शुक्रवार, 28 जुलाई 2017

एक व्यंग्य :---अन्तरात्मा की आवाज़

एक व्यंग्य = -----अन्तरात्मा की आवाज़

---आत्मा----जीवात्मा----परमात्मा-----अन्तरात्मा------खात्मा
इन सबमें क्या ’कामन’ है।---तमा--
--तम्मा...तमा..लोगे---तमा
---तमा ...तमा --लोगे----सारा जहाँ है निकम्मा---
अरे! यह तो फ़िल्मी गाना है--।
हाँ तो क्या हुआ ?
’इसी अन्तरात्मा की --तमा --तमा---  की आवाज़ पर तो सारा राजनीतिक फ़िल्मी  ड्रामा होता है } और फिर -"सारा जहाँ है  निकम्मा’ बताया जाता है।
इस ’अन्तरात्मा की आवाज़" का  प्रथम प्रयोग और उपयोग सबसे पहले मैनें किया था जब मैं इन्टरमीडियेट क्लास में था।अगर मेरे इस कथन पे किसी को सन्देह हो तो शोध कर सकता है और हिन्दी में ’डाक्ट्रेट’ की उपाधि ले सकता है ।यूँ भी हिन्दी में पी0एच0डी0  करने के लिए कम ही विषय क्षेत्र रह गये हैं ।

