब्बर सिंह’ वाली भूमिका मिले। अब ’बाबी डार्लिंग ही बच गईं है । हर कोई ’गब्बर सिंह’ की तरह संवाद अदायगी कर रहा है- कितने आदमी थे? आयं ! लगा तो निशाना इस हरामजादे पर। हा! हा ! हा! यह भी बच गया स्साला ! लगता है आने वाली पीढ़ी ’गाँधी’ जी के विचार भूल जायेगी मगर ’गब्बर जी’ के डायलाग नहीं भूल पायेगी।इसी उत्साह से अति प्रभावित होकर हमारे युवाओं ने माँग रख दी -बहुत पढ़ चुके हम ’सूर’ कबीर’ तुलसी’। सूर सूर तुलसी शशि।अब समय आ गया है नये युग के साथ चलने का । कुछ नई सोच का।हमारा मानना है कि हमारे हिन्दी के अति कठिन पाठ्यक्रमों में’बम्बईया फ़िलिम’ का भी एक पाठ्यक्रम शामिल किया जाय।इससे हिन्दी को एक नया बल मिलेगा ,एक नई दिशा मिलेगी,एक नया सोच मिलेगा। हमें फ़िलिम देखने का औचित्य मिलेगा। गुरु जी को विदेश जाने का आधार मिलेगा। देखने को तो हम फ़िल्में अब भी देखते हैं परन्तु इसका पठन-पाठन में कहीं उपयोग नहीं हो पा रहा है । यदि यह विषय पाठ्य क्रम में समाहित हो जाय तो कम से कम एक विषय में तो अच्छे नम्बर से पास हो जाते ।परन्तु सरकार है कि सुनती ही नहीं।लगता है कि अपुन का अब दादागिरी के बजाय ’गांधीगिरी’ करना पड़ेगा। आन्दोलन करना पड़ेगा..रास्ता जाम करना पड़ेगा..2-4 गाड़ियां फूँकनी पड़ेगी...भूख हड़ताल करनी पड़ेगी..आमरण अनशन करना पड़ेगा....युवाओं ने सोचा। हमारे युवा हमारे भविष्य हैं ।यही सोच कर सरकार ने प्रायोगिक तौर पर ’बम्बईया फ़िलिम’ को एक ऎच्छिक विषय के रूप में शामिल कर लिया।युवाओं में एक नये उत्साह का संचरण हुआ। कुछ तो अपनी कंघी निकाल अपने अपने बाल सेट करने लगे कुछ लड़कियां ’गोरे गोरे मुखड़े पर काला काला चश्मा’ लगाने लगीं और कुछ छात्र ’वाह रे करिश्मा’ गाने लगे।नये पाठ्यक्रम की नई शुरुआत।’रजत-पट’ पर नये ’टेक्स्ट बुक’ लिखे जाने लगे ।कुछ प्रकाशक ऐसी ही पुस्तकें छाप-छाप कर ’रजत(चाँदी) काटने लगे।कुछ हमारे जैसे बैठे-ठाले निठ्ठल्लुआ लेखक उन ’टेक्स्ट-बुक’ की कुंजी लिखने लग गये और भाग्य की कुंजी खोजने लग गये।कुछ लोग फ़िल्मों के संभावित प्रश्न और उत्तर और ’गेस-पेपर’ छापने में लग गये। कुछ शिक्षा विभाग में सक्रिय हो गये कि पाठ्य पुस्तकों में उनकी भी ’फ़िल्म’ शामिल कर ली जाय जो भले ही ’बाक्स-आफ़िस’ पे भले ही पिट चुकी हो ।कोर्स में लग जायेगी तो उद्धार हो जायेगा उधार निपट जायेगा। मरणोपरान्त का क्या भरोसा !वह जानता है कि एक बात पाठ्यक्रम में घुस गई तो अमर हो जायेगी यही फ़िल्म। हम क्या गलत कर रहें हैं? हिन्दी के बहुत से लेखक भी तो यही करते हैं। फिर यही पीढ़ी देख-देख (पढ-पढ़ )कर जवान होगी । शोध होगा चर्चा होगी सेमिनार होगा । हो सकता है कि इस फ़िल्म के तकनीकि पहलुओं के अध्ययन हेतु विदेश यात्रा का योग बने जैसे हमारे कुछ स्वनामधन्य साहित्यकारों ने ’विश्व-हिन्दी-सम्मेलन’ भारत में न कर ’न्यूयार्क. मे किया कि हिन्दी पल्लवित हो गई। फिर अमेरिका की धरती से पता चला कि हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिये "इंडिया" में अभी बहुत कुछ करना बाक़ी है । विश्व भाषा बनानी है तो विश्व-भ्रमण करना ही पड़ेगा। ******* सत्र प्रारम्भ हो गया। कक्षायें शुरू हो गईं।नया नया पाठ्यक्रम है । अभी प्रशिक्षित अध्यापकों का टोंटा है। एक दो ’मास्साब’ से ही कार्य चलाना है ,कोर्स उठाना है। एक मास्टर साहब वयोवृद्ध हैं ,गांधी टोपी लगाते हैं ,बन्द गले का कोट पहनते हैं।पौराणिक काल के लगते हैं ।कालेज प्रशासन ने उन्हें ’धार्मिक’ पौराणिक एवं ऐतिहासिक फ़िल्में पढ़ाने का दायित्व सौंपा है।सप्ताह में 3 क्लास लेना है ।