रविवार, 25 मई 2014

एक व्यंग्य : चिरौंजी लाल कहिन......[क़िस्त-1]


चिरौंजी लाल कहिन........

"शादी तो जनाब हमारे ज़माने में हुआ करती थी । आजकल जैसा नहीं कि बस चट मँगनी और पट विवाह ,झटपट तलाक। शाम ढले बारात गई और रात रहे वापस"- आते ही आते गुस्से से भरे चिरौंजी लाल ने कहा
-" आज सुबह ही सुबह किधर से आ रहे हैं ?"-मैने जिज्ञासा प्रगट की
" अरे जनाब ! मत पूछिए। भिखमंगे हैं सब भिखमंगे। कहते थे कलकत्ता में बिजनेस है,मुम्बई में बिजनेस है। सुबह होने से पहले ही हाथ जोड़ लिए।न नाश्ता .न पानी। विदाई कर दी...ढोल के पोल है सब...। यह भी कोई शादी हुई ? आप ही बताइए।"
मैं उनकी मुखाकॄति व आक्रोश भाव से समझ गया कि आज फिए किसी बारात से सीधे आ रहे हैं और वहाँ उनकी सेवा भाव में कुछ कमी रह गई होगी।
"अरे कोई बात नहीं ,हम आप को नाश्ता-पानी करा देते हैं’- मैने तो यह बात मित्र-धर्म भाव से कही थी परन्तु श्रीमती जी सचमुच नाश्ता-पानी की व्यवस्था करने चली गईं\चिरौंजी लाल जी सद्य: अनुभवित शादी वृतान्त क्रम जारी रखे रहे।
"....जनाब शादियाँ तो हमारे ज़माने में हुआ करती थीं। क्या शादियाँ हुआ करती थीं।साल भर से बात चला करती थी।जाति परखी जाती थी ,परिवार परखा जाता था,खानदान परखा जाता था खून परखा जाता था।अब आप समझिए कि उस ज़माने में लड़्का-लड़की की शादी नहीं हुआ करती थी ’मूछों’ की शादी होती थी । गाँव की इज़्ज़त का सवाल होता था। गाँव की मूछ नीची नहीं होनी चाहिए।बाबू साहब की मूँछ नीची हो गई तो पूरे गाँव की मूछ नीची हो जायेगी।चिरौंजी लाल जो कहिन सो कहिन..।

और अब?

-"अब तो लोगो ने मूछें ही रखना ही छोड़ दिया।क्लीन शेव हो गये सब के सब...."
चिरौंजी लाल अपना दुख दर्द सुनाते रहे और बीच बीच में मैं हाँ हूँ करता रहा, उनको यह प्रतीत न हो कि मैं उनका कथा-पुराण नहीं सुन रहा हूँ।उनका आख्यान जारी रहा।

"....कितने शान से हम लोग कहा करते थे फ़लाना गाँव में हमारी बेटी व्याही हुई है।हमारी बेटी ,माने सारे गाँव की बेटी। पूरा गाँव घराती हो जाता था।चिरौंजी लाल जो कहिन सो कहिन ...। और अब...?अब तो समझिए जनाब कि....अखबार में विज्ञापन देकर शादी कर रहे हैं...जैसे एवरेस्ट मसाले...अशोक मसाले...बेंच रहें हो...."
चिरौंजी लाल जी अभी और कुछ ’पुराने ज़माने’ ’नये ज़माने’ की तकनीकी पहलुओं का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते और बीच बीच में ’कहिन सो कहिन’ करते-मैनें बीच ही में बात काटना उचित समझा। बिल्कुल वाल्मीकि जी की तरह स्वत: एक श्लोक अकस्मात प्रस्फुटित हो गया-