बात उन दिनों की है जब मैं इन्टेर्मीडियेट में हिन्दी विषय की परीक्षा दे रहा था । उसमें एक प्रश्न रहस्यवाद या छायावाद से संबन्धित था। साधारणतया मैं हिन्दी में ’वाद’ विवाद; से दूर ही रहता हूँ ,न जाने किधर कोई ’निषाद’  बैठा हो और एक तीर मार कर चल दे ।अत: ये दोनो ’वाद’  मुझे न  उस समय  समझ में आया न अब।। उत्तर में क्या लिखता? राजनीति में  नेता जी को जब जनता के किसी प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता तो ’अन्तरात्मा की आवाज़’ निकलती है। परीक्षा कक्ष में मेरी भी निकली और लिख दिया---" हे परीक्षक महोदय ! आप मुझे अपनी ’अन्तरात्मा की आवाज़ ’ पर  कुछ ’अंक’ प्रदान कर देना।अस्तु
लगता है उस परीक्षक की ’अन्तरात्मा’ कहीं ’शून्य" में अटक गई थी-अत: "0" अंक प्रदान कर दिया। वो तो भला हुआ कि दूसरे पेपर ने नैया पार लगा दी कि फ़ेल होते होते बचा। दूसरे पेपर में ’अन्तरात्मा की आवाज़ "नहीं लिखा अपितु 5-5- के हरे हरे कड़्कड़ी नोट लगाए थे और लिखा था "--हे परीक्षक महोदय ! ---मेरी शादी रुकी हुई है कॄपया पास कर दीजियेगा ---’दक्षिणा’ साथ में संलग्न है।
परीक्षक महोदय कॄपालु महाराज थे । अत: दूसरे पेपर में पास हो गया । बाद में यह ’रहस्यवाद’ भी खुला कि---5-5- के हरे हरे कड़्कड़ी नोट --अन्तरात्मा की आवाज़ पर भारी पड़ गया। तब सस्ती का ज़माना था।नई पीढ़ी ने तो 5-रूपये की कड़कड़ी  नोट भी नही देखा होगा
आज अफ़सोस  होता है कि उस समय थोड़ा सा भी ’हिन्दी कविता में ’रहस्यवाद’ और छायावाद’ समझ लिया होता तो आज यह ’कलम-घिसाई ’ न करता  अपितु  विदेश के विश्व विद्यालयों में लेक्चर देते फिरता और ’यात्रा-भत्ता’ का बिल बनाते रहता
हाँ ,तो बात अन्तरात्मा की आवाज़ पर चल रही थी ।
इस जुमले का  दूसरी बार और भारतीय राजनीति में संभवत: पहली बार बाबू जगजीवन राम जी ने किया था जब उन्होने  अन्तरात्मा की आवाज़ पर कांग्रेस छोड़ी थी फिर इस आवाज़  ने  उनको कहां का छोड़ा ,मैं तो नही जानता ।
उसके बाद तो राजनीति में "अन्तरात्मा की आवाज़’ का जुमला ऐसा चला कि जैसे ’ग़रीबी हटाओ’ का जुमला चला । यह ’जुमला’ शब्द भी खुद राजनीति में ऐसा चला कि कुछ लोगो ने तो एक पार्टी का नाम ही ’भारतीय जुमला पार्टी ’ रख दिया।
अब जिसे देखो राजनीति में ’अन्तरात्मा ’ की  टोकरी उठाए गली गली आवाज़ लगाए फिर रहा है।जगा लो ’अन्तरात्मा की आवाज़---यह बात अन्य है कि किसी की भी ’अन्तरात्मा’ नहीं जगती, ।सोती रहती है।
जब किसी नेता को यह लगने लगता है कि रेत उसकी मुठ्ठी फिसल रही है ,ज़मीन खिसक रही तो उसे ’अन्तरात्मा’ याद आती है --अन्तरात्मा की आवाज़ की दुहाई देता है।
जब तक उनके पास बहुमत है तब तक ’आत्मा’ सोती रहती है और ’कुर्सी’ जगी रहती है । जब हार की संभावना सामने नज़र आती है तो ’आत्मा’ याद आती है। विश्वासमत में हार की संभावना प्रबल है--एम0एल0ए0--एम0पी0 को पकड़ कर पंच तारा होटलो में ठहरा दिया जाता है --मुर्गा मछली का इन्तज़ाम कर दिया जाता है ---दवा द्वारू की व्यवस्था कर दी जाती है ---तितलियों की भी ---ऐश करो --2-4-10 दिन आराम करो अन्तरात्मा की आवाज सुनो--अन्तरात्मा को जगाओ आराम से यहां पर--कुर्सी जाने न पाये ..विश्वास मत गिरने न पाये । जो होटल के बाहर हैं ...लार टपकाए बैठें है---कब छींका टूटे कि बिल्ली का भाग जगे ।आत्मा सर्व व्यापी है ..क्या तमिलनाडु--क्या कर्नाटका..क्या पंजाब,,..क्या बिहार---क्या उत्तरप्रदेश---क्या उत्तर--क्या दक्षिण- क्या पूरब ..क्या पश्चिम---यत्र तत्र सर्वत्र--।
’अन्तरात्मा’  रही कहाँ? पार्टी के ’ह्विप’ खा खा कर कब की मर चुकी है।अगर आत्मा रहती तो किसी मन्दिर आश्रम मठ में बैठ कर ’परमात्मा’ को न जगाते । कहते हैं इस मुद्दे पर राजनीति न करें। क्यों भईया? हम क्या घंट घड़ी घड़ियाल बजाने के लिए राजनीति में आए हैं? और आप मलाई चापें?
पिछले राष्ट्रपति के चुनाव में एक पक्ष आश्वस्त था --उसे अन्तरात्मा जगाने की ज़रूरत नहीं थी---दूसरा पक्ष आश्वस्त नही था--सो उसने ’अन्तरात्मा की आवाज़’  लगाई ---लेकिन इस रंग बदलती दुनिया में --कौन अन्त: की आवाज़ सुनता है---यही सुनना होता तो राजनीति में क्यों आता--किसी मन्दिर में आरती-भजन न करता।अत:  न लोगो की अन्तरात्मा जगने को थी ..न जगी
बिहार मे---यही आवाज़ लगाई गई---भाईयो ! ’साम्प्र्दायिक शक्तियों से लड़ना है --’अन्तरात्मा की आवाज़ पर ..आप सब लोग इधर आ जाइए।कुछ लोग आ गए।
दूसरों ने आवाज़ लगाई ---भाईयो ! बिहार में भ्रष्टाचार से लड़ना है--अन्तरात्मा की आवाज़ पर -आप सब लोग इधर आ जाइए। कुछ लोग आ गए।
फिर पहले ने आवाज लगाई--भाईयो ! बिहार के विकास को गति देना है। परिवार के विकास की गति रुक गई है । अन्तरात्मा की आवाज़ पर आप सब लोग इधर आ जाइए } कुछ लोग आ गए
दूसरे ने आवाज़ लगाई--- समाजवादी भाईयो ! सामन्तवादी शक्तियों का नाश करना है }अन्तरात्मा की आवाज़ पर आप सब लोग इधर आ जाइए। कुछ लोग आ गये
जनता ने पूछा--क्या हुआ? साम्प्र्दायिक शक्तियों से लड़ाई हो चुकी?
एक ने जवाब दिया--’ हट ! फुट !! बुड़बक कहीं का !! अरे लड़ेंगे न । अभी हम आपस में लड़ रहे हैं।एक सहयोगी गया है उधर उनके ’खेमे’ में  । जैसे वह इधर लड़ा  वैसे ही वो उधर लड़ेगा
जनता -काहें उधर गया ऊ?
पहले ने जवाब दिया---एक दम घोचूँए हो का ? अरे! ऊ गाना नहीं सुना है का?

