सोमवार, 26 मई 2014

एक व्यंग्य : चिरौंजी लाल कहिन ....[भाग-2]

[...........पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि किसी वैवाहिक कार्यक्रम से लौटने के पश्चात मुहल्ले वालों के सामने कैसे अपनी ’वीरता’ का बखान करते है ...कैसे उन्होने लड़की के बाप को पानी पिला दिया....अब आगे पढ़िए...] 

लेकिन उससे ज़्यादा रोचक प्रसंग वह तब सुनाते थे जब किसी शादी में वास्तविक लड़ाई हो जाती थी और ’वर-पक्ष’ और ’कन्या-पक्ष’ सशरीर भिड़ जाते थे।तब चिरौंजी लाल जी बराती न होकर ’योद्धा’ बन जाते थे। फिर ’लोहा सिंह’ के नाटक की तरह वर्णन करते थे--"....जब मैं काबुल के मोर्चे पर था ...खदेरन का मदर...तब दुश्मन की फ़ौज़ को...। कैसे हलवाई की भट्टी से एक जलता हुआ चैला निकाला ...कि सारे लड़की वाले भाग खड़े हुए"। इनकी अपनी वर्णन शैली है और इनका अपना इतिहास है।

चिरौंजी लाल का वास्तविक नाम ’चिरंजीव लाल ’ है ।उनके माता-पिता ने कितना सोच कर इतना अच्छा नाम रखा था। मगर वो जब से शहर में आ कर बसे है कि चिरंजीव लाल से ’चिरंजी लाल’ हो गए औए कालान्तर में भाषा-विज्ञान के श्राप से ’चिरौंजी लाल ’ हो गए। शहरवालों की यह अपनी नामकरण शैली है-जैसे गाँव का ’लालू’ शहर में आकर ’लल्लू’ और फिर ’ललुवा’ हो जाता है। जैसे पहले यहाँ का श्रमिक मारीशस सूरीनाम में पहले ’एग्रीमेन्ट-लेबर’ फिर ’एग्रेमेन्टिया लेबर ’ और अन्त मे ’गिरमिटिया लेबर’ हो जाता था। भाषा-विज्ञान में इसे मुख-सुख कहते हैं।

चिरौंजी लाल अपना कोई काम करें न करें परन्तु दूसरों का काम करने हेतु सर्वदा तत्पर रहते हैं।किसी का कोई कचहरी का काम हो,आफ़िस पोस्ट-आफ़िस का काम हो,स्कूल-अस्पताल का काम हो ,हमेशा आप के साथ खड़े मिलेंगे। परन्तु थाना-पुलिस के कार्यों से क्यों दूर रहते हैं आज तक रहस्य बना हुआ है।उनके इन्ही गुण-विशेष से उन्हें कभी भी चाय-पानी की दिक्कत नहीं हुई।जहां बैठ गए ,वहीं महफ़िल।मुद्दों की कोई कमी नहीं।बिना मुद्दे के वह घंटों गुज़ार सकते हैं किसी सिद्ध नेता की तरह। आवश्यकता है तो बस छेड़ने की।फिर क्या!
अख़बार का पुलिंदा दबाए चिरौंजी लाल जी सुबह ही सुबह पधारे
"...कैसे कैसे हो गए हैं आजकल लोग ,दहेज के नाम पर...हर लड़के का बाप लगता है कि भूखा-नंगा खड़ा है...कैसे नोच लें लड़की के बाप को...?"
मैं समझ गया आज फिर कोई लड़की फाँसी चढ़ गई । चिरौंजी लाल जी जारी रहे...
"....अरे जनाब ! दहेज तो हमारे ज़माने में लोग माँगा  करते थे -देने वाला खुश.लेने वाला खुश।चिरौंजी लाल कहिन सो कहिन।जनाब एक बार एक बारात में गए थे हम,।...वर-पक्ष और कन्या-पक्ष में पहले से ही सब कुछ तय हो गया था। लड़की के पिता अच्छे गृहस्थ थे,अच्छी खेती बारी थी । बारात गई ,द्वार-पूजा हुई ,स्वागत भाव हुआ ,जलपान हुआ।मंगलाचरण के समय लड़के के पिता [समधी] की दृष्टि खूंटे पर बँधी एक गाय पर पड़ गई।समधी जी का मन विचलित हो गया।कैसे यह गाय माँगी जाय। लेन-देन तय होते समय यह ’गाय’ सूची में तो नहीं थी । अब इसे कैसे जोड़ा जाय।अब उन्हें द्वार-पूजा,पाँव-पूजा मंगला चरण विधि-विधान से कोई लगाव नहीं रह गया । यह सब तो पंडितों का काम है वो तो कर ही रहे हैं ।हमें तो ’गाय’ लेनी है ,जुगत भिड़ानी है।लड़के के बाप जो ठहरे।
द्वार-पूजा कार्यक्रम के पश्चात ,बारात वर ठहराव स्थल [जनवास] वापस भी आ गई।मगर समधी जी का मन वहीं द्वार पर बँधी ’गाय’ में अटक गया।विवाह के अगले कार्यक्रम की तैयारी होने लगी मगर समधी जी उधेड़ बुन में लग गए।कन्या-पक्ष से ’वर-मेटी’[आज्ञा] माँगने का संदेश आया। अचानक समधी जी का दिव्य-ज्ञान जग गया-यही अवसर है बदले में गाय माँगने का।अत: उन्होने नि:संकोच अपनी माँग रख दी।इस अकस्मात और असामयिक माँग से कन्या-पक्ष ’भौचक’ हो गया और उस के बाद ’भौं’..भौं..चक..चक शुरु हो गया}अब कन्या-पक्ष ने अपनी असमर्थता व्यक्त की। दोनों पक्षों में हुज्जत शुरु हो गई। दोनो समधी ’मुख-सुख’ पर उतर आये।’आप ने मुझे क्या दिया....आप ने मुझे कहाँ का छोड़ा...अरे अपनी भी इज्जत है 10 गाँव में.......तो हम क्या भिखमंगे नज़र आते हैं ..हम लड़के के बाप है ..लड़के के....

