सोमवार, 12 अगस्त 2013

एक व्यंग्य :एक गीत का पोस्ट मार्टम ....[क़िस्त-3 और आखिरी]

[और वह गीत है 1 --2--3--4--5--6--7--8--9--10---11--12] गतांग से आगे --- [पिछले किस्त में आप ने पढ़ा कि कैसे हमारे युवाओं ने अपने पाठ्यक्रम में ’हिन्दी फ़िल्में’का एक ऐच्छिक विषय डलवा लिया और कैसे हमारे कालेज़ों ने इसकी पढ़ाई शुरू कर दिया और परीक्षा की तैयारी करवाई। परीक्षा कक्ष में कैसे हमारे एक युवा परीक्षार्थी परीक्षा दे रहे हैं और उक्त गीत की व्याख्या कर रहे हैं....गाने के बोल के 5-अंक तक तो वह समीक्षा कर चुके हैं .....अब आगे पढ़िए.... एक बात और ,जो पाठक इस व्यंग्य के पिछले अंश के ’पठन सुख’ से वंचित रह गये हों ,वो इसे यहां .....,,,,,........ और छ:? छह के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया गया है कि इस फ़िल्म के हीरो का पराक्रम अदम्य है । वह ’विलेन’ का ’छक्का’ छुड़ा देगा और ’छठी’ का दूध याद दिला देगा।फ़िल्म में ’छक्कों’ की ज़रूरत नहीं ,हम ही काफी हैं। परन्तु आज मैं इस गीत का वास्तविक रहस्य बताता हूँ जो गुरु जी भी न जानते होंगे। जब ’हीरोईन’ अपने मीनाक्षी नयनों से कामदेव के पंच बाण से हीरो के दिल पर कटाक्ष करेगी तो हृदय प्रदेश के ’छह’ टुकड़े हो जायेंगे।यहाँ ’छह’ इसी सन्दर्भ में प्रयुक्त हुआ है। यह अन्य बात है कि अमूमन हर फ़िल्म में ’फिर वही दिल लाया हूं’। यही ’बम्बईया फ़िल्म’ की विशेषता है ,यहीं ’सातवां’ आश्चर्य है...यही.. अरे हाँ ! सातवां पर मुझे याद आया कि इस गाने में ’सात’ का भी बख़ूबी प्रयोग हुआ है ।अज्ञानी पाठक ’सात’ के कई अर्थ ले सकते है ,यथा-सप्त-ऋषि,इन्द्र धनुष के सात रंग,सात पीढ़ियां सप्ताह के सात दिन.सात समुन्दर,सातवां आसमान सात सुर ..। जो धार्मिक पाठक हैं वो सप्त सती सात जनम, सात वचन सात फेरे ..। मगर जो रसिक पाठक हैं वो एक ही सन्दर्भ लें-नायिका के सात यार। पाठक गण कृपया धैर्य रखें और कवि की अंक-गणना को धैर्य से देखें... और ’आठ’? ’आठ’ अंक के प्रयोग से प्रात: स्मरणीय कवि जी ने पंचाग की तरफ़ इंगित किया है जिसमें काल चक्र की गणना आठ प्रहर से होती है -ऐसा कुछ विद्वानों का मानना है।परन्तु मेरा मानना है कि कवि महोदय ने ’आठ’ का प्रयोग इस सन्दर्भ में कदापि न किया होगा।चूँकि इस गीत का सम्बन्ध किसी फ़िल्मी पृष्ठभूमि से है तो इस का उत्तर भी फिल्मी धरातल पर ही खोजना चाहिए। हमें प्रतीत होता है कि हीरो ’आठो’ प्रहर वंशी बजाता होगा और हीरोईन अष्टांग योग से हीरो के इर्द-गिर्द नाचती-गाती होगी।यह शब्द उसी का परिचायक है ,उसी का द्योतक है। जहाँ तक ’नौ’-शब्द का प्रश्न है ,इस पर विद्वानों का मत भेद है। कोई ’नव-ग्रह’ के रूप में देखता है तो कोई ’नव-रस’ में । परन्तु इस गीत में कवि जी चंचला नायिका को सावधान करना चाहते हैं कि हे भोली-भाली अनजान नायिके !इस हीरो के साथ ज़्यादा नाच-गाना ,लप्पो-चप्पो न कर अन्यथा ’नौ’ महीने बाद तू मुंह दिखाने के योग्य न रहेगी..।अब यह नायिका पर निर्भर करता है कि वह इस ’नौ’ अंक को किस सन्दर्भ में लेती है। पाठक गण कृपया धैर्य बनाये रखें ’दस’ शब्द का प्रयोग कवि ने बड़ी चतुराई से किया है -साँप मरे,ना लाठी टूटे। इस ’दस’ शब्द के आप कई अर्थ निकाल सकते है जिसे हम ’श्लेष’ अलंकार कह सकते हैं।प्राय:हमने देखा है कि कुछ विद्यार्थियों को ’श्लेष’ और ’यमक’ में भ्रम की स्थिति बनी रहती है इसीलिए हमारे व्याकरणाचार्यों ने ’भ्रम-अलंकार’ की एक अलग श्रेणी दे दी है। यमक अलंकार में जब एक ही शब्द, दो बार.... अरे ! मैं विषय वस्तु से भटक रहा हूं।परीक्षक महोदय कृपया ध्यान न लें।