उड़ि उड़ि बैठी ’बीजेपिया’ दुकनिया --उड़ि उड़ि बैठी --हो रामा--उड़ि उड़ि बैठी ’बीजेपिया’ दुकनिया
अरे ’गठ बन्धन’ का सब रस ले भागा------ई अन्हरा अभागा नहीं जागा

चल भाग अभी माथा खराब है----जनता दूर हो गई इस लड़ाई से।दूर से देख रही है तमाशा।

एक पार्टी ’ग़ालिब’ का शे’र सुना रही है----

नुक़्ताचीं है ग़म-ए-दिल उसको सुनाए न बने
क्या बने बात जहां  बात बनाए न बने ----

दूसरी पार्टी ’मोमिन’ का शेर सुना रही है--

वो जो हम में तुम में क़रार था,तुम्हें याद हो कि न याद हो
वही यानी वादा निबाह का  ,तुम्हे याद  हो कि न याद  हो

आवाज लगाई जा रही है-राजनीति की  शे’र-ओ-शायरी चल रही है ----लोग इधर से उधर आ जा रहे है
..बुधना---’हरहुआ’ -घुरहुआ - सब देख रहा है---ई का हो रहा है भाई?---’कुर्सी ’  मन्द मन्द मुस्करा रही है।

सबही नचावत ’कुर्सी’ माई--जिधर कुर्सी--उधर ’आत्मा’
अस्तु

-आनन्द.पाठक-


गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

एक व्यंग्य : वैलेन्टाईन डे :उर्फ़ प्याज पकौड़ी चाय

                                                        वैलेन्टाईन डे :उर्फ़  प्याज-पकौड़ी चाय

जाड़े की गुनगुनी धूप। धूप सेंकता मै।।रेडियो पर बजता गाना .....

दो सितारों का ज़मीं पर है मिलन आज की रात 
मुस्कराता है उमीदो का चमन  आज की रात --

