गुरुवार, 29 मई 2014

एक व्यंग्य : चिरौंजी लाल कहिन ...[भाग-3 एवं अन्तिम भाग]

[....पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि कैसे लड़के के पिता [समधी जी] वर की मेटी लेकर पेड़ पर चढ़ गए और कैसे कन्या पक्ष की कई लोमड़ियाँ पेड़ के नीचे बैठ गईं, बिलकुल उस कहानी की तरह जिसमे एक कौआ मुँह में रोटी दबाये.....और नीचे एक लोमड़ी स्तुतिगान करती हुई.....}
  
गतांक से आगे [भाग-3]

मान मनौव्वल अनुग्रह-मनुहार शुरु हो गया । समधी जी की वीरता महानता का बखान शुरु हो गया।लोग उनके पराक्रम के क़सीदे पढ़ने लगे, तो कुछ लोग स्तुति वाचन करने लगे।कुछ लोग पुराने रिश्तों की दुहाई देने लगे तो कुछ लोग उनकी वंश परम्परा का इतिहास बताने लगे। इन सबका असर न उन पर पड़ना था, न पड़ा।चिरौंजी लाल ने कहा -’कन्या के पिता को गाय दे देनी चाहिए ,अरे वर के पिता ने ’गऊ माता’ की इच्छा ही तो प्रगट की है ,कोई सोना-चाँदी तो नहीं माँगा है। आख़िर लड़के का बाप है ।उसका भी कुछ हक़ बनता है कि नहीं?"। बारातियों में से 2-4 लोगों ने समवेत स्वर से समर्थन किया।
अन्त में पण्डित जी ने संदेश भिजवाया-" जजमान शीघ्रता करें ,मुहुर्त निकला जा रहा है।अन्ततोगत्वा ,कन्या के पिता ने समधी जी से कहा-"आप के लड़के के लिए अपनी बछिया तो दे ही रहा हूँ महराज, आप के लिए गाय की बछिया दे दूँगा । अब तो नीचे उतर आइए।"
दोनों समधी अपनी लेन-देन की क्षमता पर आत्म-मुग्ध हुए। फिर शादी का कार्यक्रम आगे बढ़ा।समधी जी ने भी दान की बछिया के दाँत नहीं गिने। यह अन्य बात है कि कालान्तर में वह बछिया ’बाँझ’ निकली।
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आज चिरौंजी लाल के हाथ में कोई अख़बार तो नहीं था ,मगर माथे पर चिन्ता की रेखा अवश्य थी। चेहरे पर कुछ सकुचाहट का भाव था जैसे वो कुछ पूछना चाहते हैं ,मगर पूछ नहीं पा रहे हों।अन्तत: उन्होने पूछ ही लिया
" किब्ला, ये इन्टर्नेट चैटिंग क्या बला होती है?"
" जब हम-आप टाइम पास करते हैं तो ’गलाचार’ कहते हैं और जब कम्प्युटर के माध्यम से लड़का-लड़की आपस में बात करते हैं तो ’इन्टर्नेट-चैटिंग’ कहते हैं। मगर आप को क्या आन पड़ी?"
-’सुना है फ़िरंगी लाल का बेटा इन्टरनेट चैटिंग से शादी कर रहा है। चैटिंग से शादी कैसे होती होगी? इसमें बारात में जाने का अवसर मिलता है क्या?"-चिरौंजी लाल ने अपना दर्द बताया
अब मैं पूरा मामला समझ गया।चिरौंजी लाल जी की चिन्ता का कारण-बारात सुख से वंचित- भी समझ गया। फिर मैने उन्हे विस्तार से समझाया कि कैसे लड़का-लड़की इंटरनेट से बातें करते हैं ,फिर एक दूसरे को समझते-बूझते हैं ,मिलते-जुलते हैं फिर शादी करते है। कभी कभी ’चैटिंग’ में ’चीटिंग’[धोखा] भी हो जाती है।
अभी मैं उन्हे समझा ही रहा था कि चिरौंजी लाल बीच में ही बोल उठे-’राम राम राम ! कईसा घोर कलियुग आ गया है ।जनाब! शादी से पहले मिलना-जुलना??"
-"हाँ ,तो क्या हुआ?"
-" आप कहते हैं कि क्या हुआ? अरे! कहिये कि क्या नहीं हुआ?’शादी से पहले मिलना-जुलना? तो बचा ही क्या?’चैटिंग से शादी? न खून का पता,न ख़ानदान का पता -चिरौंजी लाल कहिन सो कहिन
न अगुआ ,न पंडित ,न नाऊ
इन्टर्नेटी  शादी  देन हाऊ ?
[अगुआ : वो व्यक्ति जो दोनो पक्षों के बीच शादी और बातचीत लेन देन तय कराने में आगे रहता है और झगड़ा होने पर भाग जाता है फिर दोनो पक्ष उसे मिल कर खोजने लगते हैं]