विवाद निरन्तर बढ़ती ही जा रहा था । चिरौंजी लाल का ’योद्धापन’ करवटें बदलने लगा। उन्होने ’शिरस्त्राण’ और ’कवच’ पहना शुरु कर दिया न जाने कब इसकी आवश्यकता पड़ जाय।इसी वाद-विवाद के मध्य कन्या-पक्ष के किसी योद्धा ने ललकारा-"...अरे नहीं देता है मेटी तो छीन लो इस समधी के बच्चे से"
इस ललकार पर समधी जी सावधान हो गये।सचमुच अगर यह मेटी छिन जायेगी तो गाय नहीं मिल पायेगी। इस से पहले कि सचमुच कोई योद्धा आकर पॄथ्वीराज की तरह मेरी ’मेटी’ का अपहरण कर ले,समधी जी स्वयं मेटी लेकर पलायन कर गए। आगे आगे  समधी जी ,पीछे पीछे कन्या पक्ष।अनिवर्चनीय दॄश्य। इससे पहले कि वह पकड़े जाते,समधी जी मेटी लेकर पेड़ पर चढ़ गए।कन्या-पक्ष ठिठक कर पेड़ के नीचे खड़ा हो गया बिल्कुल उस कहानी की तरह जिसमें एक कौआ था ,उसकी चोंच मे वर की मेटी थी और नीचे कई लोमड़ियाँ खड़ी थीं।.........

[.....जारी है.....]

-आनन्द.पाठक
09413395592
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वर की मेटी : पूर्वांचल में हिन्दुओं का एक वैवाहिक कार्यक्रम जिसमे वर-पक्ष द्वारा लाये गये जल से प्रतीक के तौर पर कन्या स्नान करती है ।इसके बाद ही अन्य वैवाहिक कार्यक्रम आगे बढ़ता है ।[ हो सकता है प्रदेश के अन्य भागों में इसी का कोई और स्वरूप प्रचलित हो]
मेटी :जो आधुनिक काल के पाठक है वो इसे Earthen Pot  [मिट्टी का बर्तन]समझ लें और जो पुरातन काल के पाठक हैं वो इसे ..छोण...कुण्डा..ठिल्ला..ठिल्ली...गगरा..गगरी...झंझड़ ...सुराही जाति का तथा हंडिया...पतुकी...कहँतरी प्रजाति का ्संभवत:सबसे छोटा सदस्य समझ लें" । "टुईंया" इस श्रेणी में नहीं आयेगा



1 टिप्पणी:

dr.mahendrag ने कहा…

सुन्दर ,लिखते रहिये