गाने के सुर में अपना सुर मिलाया ही था

रंग लाइ है मेरे दिल की लगन की आज की रात 
सारी दुनिया नज़र आती है दुलहन आज की रात

कि अचानक
"अच्छा ---बड़ी रिहर्सल चल रही है वैलेन्टाईन डे की। इतनी तैयारी पढ़ने में की होती तो आज ये कलम न घिसते ।शरम नहीं आती -उमर ढल गई रिटायर हो गए । गुलाटी मारना नहीं गया ।जब जब वैलेन्टाईन डे आता है मियाँ को गाने याद आते है ।रंगीन सपने आते हैं। सब समझती हूँ -संस्कारी लड़की हूँ। गाय बछिया नहीं हूँ""--मुड़ कर देखा तो श्रीमती जी हैं ।गनीमत थी कि  बेलन हाथ में नहीं था।
"बेगम ! तुम अब लड़की  नहीं -अम्मा बन गई हो अम्मा दो लड़की की अम्मा "
"हाँ हाँ मै तो अम्मा बन गई -और तुम कौन से छोकड़े रहे , बाल रंग -रंग के बछड़ा बन गए हो"
 सुधी पाठक गण अब  समझ गये होंगे कि रिटायर होने के बाद घर में मेरा गाना भी गुनाह और शक की नज़र से देखा जाने लगा  है ।
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जब जब वैलेन्टाईन डे आता है तो मैं श्रीमती जी के ’सर्विलिएन्स कैमरे ’ की जद में आ जाता हूँ वैसे ही जैसे जेटली साहब की जद में नोट बन्दी के दिनों में जनधन खाता आ जाता था। श्रीमती जी को लगता है कि वैलेन्टाइन डे पर मैं किसी डेड "जन धन  खाता" में पैसे डालने की तैयारी कर रहा हूँ -हफ़्ते भर से हर वक़्त कड़ी नज़र रखती हैं मुझ पर  किसी इनकम टैक्स वालों की तरह -क्या गा रहा  हूँ ....क्या शायरी कर रहा हूँ..... कैसा  गीत लिख रहा हूँ..... कितनी बार बाल सँवार रहा हूँ ....कितनी बार माँग निकाल रहा हूँ.... कितनी बार कपड़े पर परफ़्यूम छिड़क रहा हूँ....कितनी बार मूछें तराश रहा हूँ....वग़ैरह वग़ैरह।
कल ’अरूज [उर्दू ग़ज़ल का छन्द शास्त्र]” पर एक निबन्ध लिख रहा था  फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन --फ़ाइलुन-----
श्रीमती जी पीछे से उच्चारती है--अच्छा  ! ! ......... फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन ..फ़ाइलातुन करने से ’अफ़लातुन’ नहीं बन जाओगे वैलेन्टाइन डे के दिन । दो बच्चों के बाप हो गए हो ...घर में रहों --गीता पढ़ो ..रामायण पढ़ो ..माला फेरो..राम राम जपो ...सनी लिओनी ...सनी लियोनी     मत रटो ....  ..वैलेन्टाइन डे तुम्हारे लिए नहीं है ---तुम्हारे लिए शास्त्रों में ’एकादशी व्रत’ ,,,.... शिव-रात्रि  का प्रावधान है