पुराणमित्येव न साधु सर्वम् ,न चापि सर्वम नवेति अवद्यम्
सन्त: हृदयात् अन्त: परिक्ष्यते ,मूढ: परिप्रत्यनेव  बुद्धि
अर्थात हे चिरौंजी लाल! यह परम्परा पुरानी है इसलिए सब कुछ अच्छा है और यह परम्परा नई है इसलिए अच्छा नहीं है- ऐसी बात नहीं है। श्रेष्ठ जन किसी भी चीज़ को पहले हृदय से विचार करते हैं जब कि मूढ़ लोग तुरन्त मान लेते हैं
मेरे इस अक्स्मात व अप्रत्याशित श्लोक वाचन से चिरौंजी लाल जी का मुँह खुला का खुला रह गया जैसे लालू जी ने ’जूलियस सीज़र’ का कोई संवाद बोल दिया हो।चेतनावस्था में आते ही उन्होने अपनी शंका प्रस्तुत की-" तो जनाब ! पूर्व जनम में  आप संस्कृताचार्य थे?"
 " अरे नहीं भाई !जैसे पूर्व जनम में आप नारद नहीं थे’-मैने कहा
फिर हम दोनों सद्य: नेवेदित परस्पर विशेषणों पर हँसने लगे कि इसी अन्तराल में श्रीमती जी ने नाश्ता प्रस्तुत किया

ऽऽऽऽ          -----   ..............

चिरौंजी लाल कोई काम करते हो या न करते हों ,परन्तु एक काम बड़े मनोयोग और ईमानदारी से करते हैं-और वो काम है हर किसी की शादी में शामिल होना। मुहल्ले में किसी की शादी हो और चिरौंजी लाल जी शामिल न हों-हो नही सकता।
दुनिया इसे उनका आत्मसुख मानती है पर वो इसे पुनीत कार्य में अपना ’योगदान’ मानते हैं।यदा-कदा अपने इस योगदान में उन्हें ख़तरा भी उठाना पड़ जाता है विशेषत: तब जब ’वर-पक्ष’ और ’कन्या-पक्ष’ किसी बात पर वास्तविक रूप से भिड़ जाते हैं। और इनके पक्ष वाले इन्हें अग्रिम मोर्चे पर किसी सैनिक की तरह खड़ा कर देते हैं और एकाध डंडा ये भी खा लेते हैं। ऎसे लोग महान होते है,हानि-लाभ से परे होते हैं,यश-अपयश से ऊपर होते हैं,हास-परिहास से मुक्त होते हैं। निन्दा-स्तुति से निर्विकार होते हैं। इनके इन्हीं गुण विशेष और विशेषत: इनके इसी योद्धापन से प्रभावित होकर, मुहल्ले वाले शादी का प्रथम निमन्त्रण पत्र इन्हें अवश्य भेंजते हैं।
चिरौंजी लाल जब किसी बारात से लौट कर आते हैं तो किसी विजयी योद्धा की तरह सप्ताह पर्यन्त आद्योपान्त सजीव वर्णन करते हैं । द्वार पूजा से लेकर विदाई तक।कैसे नत्थू भाई ने गोली चलाई कि घोड़ी भड़क गई।कैसे घोड़ी ने दुलत्ती मारी कि दुल्हे भाई जमीन पर आ गिरे।कैसे लड़की वालों ने मितव्ययिता का परिचय दिया कि एक ही कुल्हड़ में मिठाई और नमकीन रख दी । नाश्ता कर लेना और उसी कुल्हड़ से पानी पी लेना। कैसे हम बारातियों ने लड़की के बाप के पसीने छुड़ा दिये कि अन्त में पानी माँगने लगा।कैसे लड़के ने ’खिचड़ी’ नहीं खाई तो लड़की के बाप ने पैर पर ’पगड़ी’ रख दी। मुहल्ले वाले बड़े चाव से सुनते थे ऐसे क़िस्से।सम्भवत: वो भूल जाते थे कि उनके भी घर में कोई लड़की है जिसकी शादी में ऐसा ही कोई चिरौंजी लाल आयेगा।......

[....जारी है....]

-आनन्द.पाठक
09413395592



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