’वाह वाह क्या मिसरा पढ़ा है ....सुभानाल्लाह सुभानाल्लाह..’-मैने दाद दिया उन्होने सर झुका लिया।
"अरे ! शादी तो जनाब हमारे ज़माने में हुआ करती थी ...शादी से पहले मिलना जुलना तो दूर.....लड़का लड़की एक दूसरे को देख भी नहीं सकते थे।
एक बार एक लड़के ने शादी से ठीक 2 दिन पहले लड़की देखने की इच्छा प्रगट की----जानते हैं लड़की के बाप ने क्या कहा? कहा-अगुआ जी !अगर यह लड़का मेरा होने वाला दामाद न होता न तो देता कान के नीचे दो...आज उसी लड़के का लड़का इंटरनेट से शादी कर रहा है...राम राम राम क्या घोर कलियुग आ गया है !"
" आप तो इन्हीं दकियानूसी विचारों के कारण अब तक यहीं बैठे रह गए।आगे नहीं बढ़ पाए "-मैने छेड़ा
’जनाब ! हम तो शादी कर के बैठे हैं ,वो तो तलाक़ दे के बैठे हैं"-चिरौंजी लाल जी ने रहस्य समझाया
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"दहेज के नाम पर लड़की ने बारात वापस कर दी ...कानपुर देहात..लड़के के पिता ने..." -चिरौंजी लाल जी ने आते ही आते मेरे सामने अख़बार पटक दिया। मैं समझ गया अब यह ’हिज मास्टर वायस’ की तरह पूरा रिकार्ड बजा कर ही दम लेगा।
-"...लड़की ने बारात वापस कर दी...? चिरौंजी लाल जी शुरु हो गए-"..राम राम राम ,क्या ज़माना आ गया।अरे बारात तो हमारे ज़माने में वापस हुआ करती थी।" न भूतो,न भविष्यत’। ऐसी घटनायें ,सैकड़ों में एक होती हैं। भृगु क्षेत्र बलिया गया था । कन्या पक्ष से आमन्त्रित था। बारात काशी क्षेत्र से कहीं से आई थी।लेन-देन में क्या तय हुआ था यह पता न चलता अगर उस रात झगड़ा न हुआ होता ।बारात सही समय पर पहुँची,द्वारपूजा हुआ ,मंगलाचरण हुआ। पता नहीं किस बात पर उन्नीस-बीस हो गई।
दोनों समधी एक ही व्यवसाय के थे ,समान मेधा स्तर के थे।दोनों ही पैसे को दाँत से पकड़ते थे। दोनों की मान्यता थी जो पैसा जेब से न निकले ,वही आमदनी है ,वही कमाई है।दोनों अपने को मितव्ययी कहते थे पर दुनिया उन्हे ’कंजूस’ कहती थी।कन्या के पिता को लगा कि जो स्वर्ण-हार वर पक्ष को चढ़ाना था वह किधर है? तो वर के पिता को लगा कि जो धनराशि लेन-देन में तय हुआ था वो किधर है? दोनो पक्ष अविश्वास के वातावरण से ग्रसित हो गये। फिर दोनों पक्षों के लोगों ने अपने अपने पक्ष को हवा देना शुरु कर दिया । अविश्वास का बादल घनीभूत होने लगा।
दोनों लोग पुनर्संशोधित  ’लेन-देन’ पर बहस कर ही रहे थे कि ’तम्बू-कनात’ वाले को कुछ शंका हो गई।इस पानीपत की लड़ाई में उसे अपना पैसा डूबता नज़र आया।तम्बू लगाया तो था लड़के वालों के लिए पर सट्टा[Agreement] किया था लड़की वालों ने। बारात वापस चली गई तो पैसा किस से वसूलेगा? लड़के वाले फिर कहाँ मिलेंगे?यही सुनिश्चित करने के लिए उस ने अपने बिल के भुगतान हेतु ’वर के पिता के समक्ष प्रस्तुत किया।वर के पिता भड़क उठे। डाँटते हुए भगा दिया -" हमसे क्यों माँगता है? जा उन से माँग जिस ने तुम से सट्टा किया है। इस अप्रत्याशित उत्तर से तम्बू वाला सकपका गया।