मेरे एक कवि-मित्र है। हम उम्र है ।नाम बताना उचित नहीं ,क्योंकि भाभी जी से उनको सुरक्षित रखना मेरी जिम्मेदारी  है ।वैलेन्टाइन डे पर बड़ी प्रेमभरी कविता लिखते है उसे सुनाने के लिए । कई कवि लिखते है ,कुछ बताते हैं कुछ छुपाते हैं ।हम कवि गण ’अर्थहीन [कविता अर्थहीन  भले हो  जेब से ’अर्थहीन ही होते हैं }  होते हैं।  महँगे गिफ़्ट तो क्या दे पाते हैं  अपनी वैलेन्टाइन को ,  सो  कविता में  ही आसमां से तारा ला कर देते है ... सितारे ला कर देते है  जमीन देते हैं आसमान देते हैं  बहुत खुश हो गए तो आरा-बलिया-छ्परा -भी हिला हिला कर दे देते है ...कौन अपने बाप का जाता है ....उसी को दे देते हैं  और फिर दूसरे दिन गरीब  बन झोला लटकाए सड़क पर गाते फिरते रहते है अगले साल तक--हम ने ज़फ़ा न की थी --उस को  वफ़ा न आई---पत्थर से दिल लगाया और दिल पे चोट खाई -- -- । यही कारण है कि कवियों की.. शायरों की कोई परमानेन्ट वैलेन्टाइन नहीं होती ।मेरी भी नहीं है ।अगर किसी की होगी भी तो बतायेगा नहीं। तो भाई साहब ने बड़ा ही सुमधुर  गीत लिखा था .........  गा कर जाँचा -परखा .... एक एक शब्द को सजाया ... सँवारा .  ..आवाज़ में लोच पैदा कर  सुनाया  .....  कविता में जो जो मिर्च मसाला डालना था डाला  इस उमीद से कि उनकी वैलेन्टाइन  प्रभावित होगी ।
"भाई साहब ! बात हो गई उस से ?"
"किस से?"
"अरे उसी से जिसके लिए आप ने यह गीत लिखा है । वैलेन्टाइन डे  परसों है न !!
"ही ही ही’! ’-बत्तीसी निकलते निकलते रह गई }-हे हे हे  ! क्या पाठक जी-- अब कहाँ मैं ....कहाँ वैलेन्टाइन --- ये कविता तो बस वसन्त पर लिखी "वसन्ती" पर लिखी ...-प्रकॄति पर लिखी है प्रकॄति देवी पर लिखी है विराट  में सूक्ष्म देखता हूं निराकार में आकार देखता हूँ..जड़ में चेतन देखता हूँ .....
"और मैं चोर की दाढ़ी में तिनका देखता हूँ , कोई बात नही प्रभुवर ! मैं भी वैलेन्टाइन के दिनों में  ऐसी ही कविता  लिखता हूँ प्रकॄति पर लिखता हूँ । मगर श्रीमती जी मानती ही नही ।"
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पिछली बार भी ऐसी ही एक कविता सुनाई थी अपनी वैलेन्टाइन को ।

इक जनम भी सनम होगा काफ़ी नहीं 
इतनी बातें हैं कितनी सुनाऊँ  तुम्हें
यह मिलन की घड़ी उम्र बन जाए तो
एक दो गीत कहो तो सुना दूँ तुम्हें 
इतना सुन लिया  बहुत था  -बहादुर लड़की थी

 नतीज़ा यह हुआ कि कविता सुनने के बाद वो आज तक लौटी ही नहीं --न जाने किस हाल में होगी बेचारी ? वफ़ा-बेवफ़ा की तो बात छोड़िए।आज तक याद में दिवाना बने गाता फिरता हूँ

धीरे धीरे दूर हो गई ऐसी भी थी क्या मज़बूरी
पहले ऐसा कभी नहीं था हम दोनों में दिल की दूरी
काल चक्र पर किस का वश है अविरल गति से चलता रहता
अगर लिखा था नियति यही है प्रणय कथा कब होगी पूरी---जाने क्यूँ ऐसा लगता है
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पिछली बार भी वैलेन्टाइन डे मनाया था मगर ये शिव-सेना और  बजरंग दल वालों ने अपनी ’संस्कॄति लबादा ’ से ऐसी संस्कृति लागू किया मुझ पर कि बस शहीद होते होते बचा वरना ह खाकसार -वैलेन्टाइन संस्करण-2 हो जाता।  1-2 हड्डी सीधी बची भी तो बाद में पुलिसवालों ने सीधा कर दिया } सत्यानाश हो इन दुश्मनों का।
वैलेन्टाइन डे  हर साल आता है और मुआ  दिल हर बार हड्डियाँ तुड़वा कर सीधा खड़ा हो जाता है ।आखिर जवानी भी कोई चीज़ होती है } मैं नहीं तो क्या दिल तो जवान है } 2-4 डंडे 2-4 बेलन तो खा ही सकता है ।  तौबा कर के फिर रिन्द के रिन्द हो जाता है और वैलेन्टाइन डे आते आते  ख़ुमार बाराबंकी साहब का शे’र गुनगुनाने लगता है