हाँ तो ’दस’ शब्द का व्यापक विश्लेषण प्रस्तुत कर रहा था । इस शब्द के एक अर्थ में कवि महोदय ने निर्माता जी को यह चेतावनी देने का प्रयास किया है कि यदि इस गीत का पारिश्रमिक नहीं मिला तो आप की फ़िल्म का ’दसवां’ भी हो सकता है । दूसरा अर्थ यह कि भविष्य में अगर किसी फ़िल्म मे वो या उसका बेटा जमाई राजा बना तो ’कन्या राशि स्थितौ, जामाता दशमो ग्रह" तो फिर नौ ग्रह भी आप को नहीं बचा सकते.. और ’ग्यारा’ बारा’ तेरा’...??? परीक्षक महोदय के ज्ञान वर्धनार्थ यह बताना यहाँ उचित होगा कि मूल शब्द ’ग्यारह’ बारह ’तेरह’ है मगर कवि जी को छन्द विन्यास व मात्रा अनुशासन वश ’ग्यारा ..बारा..तेरा.. लिखना पड़ा क्योंकि अगली पंक्ति में उसे ’तेरा करूं गिन गिन के मैं..इन्तज़ार ’-भी लिखना है। अत: छान्दिक विधान से त्रुटि नहीं मानी जायेगी और भाव पक्ष में कोई अन्तर नहीं पड़ता। ’ग्यारा’[ग्यारह] शब्द से कवि ने हीरोईन को यह समझाने की प्रयास किया है किहे! मुक्त हासिनी ,सुमुखी कन्या ! यदि तुझे यह हीरो ’वर’ रूप में पसन्द है और प्राप्त करना है तो फिर तू भी ’ग्यारह निर्जला एकादशी’ व्रत रख ,अभीष्ट फल मिलेगा। व्रत पुस्तिका मिलने का पता-ठाकुर प्रसाद एन्ड सन्स,कचौड़ी गली ,वाराणसी -एकादश व्रत महात्म्य । और ’बारह’ शब्द की अपनी महिमा है [महिमा चौधरी नहीं]जिसे हर हिन्दू परायण धार्मिक जन-मानस जानता है।’बारह जातक कर्म से लेकर ’बारह खड़ी ’तक।बारह राशियों से लेकर बारह महीनों तक। परन्तु हे नायिके ! इस बारह महीने में सावन का महीना बड़ा ही कष्ट दायक होता है । इस महीने में जितनी ही वर्षा होती है उतनी ही नायिका के बदन में आग लगती जाती है -’ ’सावन में लग गई आग दिल मेरा...’ जलने की संभावना बढ़ जाती है---संयम से काम लेना चाहिए .अन्यथा... और ’तेरा’ "? इस पूरे गीत में बस इसी एक शब्द का सम्यक प्रयोग हुआ है।पाठकगण इसे ’तेरह’ समझने की भूल न करें, वरना हो सकता है कि कवि जी मेरे पुतले की ’तेरहवी’ करा दें । आखिर ’चेला’ और पुतला बनाने में कितना समय लगता है । इस अमर गीत की विशद व्याख्या तो मैं अभी और भी कर सकता हूँ ,परन्तु पाठकों का धैर्य अभाव व परीक्षा में समय अभाव को देखते हुए इस प्रश्नोत्तर का उप-संहार कर रहा हूं.. ऽऽऽऽऽऽ %%%%%% ******* पाठकों की जानकारी हेतु ,उक्त परीक्षा में ’पप्पू’-यानी कि मैं उत्तम अंकों से उत्तीर्ण हो गया । कई वर्ष बाद किसी परीक्षक नें मुक्त कंठ से मेरी प्रशंसा की थी तथा मुक्त हस्त से अंक प्रदान किए थे। मेरा उत्तर पढ कर परीक्षक ने लिखा था-"परीक्षार्थी ,परीक्षक से ज़्यादा ज्ञानी है जो अर्थ हीन व बकवास गीतों का भी इतना विशद ,व्यापक और सार्थक व्याख्या कर सकता है । भविष्य में ,परीक्षार्थी में ’फ़िल्म -समीक्षक’ बनने की पूरी पूरी संभावना व्याप्त है जो बिना विषय और अर्थ हीन फ़िल्मों की समीक्षा में 5-10 पन्नें रंग सकता है।परीक्षार्थी को ’व्यंग्यकार’ बनने की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता है-आवश्यकता है तो उसे उचित प्रशिक्षण की, सम्यक संरक्षण की, सही वातावरण की...। इस टिप्पणी से मैं गदगद हो गया-’कलम आज उनकी जय बोल’ - ।आज भी ऐसे पारखी है जिन्हें कंकड़ में हीरे की पहचान है।बाद में ज्ञात हुआ कि उक्त परीक्षक महोदय ने पूरा उत्तर न पढ़ कर मात्र पन्ने गिन गिन कर अंक प्रदान किए थे । 5-पन्ने ,5-अंक। गुरु जी ने सत्य वचन कहा था कि बेटा...। अब मैं द्वितीय प्रश्न-पत्र की तैयारी में जुट गया । प्रश्न था-- - ’सरकाय लो खटिया जाड़ा लगे ...जाड़े में सजना.. अथवा बीड़ी जलाय ले जिगर से पिया ...जिगर मा बड़ी आग है. गीत का सामाजिक प्रभाव व हिन्दी गीत की नवगीत दशा व दिशा का सजीव [साभिनय नहीं] वर्णन करें -अस्तु -आनन्द.पाठक 09413395592 -