वर पिता यह रहस्य जानते थे कि सट्टा तो कन्या के पिता के नाम है। हम क्यों भरें? वही भरें ,वही भुगतें। जो ही 3000/- 4000/- की बचत होगी।ऊर्जा की बचत-ऊर्जा की कमाई।तम्बू वाला अब कन्या के पिता के पास गया।अपनी व्यथा कथा सुनाई।अब कन्या के पिता श्री के भड़कने की बारी थी ।
’क्या कहा?सट्टा हमने किया है ? लड़के वाले ने ऐसा कहा?अरे वो तो हमने उनके कहने पर उनकी तरफ़ से मदद के तौर पर तम्बू-कनात की व्यवस्था करा दी वरना लाते अपने यहाँ से।भलाई का ज़माना ही नहीं रहा ।अब कहते हैं कि पैसा नहीं देंगे। यह तो धोखाधड़ी है , विश्वासघात है । हे राम ! क्या ज़माना आ गया!आदमी का आदमी पर भरोसा करना मुश्किल हो गया...."
’मालिक हमारा हिसाब हो जाता तो ..."-तम्बू वाले ने गुहार लगाई
"अरे ! ठहर तो ज़रा ,क्या शोर मचाता है ...ज़रा फेरे तो पूरे होने दे ..हम कौन से भागे जा रहे हैं ...कि तू मरे जा रहा है ?"
 सिन्दूरदान हो गया।फेरे भी पूरे हो गये।कन्या के पिता ने तम्बू वाले को बुलाया-" ला अपना बिल ...ले अपना हिसाब। कहते हैं सट्टा मेरे नाम से है ...तो जा उखाड़ दे तम्बू ...’-कन्या के पिताश्री ने आदेश दिया।
उधर वरपक्ष तम्बू में बैठ कर अगली रणनीति पर गहन विचार कर रहा था कि तम्बू वाले ने सचमुच तम्बू उखाड़ना शुरु कर दिया । इस अप्रत्याशित ’तम्बू उखाड़न प्रक्रिया’ से  वरपक्ष भौचक रह गया। अब कौन सी रणनीति बनेगी ? युद्ध में जो पहले प्रहार कर दे वो विजयी।अब खुले आसमान के नीचे बारात पड़ी रहे ये तो सरासर अपमान है। अरे भाई ,हम लड़के वाले हैं ,कोई उठाईगीर नहीं । वर पक्ष के सिपहसालारों ने सलाह दी-" अरे तम्बू उनका है तो क्या रेलवे प्लेटफ़ार्म तो उनका नहीं । अब अगली रणनीति हम वहीं बैठ कर बनायेंगे।
आधी रात को पूरी की पूरी की बारात रेलवे प्लेटफ़ार्म पर आ गई- चिरौंजी लाल ने बताया
"नहीं ,पूरी बारात तम्बू उखड़ने के पहले ही प्लेटफ़ार्म पर आ गई थी"- मैने संशोधन प्रस्तुत किया
"अरे! आप को कैसे मालूम? घटना तो 30 साल पुरानी है"- चिरौंजी लाल विस्मित हो गए
" क्योंकि उस शादी की रात मौर पहने खाली पेट प्लेटफ़ार्म पर मैं ही सोया था"
" अजी छोड़िए भी ,क्या एक ही बात को फेंट रहे है 30-साल से"--श्रीमती जी ने सकुचाते हुए कहा और नाश्ता रख कर भीतर चलीं गईं

अस्तु      
-आनन्द.पाठक
09413395592

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