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है  हवा चल रही है 

और जब पुरवा हवा चलती है तो हड्डियों का एक एक जोड़ .पिछली वेलेन्टाइन डे की गवाही देता है।
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रिहर्सल चल रहा है तैयारी चल रही है लड़के ग्रीटिंग कार्ड खरीद रहे हैं लड़किया ड्रेस बनवा रही है -नीतू ये देख  कैसी रहेगी ? -- पिछली बार तो उसने घास ही नही डाला था खुसट था साला ---रिया ये देख तो ये ’इयर-रिंग’ कैसी लगेगी ?---अन्तरा इधर आ न देख न...तेरा वाला तो ठरकी था लास्ट इयर .....ये..मैचिंग कैसी लगेगी...? सब यारी तैयारी में लग गए।
इधर मैं अपनी तैयारी में लग गया
इस बार ऐसा गीत सुनाऊँगा ,,वो बहर-ए-तवील गाऊँगा  कि अपनी वैलेन्टाइन तो क्या उसकी 2-4 सहेलियाँ भी खीची चली  आयेगी .... ’एम डी एच ’ मसाले’ की तरह ....जहां कोई  हो... खीचा चला आए
गीत गुनगुना रहा था --गीत बना रहा था ....अन्तरा नहीं बन पा रहा था ....मीठी मीठे शब्द खोज खोज कर ला रहा था }जेब का खाली कवि बस शब्दों से ही मन बहलाता है -अपनी वैलेन्टाइन को , और वैलेन्टाइन मात्र शब्दो से  नहीं बहलती [ सच्ची वैलेन्टाइन -श्रीमती जी की बात और है शायद उनके  पास  कोई दूसरा ’आप्शन न हो]

एक मन दो बदन की घनी छाँव में
इक क़दम तुम चलो इक क़दम मैं चलूं

 आगे की लाईन सोच ही रहा था कि
 ’वाह वाह वाह वाह ’-  तालियां बजी-- मुड़ कर देखा श्रीमती जी खड़ी-हैं -" घुटने का दर्द ठीक हुआ नहीं... आपरेशन कराने के पैसे  नहीं ......,चलने के क़ाबिल नहीं.... - और चले हैं ’वैलेन्टाइन से कदम-ताल करने"  जाइए जाइए अपने वैलेन्टाइन के पास ....घर की खाँड़ खुरदरी लागे ,बाहर का गुड़ मीठा  ।शिवसेना  --बजरंग दल वाले जब मरम्मत करेंगे तो ’रिपेयरिंग’ कराने यहीं लौट कर आइयेगा
अरे ! अब कहां जाना इस उमर में ,पगली ।

जीवन भर का साथ है ,भला बुरा जो हाल
 मेरी ’वेलेन्टिन यहाँ ? जीणौ कित्तै साल ?  

फिर क्या ! बालकनी में ही बैठ कर वैलेन्टाइन डे मना रहे थे  श्रीमती जी के साथ --प्याज पकौड़ी चाय के साथ
"अच्छा सुन पगली  --प्यार जताते हुआ सुनाया --"’अभी हमने जी भर के देखा नहीं है
अच्छा तो तुम भी सुन लो -श्रीमती जी ने सुनाया --" अभी हमने  तुमको फ़ेंका नही है 

क्या नहले पे दहला मारा ...क्या तुकबन्दी भिड़ाई ...क्या ’डुयेट ’ गाया आखिर बेगम किस की हो ।रेडियो पर गाना बज रहा है ---दो सितारो का "यहीं" पर है मिलन आज की रात ...दो सितारों का,,,,
अब तो बालकनी   ही  मेरा ’पार्क’ .....घरवाली ही मेरी वैलेन्टाईन.......प्याज पकौड़ी चाय ही मेरी ’गिफ़्ट’

दुनिया जले जलती रहे.........
अस्तु

-आनन्द.पाठक-
08800927181