जब वो धार्मिक फ़िल्म ’सती अनसूईया’ व ’राम वनवास’ आदि पढ़ाते हैं तो भाव-विभोर हो जाते हैं।आंखें बन्द कर तल्लीन हो जाते हैं कि ...कैसे भगवान राम अयोध्या का सिंहासन छोड़...कैसे सीता मईया भगवान राम के साथ..घर ते निकसी रघुबीर बधु ,,..धरि धीर दिए मग में डग द्वै....कि उनकी आंखों से अश्रुधारा बह निकल पड़ती है। गुरु जी की इस ’चक्षु-मूँदन’ क्रिया का उचित लाभ उठा कर कुछ नवयुवक विद्दार्थी क्लास छोड़ ’कैन्टिन-गमन’करने लगते थे ।जब राम जी ’वन-गमन’ से लौटेंगे तो यह भी अपनी क्लास में लौट आयेंगे। परन्तु जो प्रागैतिहासिक व पौराणिक काल की छात्रायें हैं वो बड़े ही मनोयोग व श्रद्धा भाव से सर पर ओढनी रख कर ’सीता-हरण’ का लेक्चर अटेन्ड करती हैं और अपनी अभ्यास पुस्तिका में रह रह कर कुच नोट करती रहती हैं।यद्दपि ऐसे क्लास में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति प्राय: नगण्य ही होती है ।परन्तु जब रोमान्टिक फ़िल्मों का ’उदभव और विकास’ पढ़ाया जाता है तो उपस्थिति आवश्यकता से अधिक सन्तोषजनक रहती है। अध्यापक महोदय भी युवा किस्म के हैं।सलीके से बाल निकाल कर आते हैं। जीन्स पैन्ट व टी-शर्ट पहनते हैं । ’गागल्स’ सर पर रख लेते हैं मस्तिष्क प्रदेश पर। जिस फ़िल्म पर व्याख्यान देना होता है देर रात तक देख कर आते हैं ,फिर सुबह विस्तार से समझाते हैं। प्रेम क्या है ? प्रेम के स्वरूप क्या है?उसके प्रकार क्या हैं? उसकी परिभाषा क्या है? बीच बीच में अपने कथन की पुष्टि हेतु युगल-गीत भी-सस्वर..भाव-भंगिमापूर्ण ।लौकिक ,दैहिक व अलौकिक प्रेम क्या है? अमुक फ़िल्म में प्रेम के त्रिकोण में तीसरा कोण कहाँ था? कुछ जीन्स धारिणी छात्रायें अपना त्रिकोण खोजने लगती थीं। गुरु जी विस्तार से समझाते हैं कि अमुक फ़िल्म में शाहरुख़ ख़ान ने कहाँ लचर ऐक्टिंग की है ।यदि इस फ़िल्म में वो हीरो होते तो वो फ़िल्म बाक्स-आफिस पर यूँ न पिटती। हम पिट जाते वो अलग बात है।प्रेम विषयक फिल्मों पर विशेषत: प्रणय-आलिंगन-चुम्बन जैसे दृश्यों पर इनके गहरी पकड़ है संभवतया गहरा अनुभव भी है।यद्दपि ’समानान्तर -सिनेमा’ का विषय भी इनको पढ़ाना है ,परन्तु इस विषय की न इनको विशेष जानकारी है न ही कोई विशेष अभिरुचि।मुम्बई से गेस्ट फ़ैकेल्टी बुला लिए जायेंगे। बहुत से डाइरेक्टर निठ्ठल्ले खाली बैठे रहते है साल-ओ-साल इस काम के लिए। कुछ ’मास्साब’ तो कक्षा में अभिनय सहित ही प्रवेश करते हैं -गब्बर स्टाईल में । ठक !ठक !! ठक !!! अब छड़ी नहीं बेल्ट निकालत हैं फिर पूछते हैं---" कितने बच्चे हैं आज ?आँय !अरे रमुवा ! कल क्लास छोड़ कर कहाँ भाग गया था ?अयं क्या सोच कर भागा था कि सरदार बहुत खुश होगा???तेरा अटेनडेन्स लगा देगा?? हराम ...... कुछ मास्टर साहब अपने अपने क्लास में आगामी परीक्षा में पूछे जाने वाले संभावित प्रश्नों की तैयारी करवा रहे थे। उदाहरणत: -’मेरा गाँव मेरा देश"-से क्या शिक्षा मिलती है? -राम तेरी गंगा मैली ’ -में गंगा कहां आकर मैली हो जाती है? -’परजानियां ’ फ़िल्म गुजरात में क्यों प्रदर्शित नहीं हो सकी? किन्हीं 2-कारणों पर प्रकाश डालते हुए सविस्तार व्याख्या करें -’जोधा-अकबर-फिल्म पर विवाद के मुख्य विन्दु क्या हैं? सोदाहरण प्रस्तुत करें। -फ़िल्म रिलीज होने के पूर्व विवाद में फंस जाने से क्या क्या फायदे होते हैं ? स्पष्ट करें छात्र -छात्राओं ने सोचा , पाठ्यक्रम की तैयारी करनी है तो नियमित व ध्यान से फिल्म देखना ही पड़ेगा। अंक जो उठाना है । [व्यंग्य अभी जारी है ......] आनन्द पाठक ०९४१३३९५५९२

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