मंगलवार, 27 जनवरी 2015

एक लघुकथा-04 : अपना अपना मूल्य


   ----- नवोदित लेखक ने बड़ी मेहनत से अपना "काव्य-संग्रह’ प्रकाशित करवा कर प्रथम प्रति  एक तथाकथित स्वनामधन्य "साहित्यकार" को बड़े आदर और श्रद्धा से विनम्र होते हुए भेंट किया और लिखा-" मेरे प्रेरणास्रोत ! मान्यवर श्रद्धेय साहित्यशिरोमणि वरिष्ठ आदरास्पद "....अमुक जी" को  पारस स्पर्श हेतु एक तुच्छ सप्रेम भेंट....." ---एक अकिंचन

 फिर वह नवोदित लेखक बड़े गर्व से अपने साहित्यिक मित्रो ,यहाँ वहाँ मंच पर, फेसबुक पर ,-कि "अमुक जी" ने मुझे अपने आशीर्वचन दिये ,आशीर्वाद दिया ,मुझे अपना बेटा कहा--धन्य हो गया ..."बताते हुए फिर रहा है

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.....कुछ दिनों बाद ,"अमुक जी; ने 125/- का एक मनीआर्डर उस नवोदित लेखक के नाम भेंज दिया।
अपना मूल्य और किताब का मूल्य मिला कर।

आनन्द.पाठक
09413395592

1 टिप्पणी:

इंतज़ार ने कहा…

अब एक हीरे को तो सिर्फ़ जोहरी ही पहचान सकता है ....दुनिया का क्या है ...और अगर अमुक जी खुश हैं तो हैं....